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Showing posts from August, 2009

संसद या विधानसभा को बिना किसी कारण समय से पहले भंग करने पर रोक लगाना चाहिए.

हुड्डा जी ने हरियाणा में कांग्रेस के पक्ष में माहौल को देखकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश की और संवैधानिक निर्देशों के चलते राज्यपाल महोदय ने उनकी सिफारिश स्वीकार कर विधानसभा को भंग कर दिया । विधान सभा को समय से पहले भंग करने पर चुनावी भी समय से पहले कराने पड़ेंगे और फिर इसका व्यय आम नागरिकों के सर । विधायकों को समय से पहले विधानसभा भंग होने पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं , क्योंकि उन्हें तो मात्र चुने जाने पर ही पेंशन और तमाम सुविधाओं का हक़ मिल जाता है । यदि विधान सभा या संसद मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की इच्छा पर बिना किसी विशेष परिस्तिथि में पाँच वर्ष से पहले भंग की जाती है , तो आम चुनावी पाँच वर्ष बाद ही कराया जाना चाहिए । क्योंकि किसी की स्वीट विल पर और इस अनुमान के चलते कि समय से पूर्व चुनाव कराने से सफलता मिल सकती है , यह मात्र संविधान में दी गई व्यवस्था के दुरूपयोग से अधिक कुछ नहीं है । पता नहीं कब जनता के धन का दुरूपयोग रुक...

जल भराव और लोगों की चतुराई.

उत्तर प्रदेश के जिन शहरों में इन दिनों बारिश हुई है उन शहरों की जल निकासी व्यवस्था की पोल खुल चुकी है । हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी नगर निगमों / पालिकाओं ने नाले साफ कराये , यह अलग बात है कि जमीन पर कितने साफ हुए और कितने कागजों में । लेकिन यह सब छोड़िए, हमारे यहाँ के लोग भी बहुत चतुर हैं । विकास प्राधिकरणों , परिषदों द्वारा बनवाए गए मकानों में नालियाँ बनाकर दी गई थीं कि बरसात होने पर इन नालिओं के जरिये पानी बह जाएगा । लेकिन लोग अधिक चतुर निकले , नाली पर स्लैब डाल दी और आगे कुछ खुली पड़ी जगह पर छोटा सा लॉन बना दिया । बरसात आ गई और अब लोगों के घरों से बहकर पानी सड़क पर भरने लगा तो लोगों को चिन्ता हुई और लोग चिड़चिड़ाने लगे तथा दुनिया भर को कोसने लगे. क्योंकि उनके द्वारा नालियों को बन्द कर स्लैब डाल दिये गये और कहीं लान बना दिये गये, अब पानी के निकलने के स्थान बन्द हो गये. परिणाम वही कि पानी घर से निकल कर सड़क पर और फिर सड़के तालाबों में बदल गयीं और फिर वही पानी घरों में घुसने लगा. लोग नगर निगम और प...

पिछले बासठ साल में क्या खोया क्या पाया?

आगामी 15 अगस्त को भारत को स्वतन्त्र हुये 62 वर्ष पूरे हो जायेंगे, इस दौरान स्वतन्त्र भारत की एक पीढ़ी अपने शैशव, युवावस्था को पूर्ण कर अपनी वृद्धावस्था में प्रवेश कर गयी। स्वातन्त्रय के इन वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, का विश्लेषण करना आज अपरिहार्य हो गया है। आजादी के लिये लड़ने वाले दीवानों ने क्या इसी स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी? हमारा देश एक ऐसे देश में बदल चुका है जहाँ हजारों नियम-कानून हैं, लेकिन एक भी कानून पूरी ईमानदारी से लागू नहीं होता। आजादी के बाद से सैकड़ों घोटाले हो चुके हैं, लेकिन इनमें शामिल एक भी बड़े आदमी को सजा नहीं हुई, यह अलग बात है कि जाने-अनजाने में, मजबूरी वश इनके मोहरे बने छोटे कर्मचारी अवश्य सजा पा गये। जीप घोटाला, बैंक घोटाला, चीनी घोटाला, जमीन घोटाला, चारा घोटाला, शेयर घोटाला, तोप घोटाला, चारा घोटाला, दवा घोटाला, दवा घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, डेयरी घोटाला, न जाने कितने घोटाले हो चुके हैं, कर देने वाली गरीब जनता के पैसे को तमाम घोटालेबाज बिना डकार लिये हजम कर चुके हैं। जाँचे बैठती हैं, जाँच आयोग नियुक्त किये जाते हैं, लेकिन या तो उनकी अवधि बढ़ती जाती ह...

इन दुकानदारों को भी फांसी दे देना चाहिये.

इन दुकानदारों को भी फांसी दे देना चाहिये. पिछले दिनों जैसे ही स्वाइन फ्लू भारत में फैलने लगा, मुझे आशंका होने लगी थी कि इससे बचने के लिये लगाये जाने वाले मास्क की कालाबाजारी न होने लगे. और मेरी आशंका सत्य हुई, स्वाइन फ्लू के बचाव के लिये लगाये जाने वाला मास्क जो आम तौर पर बीस-पच्चीस रुपये में मिलता है, इसकी कीमत डेढ़ से दो सौ रुपये वसूली जाने लगी. एक टेलीविजन चैनल पर इस कालाबाजारी का बाकायदा वीडियो तक दिखाया गया. दर-असल यह कोई नई बात नहीं है, मुनाफाखोरी तो इस देश की नियति बन चुकी है. पैसा लगाओ, चीजों को स्टोर करो, बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करो और एक के दस बनाओ. इस समय जबकि स्वाइन फ्लू से चार मौतें हो चुकी हैं, आठ सौ के आसपास लोग स्वाइन फ्लू से ग्रसित हैं, स्वाइन फ्लू से बचाने वाले मास्क की इस प्रकार की कालाबाजारी. यह कोई अनोखा मामला नहीं है, मुनाफाखोर कहीं बाज नहीं आते. रिलायंस द्वारा जब अपने जीएसएम पर प्रतिदिन दस रुपये का टाक-टाइम दिया गया तो दुकानदारों ने सिम की कालाबाजारी प्रारम्भ कर दी. कुछ दवा कम्पनियों ने सरकार द्वारा कुछ दवाइयों को नियन्त्रित सूची डालने पर उन दवाइयों का फार्मू...

इस टोल टैक्स से मुझे बचाओ.

यह टोल टैक्स आखिर क्या बला है?? आप पूरे देश में कहीं भी चले जाइये, टोल टैक्स नाम का यह भूत आपका पीछा छोड़ने वाला नहीं। हर महत्वपूर्ण राजमार्ग पर, हर महत्वपूर्ण पुल पर और अब तो कई नामालूम सड़कों और पुलों पर आपको टोल टैक्स चुकाने के निर्देश लिखे हुये मिल जायेंगे. ग्रामीण इलाकों में आपको इन बैरियर्स पर दो-तीन बदमाश से दिखने वाले शख्स भी बैठे दिखाई देंगे जो किसी भी आकस्मिकता से निपटने के लिये तैयार लगते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में तथा अमूमन सामान्य राजमार्गों पर दबंग शख्स, नेता तथा पुलिस वाले टोल-टैक्स नहीं चुकाते. चूंकि टोल टैक्स कलेक्शन का कार्य भी इसी तरह के लोगों का होता है इसलिये ये कलेक्टर्स ऐसे लोगों से पंगा नहीं लेते. मुझे यह भी बताया गया कि दो तरह की रसीदें छपवाई जाती हैं, जिससे कि टैक्स में भी घपला किया जाता है. मुझे टोल टैक्स देते समय जो तकलीफ होती है, वह इसलिये होती है. १-कार खरीदते समय कुल कीमत का एक-चौथाई सरकार को अप्रत्यक्ष कर के रूप में दिया जाता है. २-प्रत्यक्ष कर के रूप में बिक्रीकर या वैट का भुगतान किया जाता है. ३-सरकार को सड़क उपभोग शुल्क के रूप में एक मुश्त रकम का भुगतान क...

चीन पर हमला कर सकता है भारत - प्रचंड उवाच.

नेपाल के भूतपूर्व राष्ट्रपति और माओवादी नेता पुष्प कमल दहल " प्रचंड " यह दावा कर रहे हैं कि भारत चीन पर हमला कर सकता है और चूँकि वह भारत की नीतिओं को नहीं मान रहे थे इसलिए भारत के दवाब में आकर उन्हें सत्ता से हटा दिया गया । प्रचंड के इस बयान को , भरत वर्मा द्वारा किए गए विश्लेषण , जिसमें उन्होंने यह आशंका प्रकट की थी कि चीन २०१२ तक भारत पर हमला कर सकता है , के जवाब के तौर पर माना जा सकता है । यह कोई ढँकी - छुपी बात नहीं है कि चीन ही इन माओ - वादिओं का पोषक रहा है । नेपाल के माओ - वादिओं को धन , हथियार तथा नैतिक और राजनैतिक समर्थन सभी कुछ चीन ने ही मुहैया कराया था । नेपाल हमेशा से ही भारत का मित्र रहा है और भारत में पहुँचने को चीन के लिए सबसे बड़ी बाधा भी । पुष्प कमल दहल का यह बयान हास्यास्पद तो कतई नहीं है , बल्कि यह हो सकता है कि इसके पीछे भी चीन और प्रचंड की कोई सोची समझी रण - नीति हो . क्या पुष्प - कमल को भारत ...

एक ईमेल जो मुझे मिली और जिसमे कुछ बहुत अच्छी बातें लिखीं हैं.

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पिछले दिनों मुझे एक ईमेल मिली जिसमें कई अच्छी बातें लिखी हुई थीं, धरती के बारे में, रोजमर्रा की चीजों के बारे में। यह मेल बहुत आनंदायक है, आप भी इसका आनंद उठाइए। हो सकता है कि आप में से बहुत से लोगों ने पहले ही इसे पढ़ रखा हो, लेकिन जिन्होनें नहीं पढ़ा होगा, उन्हें तो इसे पढने में अवश्य अच्छा लगेगा। You Can Help Save Our Earth My sincere request to all of you to follow below mentioned environmental rules to save our earth. Remember the future depends on what we do in present . CONTRIBUTE TO A NOBLE CAUSE There is a cute small round press button at the bottom right corner of almost all monitors: Please make use of this Stop printing out Harry Porter, Jeffrey Archer and other e-books. This is a classic example of paper wastage. If you have forgotten to give double-side prints, make sure you make use of the empty sides as scribbling pads or for your kids' imposition! Take two minutes from your busy schedule, before hurrying back home, to shut down the computer. All of ...

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विदेश नीति तथा आंतरिक नीति से सम्बंधित कुछ भूलें.

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत के नीति-निर्धारकों ने कुछ ऐसी भूलें कर दीं, जो अभी तक भारत को भारी पड़ रही हैं और अब भी भारतीय नीति निर्धारकों की आंखे नहीं खुल सकी हैं. १-जम्मू-कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र का दखल - शायद यह वह सबसे बड़ी भूल थी जिसके कारण कश्मीर नासूर बन चुका है. २-साठ के दशक में परमाणु हथियारों से दूर रहना, यह वह समय था जब भारत एशिया में सैन्य बढ़त ले सकता था तथा परमाणु शक्ति बन सकता था तथा उस समय परीक्षण करने पर न तो किसी भी प्रकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता तथा परमाणु शक्ति के रूप में स्वीकृति भी मिलती. ३-शांतिदूत बनने के चक्कर में पडो़स से खतरे को न भांप सकना, जिसके फलस्वरूप चीन ने भारत पर युद्ध थोप कर हजारों वर्गमील भूमि पर कब्जा जमा लिया. ४-निर्गुट/तटस्थ देश बनने की कवायद जिसके चलते पर्याप्त व आधुनिक सैन्य उपकरण न मिल सकना. अन्ततोगत्वा रूस तत्कालीन सोवियत संघ की शरण में जाना पड़ा. ५-अक्षम कूटनीति के चलते चारों तरफ दुश्मन पैदा करना. ६-पाकिस्तान से हुये तमाम युद्धों के बाद कब्जाई जमीन को वार्ता की मेज पर बैठ पर वापस कर देना जिनमें पश्चिमी पाकिस्तान के रणनीतिक ...

सरकारी सस्ती दालों के पीछे छुपा अर्थ

दिल्ली सरकार ने फैसला किया है कि सस्ती दालों की बिक्री हेतु सरकार कुछ केन्द्र खोलेगी. फैसला अच्छा लग सकता है कि जहां अरहर की दाल सौ रुपये किलो बिक रही है वहां सरकार द्वारा खोले गये केन्द्रों पर दाल सत्तर रुपये प्रति किलो बिकेगी. इसी प्रकार हर बड़े शहर में व्यापार मंडल के नेता भी इसी तरह के केन्द्र खोलना प्रारम्भ कर देते हैं. अब इसके पीछे के सत्य को समझिये, सरकार लोगों के दिमाग में यह भर रही है कि जब सरकार सत्तर रुपये प्रति किलो दाल बेच रही है, इसका अर्थ यह है कि दाल के दाम इससे नीचे नहीं जा सकते. मतलब यह हुआ कि नब्बे रुपये और सौ रुपये बेचने वाले व्यापारी के कार्य को लीगेलाइज कर दिया, उसे वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी. किसान ने तो दाल बेच दी पच्चीस-तीस रुपये किलो लेकिन वही दाल तीन-चार गुना कीमत पर बेची जा रही है, क्यों? जिन्होंने इसे स्टोर कर दिया, उन्हीं ने इसका अभाव उत्पन्न किया और फिर वही इससे लाभ उठा रहे हैं. क्या यह कालाबाजारी नहीं है. कृषि मन्त्री कह रहे हैं कि चीनी महंगी हो सकती है. करोडों टन चीनी, चीनी मिलों में रखी हुई थी, कहां से एकदम महंगाई एकाएक बढ़ जाती है. जो किसान गन्ना उगात...