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Showing posts from March, 2011

पायलटों के फर्जी लाइसेंस पर इतना हो-हल्ला क्यों ?

पूरे देश में बड़ी हाय-तौबा मची हुई है कि पायलटों के लाइसेंस में गड़बड़ियां हुई हैं. उनके उड़ान के घण्टे बढ़ा दिये गये हैं, थ्रोटल के पीछे बिना पर्याप्त समय बिताये ही. बिना जहाज उड़ाये ही उनके लाइसेंस जारी कर दिये गये हैं. एक असिस्टेन्ट डाइरेक्टर की गिरफ्तारी भी हुई है. इतना हंगामा बरपा दिया है, पूछो मत. आखिर इतना हो-हल्ला क्यों मचा रखा है एक छोटे से घोटाले को लेकर. क्या सिर्फ इसलिये कि हवाई-जहाज में यात्रा करने वाले बड़े लोग होते हैं. अमूमन बड़े लोग ही हवाई-जहाजों से यात्रा करते हैं और यदि कोई दुर्घटना होती है तो बड़े घरों के चश्म-ओ-चिराग, बड़े व्यापारी, नेता, पत्रकार इसके शिकार होते हैं. बिल्कुल यही बात है, अगर यह बात न होती तो इन बड़े लोगों की आंखों पर कौन सी पट्टी बंधी हुई है जिन्हें पायलटों का फर्जीवाड़ा तो दिखाई देता है, लेकिन वह फर्जीवाड़ा नहीं दिखाई देता जो हर जिले में रोज होता है. अगर अभी भी नहीं समझे तो जान जाइये - सड़क पर गाड़ी चलाने के लिये आवश्यक परमिट अर्थात ड्राइविंग लाइसेंस. किसी भी एक कारण से मरने वाले लोगों की संख्या से कई गुना अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इन दुर्घटनाओं...

तीन फोटो

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हमें शर्म कब आयेगी...

पहले अमेरिकी दबाव में मन्त्री बदले जाते हैं, फिर न्यूक्लियर डील के चलते सरकार बचाने के लिये चालीस करोड़ की रकम दी जाती है सांसदों को मैनेज करने के लिये. विकीलीक्स के खुलासे के बाद अब Lame Excuses ही शेष बचते हैं. अब कुछ भी कहने को शेष नहीं. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन्हें इस सब का पता है और जो इन बातों पर मगजमारी करते हैं, उनमें से अधिकतर न तो वोट देते हैं और न ही उनके वोटों में इस सब को बदलने की ताकत होती है; और जो वोट देते हैं उन्हें न तो इस सब का पता होता और न ही इस सब से कुछ लेना-देना. गिद्ध तो देखे ही होंगे. प्रकृति के स्वच्छकार. मृत जानवरों को खाकर अपना पेट पाल लेते हैं और सफाई भी कर  देते हैं. लेकिन उन्हें क्या कहेंगे जो कफनखसोट हैं. जीवित के साथ मुर्दे को भी नहीं बख्शते. अगर मानवीय गिद्ध न देखे हों तो पोस्ट-मार्टम हाउस पर देख लीजिये. पहले आठ सौ से हजार रुपये पोस्ट-मार्टम के लिये, फिर सिपाही जी की सेवा. मृत शरीर के लिये स्ट्रेचर भी नसीब नहीं होता. उल्टे-सीधे ढ़ंग से सिला हुआ शरीर,  रखने की जगह न तो पोस्ट-मार्टम से पहले नसीब होती है और न ही बाद में. दो लोग एक डण्डा...

ए०राजा के सहयोगी बाचा की मौत, और हमारे नेता चाहते हैं लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा

टेलीकाम घोटाले के आरोपी ए०राजा के निकट रहे सादिक बाचा ने आत्महत्या कर ली. सादिक की कम्पनियों में टेलीकाम घोटाले की धनराशि लगाने का संदेह था. सादिक बाचा से कई दौर की पूछताछ की जा चुकी थी और अब जब सादिक बाचा ही नहीं रहा तो एक अहम गवाह की गवाही सिरे से गयी. लिहाजा टेलीकाम घोटाले की भी धीरे-धीरे शान्ति से ठण्डे पड़ने की पूरी सम्भावना है. शीला दीक्षित जी कह रही हैं कि लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा होना चाहिये. बसपा के एक विधायक भी कहते हुये दिखाई दिये कि राजनीति में तो झूठी शिकायतें भी बहुत होती हैं और हर शिकायत पर नोटिस, ये-वो होने लगा तो बहुत दिक्कत हो जायेगी. मजे की बात यह है कि यह तय कौन करेगा कि शिकायत सच्ची है या झूठी, इसी के लिये तो लोकायुक्त बनाया गया है. लोकायुक्त जिस मन्त्री को हटाने की सिफारिश करते हैं, उस मन्त्री को अभी तक पद पर रखा गया है. शायद यही तरीका है भ्रष्टाचार से लड़ने का.

आरक्षण, समर्थन और विरोध

पहले एक बिरादरी आरक्षण की मांग को लेकर राजस्थान में सामने आई थी और अब उत्तर प्रदेश में एक और बिरादरी. दलित मुस्लिम और ईसाई नाम की एक नई बिरादरी भी सामने आ रही है, इन्हें भी आरक्षण देने की मांग उठ रही है. यद्यपि इस बिरादरी की मांगों का विरोध भी होना प्रारम्भ हो गया है. विरोध वे कर रहे हैं, जिन्हें लगता है कि यदि इस बिरादरी को आरक्षण दे दिया गया तो उनकी प्रतिशतता कम हो जायेगी. आरक्षण अब नौकरी तक सीमित नहीं रह गया, इसका व्यापक प्रभाव हर क्षेत्र में है, शिक्षा, नौकरी, पदोन्नति, राजनीति, ठेके वगैरह. हर वह बिरादरी जो वोट बैंक बन सकती है या बन जाती है, आरक्षण की मांग कर रही है. आज एक जाति है तो कल दूसरी खड़ी होगी. यह एक अच्छा तरीका हो सकता है यदि जातियों के अनुपात में सभी के लिये आरक्षण दे दिया जाये. इसमें किसी बिरादरी के नाराज होने की भी सम्भावना नहीं. जिस की जितनी जनसंख्या, उसी अनुपात में आरक्षण. इसमें अधिक कठिनाई भी नहीं होना चाहिये क्योंकि जनगणना के बाद सारे आंकड़े उपलब्ध हो जायेंगे. लेकिन फिर वही दिक्कत रहेगी कि यदि इसे लागू कर दिया गया तो फिर यह मुद्दा शायद राजनीति के लिये कारगर नहीं रह ज...

सत्यार्थ प्रकाश के बारे में एक छोटा सा सवाल

"सत्यार्थ प्रकाश"   एक बहुत अच्छा ग्रन्थ है. मैंने पूरा तो नहीं पढ़ा लेकिन इसके कुछ पृष्ठ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.  स्वामी दयानन्द द्वारा लिखित यह ग्रन्थ मन को झकझोरने वाला है. इसे प्रकाशित हुये लगभग सौ वर्ष से ऊपर हो गये हैं. अभी आई०टी०एक्ट में सम्भावित संशोधन के बारे में काफी चर्चा है. आई०टी० एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों के ऊपर चर्चाओं को पढ़ने के बाद मेरे मन में यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि स्वामी दयानन्द क्या आज की तारीख में सत्यार्थ प्रकाश प्रकाशित कराने में कामयाब हो सकते? और यदि येन-केन-प्रकरेण प्रकाशित हो भी जाता तो क्या होता ???   

कई दर्जन ब्लागरों को पुरस्कार दिए जाने का ऐलान

रविन्द्र प्रभात जी के ब्लाग पर खबर है कि :- प्रकाशन संस्‍थान हिंदी साहित्‍य निकेतन 50 वर्षों की अपनी विकास-यात्रा और गतिविधियों को प्रस्‍तुत करने के लिए एक भव्‍य आयोजन कर रहा है. यह कार्यक्रम आगामी 30 अप्रैल को हिंदी भवन में दोपहर तीन बजे से आयोजित किया जाएगा. इस मौके पर देश विदेश में रहने वाले लगभग 400 ब्‍लॉगरों का सम्‍मेलन भी आयोजित किया जा रहा है. परिकल्‍पना समूह के तत्‍वावधान में आयोजित ब्‍लॉगोत्‍सव 2010 के अंतर्गत चयनित 51 ब्‍लॉगरों को 'सारस्‍वत सम्‍मान' से नवाजा जाएगा. इस मौके पर लगभग 400 पृष्‍ठों की पुस्‍तक 'हिंदी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति', हिंदी साहित्‍य निकेतन की द्विमासिक पत्रिका 'शोध दिशा' के विशेष अंक (इसमें ब्‍लॉगोत्‍सव 2010 में प्रकाशित सभी प्रमुख रचनाओं को शामिल किया गया है), हिंदी उपन्‍यास 'ताकि बचा रहे गणतंत्र', रश्मि प्रभा के संपादन में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका 'वटवृक्ष' के प्रवेशांक के साथ कई अन्‍य किताबों का भी लोकार्पण होगा. इस कार्यक्रम में विमर्श, परिचर्चाएं एवं सांस्‍कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा. पूर...

एक बेहद शानदार फोटो जिसे देखकर आप रोमांचित हो जायेंगे....

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भगवा युद्ध.... भड़ास 4 मीडिया से साभार....

भगवा युद्ध : एक युद्ध राष्ट्र के विरुद्ध : जेयूसीएस और फुट प्रिंट्स प्रस्तुति की फिल्म : अवधि - 61 मिनट :  इस फिल्म के निर्माण की शुरुआत 2005 में मऊ दंगे के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश में हिंदुत्ववादियों द्वारा गुजरात दोहराने की कोशिश को समझाने के लिए हुई . इसके कुछ अंशों को अयोध्या फिल्म महोत्सव और इंडिया हैबिटेट सेंटर नई दिल्ली में प्रदर्शित किया जा चुका है. फिल्म के कुछ दृश्यों के आधार पर मानवाधिकार संगठनों ने योगी आदित्यनाथ के खिलाफ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में मुक़दमा किया है. गोरखनाथ पीठ सदियों से निचली श्रमिक जातियों की ब्राह्मणवाद विरोधी सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है. कालांतर में मुस्लिमों को एक हिस्सा भी इसके प्रभाव में आया और मुस्लिम जोगियों की एक धरा भी यहाँ से बह निकली. लेकिन पिछली एक सदी से यह पीठ सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने की प्रयोगस्थली बन गयी है. जिसके तहत 'हिन्दुओं के सैन्यकरण और अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने' का खाका खिंचा जा रहा है. इस विचार की अभियक्ति समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर समेत ...

न्याय वही सही होता है जब हमारे पक्ष में होता है और हीरो वही होता है जो जीतता है ...

मेरे हिसाब से हम लोगों का एक जैसा ही मानना है कि न्याय वही सही है जब हमारे पक्ष में हो और नायक वही होता है जो जीतता है. हिटलर जीत जाता तो इतिहास और इतिहासकार उसकी दुहाई दे रहे होते और हेमू जीत जाता तो हेमू की गाथायें दर्ज होतीं. कौरव जीत गये होते तो शायद दुर्योधन के पक्ष में हम लोग तर्कों के बाण लेकर खड़े होते. आजकल बड़ी वितृष्ण सी हो रही है. किसी काम को करने की इच्छा नहीं हो रही है. नेता, अफसर सब एक जैसे. सब भाषण पिलाकर ही जनता को स्वस्थ करने की महती जिम्मेदारी निभा रहे हैं. आश्वासनों का चूर्ण बांटते हैं और कानून अपना काम करेगा, जैसे मधुर वाक्य कान में डालकर गरीबों की क्षुधा को शान्त करने की दिशा में पूर्ण प्रयास कर रहे हैं. गरीब भी उतना ही चालाक बन रहा है, अपना वोट यूं ही नहीं डालता!  कहीं नोट तो कहीं दारू और कहीं कपड़े. नूरा कुश्ती चालू है और यह भी कि कौन किसे बेवकूफ बना ले और कितनी अधिक मात्रा में.