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Showing posts from May, 2009

धरती की पुकार को सुनें

मेरी आप सभी लोगों से यह प्रार्थना है कि धरती की पुकार को सुनें। धरती हमें क्या कुछ नहीं देती, खाने को अन्न, पीने के लिए जल, रहने के लिए स्थान, पहनने के लिए वस्त्र और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन हम इस धरती को क्या देते हैं, प्रदूषण के सिवा। इस धरती को ओवर-क्राउडेड करने के अलावा और क्या योगदान रहा है हमारा? जंगल काटे जा रहे हैं खेत बनाने के लिए, खेतों की जगह सीमेंट की इमारतें खड़ी हो गयीं। नदी-तालाब सब बेमौत मारे जा रहे हैं। जल का अपव्यय हो रहा है, ग्लोबल वार्मिंग से पूरी दुनिया तबाही की तरफ भाग रही है, भारत में तो निश्चित रूप जल के लिए युद्ध होना निश्चित है। मेरी यही अपील है कि धरती पर से यह ओवर-लोडिंग कम कीजिए, और कम से कम पृथ्वी के लिए कुछ तो लौटाइये। देखिये किस तरह से बाँझ हो रही है धरती, कैसे जंगल के जंगल काटकर उसे नंगा किया जा रहा है। कैसे धरती का जल सोख कर उसे निर्जला किया जा रहा है। कैसे धरती की छाती पर सीमेंट की इमारतें बनायी जा रहीं हैं। कैसे धरती के सीने को फाड़कर बहुमूल्य खनिज पदार्थों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। कैसे अपने छोटे से लोभ के लिए धरती का चीर हरण किया जा रहा ...

मैंने कहीं पढ़ा था कि छोटी चीजें सुंदर होती हैं.

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देखिये एक छोटी सी चिड़िया और छोटा सा फूल। यह फूल एक जंगली घास का है जो हर घर में उग आती है।

दुबे जी और जितेन्द्र जी आपका नाम नहीं छूटा है

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दुबे जी और जितेन्द्र जी आपका नाम नहीं छूटा है, आप लोग तो पहले से ही ब्लॉग रोल में शामिल हैं। यह कुछ ऐसे नाम हैं, जिनके ब्लोग्स पर मैं जाता हूँ। लेकिन यह सम्पूर्ण सूची नहीं है। कुछ और नाम छूट गए हैं जिनसे मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। अब आप एक छोटी सी चिड़िया को देखिये। मेरे पिताजी रोज इस डिब्बे में पानी रख देते हैं, और गौरैया , कौए, कबूतर आकर पानी पीते हैं। खाने की खोज में। कल इस चिड़िया के कुछ और फोटो अपलोड करूंगा।

नीचे वह लिस्ट है जिन ब्लॉग पर या जिनके ब्लॉग पर मैं अधिकतर जाता हूँ

नीचे वह लिस्ट है जिन ब्लॉग पर या जिनके ब्लॉग पर मैं अधिकतर जाता हूँ, हो सकता है कि इनमें कुछ महानुभावों के नाम छूट गए हों, जिनसे मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। पढ़ने को तो बहुत होता है लेकिन समय कम होता है इसलिए कभी-कभी सभी जगह टिप्पणी करना सम्भव नहीं हो पाता जिसका कि मुझे हार्दिक खेद है। जो सहृदय व्यक्ति मेरे ब्लॉग पर आते हैं उनका तथा जो टिप्पणी कर मुझे बहुमूल्य राय देते हैं, उनका मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। कल के दिन पूरा आराम करूंगा अपने गाँव में मतदान करने के बाद। राज भाटिय़ा संगीता पुरी P।N। Subramanian आलोक सिंह Pt।डी.के.शर्मा"वत्स" hem pandey Udan Tashtari अल्पना वर्मा विनय ताऊ रामपुरिया परमजीत बाली Shastri संजय बेंगाणी कार्तिकेय धीरू सिंह इष्ट देव सांकृत्यायन अंशुमाली रस्तोगी दीपक कुमार भानरे Gagagn Sharmaदिनेशराय द्विवेदी आशीष कुमार 'अंशु' काजल कुमार डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक रंजन महेद्र मिश्रा Nirmla Kapila Hari Joshi bhawna shyam kori 'uday' अनिल कान्तArvind Mishra mamta लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` Zakir Ali 'Rajneesh' (S.B.A.I.) कुश S...

एक दरोगा की दादागिरी

बात कल दोपहर की है, दो बजे का समय रहा होगा जब सूर्य देव अपनी प्रचण्ड किरणों से धरती को तपा रहे थे। सड़क के किनारे एक पार्क है, जिसके चारों तरफ फुटपाथ है। इस फुटपाथ के किनारे पेड़ों की छाया रहती है जिसमें लोग खड़े हो जाते हैं और रिक्शे वाले भी सुस्ता लेते हैं। ऐसे ही कल एक रिक्शा खड़ा था जिस पर रिक्शे वाला बैठा हुआ था। पीछे से एक फोर्ड फिएस्टा आती है, जिसकी गति काफी तेज थी, लगा कि रिक्शे वाला गया। लेकिन पास आते-आते हल्की हुई, और फिर उसने पीछे से रिक्शे को ठोक दिया, रिक्शा आगे की ओर उछला, रिक्शे वाला नीचे। उसने पीछे देखा तो उसकी हिम्मत जवाब दे गयी और आस पास में खड़े बाकी लोगों की भी। क्योंकि इस नयी-नकोर कार के अन्दर एक तीन-सितारा धारी इन्स्पेक्टर मौजूद था, उतरने के बाद उसने रिक्शे वाले को घूरा, उसकी मां-बहन के साथ नाता जोड़ा। सड़क पर रिक्शा खड़े करने के आरोप में अन्दर कराने की धमकी दी। बाद में इत्मीनान से अपनी गाड़ी छाया में लगाई और जय हिन्द।

लालू और मुलायम की अभद्रता

लालू यादव और मुलायम सिंह यादव, एक राजद और दूसरा सपा का मुखिया, दोनों ही केन्द्रीय मन्त्री रह चुके हैं और इनसे अपेक्षा की जाती है कि यह लोग एक अनुशासित तथा जिम्मेदार व्यक्ति का आचरण करेंगे तथा अन्य सामान्य जनों को भी इनसे प्रेरणा मिलेगी। लेकिन इन लोगों ने जैसा व्यवहार पिछले दिनों मीडिया तथा चुनावकर्मियों के साथ किया उसे देखकर तो निराशा ही हुई। लालू यादव पत्रकारों को धकियाते दिखाई दिये तो मुलायम ने जसवन्तनगर में एक को थप्पड़ दिखाया और एक चुनाव कर्मी को धक्का दिया। क्या यह सब लोग नियम-कानूनों से ऊपर हैं, क्या एक आम आदमी लालू या मुलायम को धकियाये तो इन्हें बर्दाश्त होगा। क्या इनके ऊपर कोई चिल्लाये तो इनके समर्थक स्वीकार कर लेंगे। नहीं। फिर ऐसा क्यों है कि हमेशा आम ही चूसा जाता है? वह इसलिये कि आम बेवकूफ है जो इनकी असलियत जानकर भी अनजान बना रहता है या यों कहें कि जानना नहीं चाहता। यदि आम आदमी अब भी नहीं चेता तो आम की तरह चूसा ही जाता रहेगा, प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती.

बधाई हो, सादिक शेख बरी हो गया

बधाई हो, सादिक शेख बरी हो गया। कौन सादिक शेख, भूल गये! मैं याद दिलाता हूं, ११ जुलाई, मुम्बई, ट्रेन- कुछ याद आया। मुम्बई की लोकल ट्रेनों में हुये बम विस्फोटों को याद कीजिये जिसमें दो सौ से अधिक लोग मारे गये थे तथा ए०टी०एस० ने सादिक शेख को इन बम-विस्फोटों के लिये जिम्मेदार बताते हुये गिरफ्तार किया था तथा उस पर मुकदमा चलाया गया. यही सादिक शेख इन्डियन मुजाहिदीन का संस्थापक बताया जाता है. अब यह सिद्ध हो गया है कि ए०टी०एस० ने गलत आदमी को पकड़ा तो अब महाराष्ट्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि ए०टी०एस० के सम्पूर्ण दल को (उप-निरीक्षक से लेकर मुखिया तक) सेवा से बर्खास्त किया जाये क्योंकि एक तो उन्होंने एक संभ्रान्त आदमी (जब क़ानून की नजर में निर्दोष है तो फिर संभ्रांत ही हुआ न) को पकड़ा, उसके लिये मानसिक वेदनायें दीं और उसकी जिन्दगी के कई वर्ष नर्क बना दिये, दूसरा उन्होंने दो सौ लोगों के हत्यारे को खुला छोड़ दिया. दूसरा अपराध तो पहले से भी अधिक गम्भीर है. देखना यह है कि अब सरकार क्या करती है???

सिख दंगों के दोषियों का बचाव भी राष्ट्रीय बेशर्मी है

प्रधानमंत्री महोदय कह रहे हैं कि लोग जबरदस्ती सिख दंगों का मुद्दा उछल रहे हैं, सिखों को उनकी जान-माल का हर्जाना दिया जा चुका है और दंगाइयों के विरुद्ध कार्रवाई की जा चुकी है। प्रधानमंत्री महोदय-आपका यह बयान भी राष्ट्रीय शर्म का विषय है, पूरी दुनिया जानती है कि कौन लोग थे जिन्होंने चौरासी में सिखों को जिन्दा जलवाया था, आज तक उन नराधमों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो सकी, रही बात हर्जाने की तो आई-पी-सी में संशोधन करा दीजिये और जहाँ हत्या के लिए मृत्यु दंड का प्रावधान है, वहां सजा हटवाकर जुर्माने का प्रावधान करा दीजिये।

मणिपुर में हत्याएं और मीडिया तथा नेता

मणिपुर में हिन्दीभाषी नौ मजदूरों की हत्याएं कर दी गयीं। हमारी धर्म-निरपेक्ष मीडिया के पास उनके बारे में दिखाने के लिए एक-दो मिनट का समय भी नहीं है, जबकि पिंक पैंटी मिशन पर घंटों बरबाद कर दिए। भगवा को अपमानित करने का कोई मौका न छोड़ने वाली मीडिया अब इस पर क्यों मुहं बाँध कर बैठी हुई है, क्या जाति-प्रदेश और धर्म के आधार पर उत्तर-पूर्वी प्रदेशों में हिंसा का नंगा नाच जायज है। वैलेंटाइन दिवस पर पक्ष-विपक्ष पर घंटों बरबाद करने वाली मीडिया के पास इन निरीहों के लिए कुछ मिनटों का भी समय नहीं है। और यही हाल है हमारे देश के तथा-कथित धर्म-निरपेक्ष बुद्धिजीवी, समाजसेवी और नेताओं का, मानव-अधिकार की वकालत करने वाले लोगों का। यह लोग वोट बैंक का हिस्सा नहीं हैं इसलिए सब चुप हैं, गांधी जी के बंदरों की तरह।

चुनाव के बाद होने वाला गठबंधन क्या उचित है?

आम चुनाव का अन्तिम दौर तेरह मई को है, मतदान का प्रतिशत लगभग पचास के आसपास रहने की आशा है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि एक बार फिर खंडित जनादेश सामने आएगा। और अब चुनाव के बाद सत्ता के दलाल फिर स्थाई सरकार देने के नाम पर जोड़-तोड़ की राजनीति में घुस जायेंगे और एक बार फिर भारत की जनता को मूर्ख बनायेंगे। क्या यह सच नहीं है कि चुनाव के बाद होने वाले गठबंधन न होकर "ठग बंधन" होते हैं? तथा क्या यह उचित नहीं होगा यदि चुनाव से पहले बने गठबंधनों में किसी के द्वारा बहुमत प्राप्त न कर पाने की स्थिति में पांच साल तक राष्ट्रपति शासन लागू रहे??? इससे खरीद-फरोख्त की राजनीति पूरी तरह ख़त्म हो जायेगी। क्या ख्याल है आपका???

केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए एक और खुशखबरी

केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए एक और खुशखबरी है, पीबी - २ में ग्रेड पे ४२०० तथा अधिक पाने वाले सभी कर्मचारी अब ग्रुप-बी अर्थात समूह-ख में आ गए हैं, नोटिफिकेशन यहाँ देखें :- http://persmin.gov.in/WriteData/CircularNotification/ScanDocument/11012_7_2008-Estt.(A).pdf

कहाँ चले गए हैं फतवा देने वाले धर्मगुरु

कार्टून डेनमार्क की पत्रिका में छपा, फतवा जारी हुआ भारत में। सलमान ने गणपति पूजा में भाग लिया, फतवा जारी हो गया। मोबाइल की रिंग-टोंस पर फतवा जारी हो चुका है, बिना परदे के निकलने पर फतवा दिया जा चुका है। और भी न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ और आधुनिक युग की तकनीकों तथा मशीनों से सम्बंधित अनगिनत फतवे जारी किए गए हैं। एक-दो बार तो यहाँ तक देखने में आया कि कुछ लोगों ने पैसे देकर भी मनमाफिक फतवे जारी करा लिए। भारत में छोटी से छोटी घटनाओं को लेकर फतवे जारी किए जाने का रिवाज या फैशन बन चुका है। लेकिन अब जब पाकिस्तान में सरे-आम सिखों पर जुल्म ढाये जा रहे हैं, ख़ुद मुस्लिमों के ऊपर तालिबानी लड़ाके अत्याचार कर रहे हैं, एक महिला को इसलिए गोली मार दी कि वह गाना गाती थी। कुछ दिनों पहले एक लड़की को इसलिए पीटा गया कि वह घर से अकेली निकल गई। किस बर्बर मानसिकता के लोग हैं यह, इसका नजारा रोज ही प्रत्यक्ष दिखाई देता है, लेकिन आज तक एक भी फतवा इस तरह की मानसिकता के विरुद्ध, इन लोगों के विरुद्ध जारी नहीं किया गया। क्यों आजतक शाही इमाम चुप बैठे हुए हैं? क्यों मुस्लिम धर्म-गुरु और मुस्लिम नेता इन पाशविक अत्याचारो...

भारत में पुलिस और अपराधियों में कोई विशेष अन्तर नहीं हैं.

एक बार फिर पुलिस का कुख्यात चेहरा सामने आया है, लखनऊ में एक किशोर को पुलिस ने पीट-पीट कर मार डाला। रोहतक, हरियाणा में बलात्कार की शिकार महिला सुमन ने आरोपियों के विरुद्ध कार्रवाई न होने पर जहर खा कर आत्महत्या कर ली लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने आरोपियों के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की। सुमन के पति ने भी जहर खा लिया, दुर्भाग्य से वह बच गया तो पुलिस ने उसके विरुद्ध अवश्य तत्परता दिखाते हुए आत्महत्या की कोशिश की रिपोर्ट दर्ज कर ली। वाह, भारत की महान पुलिस। कहना ग़लत न होगा कि पुलिस और अपराधियों में कोई विशेष अन्तर नहीं रह गया है।

सिखों के लिए दिल क्यों नहीं धड़क रहा?

पाकिस्तान में सिखों पर जुल्म ढाये जा रहे हैं, लेकिन आज किसी भी अल्पसंख्यक नेता और धर्म-निरपेक्ष समाजसेवी का दिल इन सिखों के लिए नहीं धड़क रहा, किसी के लिए भी कोई दर्द, कोई कसक, कोई चुभन नहीं महसूस हो रही। क्यों? क्या पाकिस्तान के सिख इंसान नहीं हैं, या सिर्फ इसलिए कि उनके लिए आवाज उठाने पर भारत में वोट (विशेषत: मुस्लिमों के क्योंकि अल्पसंख्यक अर्थात मुस्लिम) नहीं मिलेंगे। इसलिए आज हर धर्म-निरपेक्षी समाजसेवी, बुद्धिजीवी, पत्रकार, नेता, अल्पसंख्यक राजनीतिबाज सभी मुहं बंद किए बैठे हैं। आइये पाकिस्तान में सिखों पर हो रहे जुल्म का विरोध करें।

गुजरात के दंगों के मामलों की दिन-प्रतिदिन आधार पर सुनवाई

उच्चतम न्यायालय ने गुजरात के दंगों के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने और दिन-प्रतिदिन आधार पर सुनवाई के आदेश दिए हैं जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके साथ मैं यह कहना चाहता हूँ कि सभी ऐसे मामले जिनमें राजनेता शामिल हों तथा आतंकवादी मामलों की सुनवाई भी विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट में दैनिक आधार पर होना चाहिए जिससे कि लोगों का विश्वास न्यायपालिका में और बढ़े तथा दोषियों को जल्दी सजा मिले। अगर ऐसा होता है तभी देश के लोगों को इन्साफ मिल सकेगा क्योंकि "Justice Delayed is Justice Denied" कोई ऐसा तरीका बताएं जिससे मैं कई सारे ब्लॉग आसानी से पढ़ सकूं - पिछली एक मई को मैंने यह लिखा था जिस पर कई महानुभावों ने टिप्पणियां देकर ज्ञानवर्धन किया था जिसमें राजीव जी ने फ़ीड-रीडर की सहायता से लेख पढ़ने के बारे में जानकारी दी थी, समय कम होने के कारण मैं अभी इसके बारे में अधिक जान भी नहीं पाया हूँ तथा जो कुछ पढ़ा वह मेरी बुद्धि में चढ़ा नहीं। कम से कम चालीस ब्लोग्स ऐसे हैं जिन पर मैं प्रतिदिन जाता हूँ या जाना चाहता हूँ। सबके नाम लिखने में काफी समय लगेगा तथा मेरा computer भी अभी ख़...

पगला गए हैं लोग.

इस देश के लोग पगला गये हैं. कोई कहता है कि क्वात्रोच्ची को क्यों छोड़ दिया, कोई कहता है कि सुब्बा को निकाल बाहर करो, कोई कह रहा है कि मुख्तार और अजहर को टिकट क्यों, कोई कह रहा है कि काला धन वापस लाओ. कमाल है कि पूरे देश भंगेड़ी हो गया है.अरे भैया क्वात्रोच्ची के लिये दुनिया व्यापारी मान रही है और हमारा देश की स्वतन्त्र सीबीआई है कि पिछले बीस सालों से बेचारे के पीछे पड़ी हुई है. क्वात्रोच्ची इटली से, मैम इटली से, इसीलिये रिश्ता जोड़ डाला और परेशान कर डाला. क्वात्रोची ने किया ही क्या था. अरे भैया जिसे रिश्वत कह रहे हो वह तो कमीशन है, कमीशन इस देश में सरकार तक लेती है, अरे भैया सर्विस टैक्स भी एक तरह का कमीशन ही तो है. प्रापर्टी डीलर, गल्ला व्यापारी, आढ़ती तो बेचारे कमीशन पर ही करोड़ों की सम्पत्ति बना पाते हैं. कमीशन की महिमा पूछनी है तो सरकारी सिविल अभियन्ता से पूछो जो बतायेगा कि काम हो या न हो कमीशन होना चाहिये. तो अगर क्वात्रोची ने तोप दिलवाई और कमीशन पा लिया तो क्या हो गया. फिर एक स्वनामधन्य पत्रकार भी कह चुके हैं कि बोफोर्स न होती तो भारत कैसे कारगिल जीतता, अगली बार कभी ऐसा मौका आया तो बस ...

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए अच्छी ख़बर

केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए एक अच्छी ख़बर है. No. AB.14017/61/2008-Estt. (RR) Government of India Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions Department of Personnel and Training NewDelhi Sixth Central Pay Commission's recommendationsrevision of pay scales- amendment of Service Rules/Recruitment Rules The recommendations of 6th CPC have been considered by the Government and the CCS (Revised Pay) Rules 2008 have since been notified on 29th August, 2008. Consequently, in place of the pre- revised pay scales, the revised pay structure comprising the Pay Band and Grade Pay/Pay Scale has come into effect. Some of the pre-revised pay scales have been merged and some others are upgraded/likely to be upgraded. In the light of these, it has been decided that the following consequential steps to amend the existing Service Rules/Recruitment Rules shall be undertaken on a priority basis: (i) Substituting the existing scales by the Grade Pay alongwith the Pay Band The existing pay sc...

कोई ऐसा तरीका बताएं जिससे मैं कई सारे ब्लॉग आसानी से पढ़ सकूं.

मैं बहुत सारे ब्लोग्स को पढ़ना चाहता हूँ जिनमें ताऊ, समीर जी, विवेक जी , महेंद्र मिश्रा जी संगीता जी , अनिल जी, अल्पना जी, सीमा जी, लवली जी, आलोक जी, कार्तिक जी तथा बहुत सारे अन्य सह्रदय लोग हैं जिनके नाम मैं यहाँ पर नहीं लिख पा रहा हूँ, कोई ऐसा तरीका बताएं जिससे मैं आसानी से मनचाहे ब्लोग्स की नई प्रविस्तियाँ आसानी से एक ही जगह पढ़ सकूं तथा टिप्पणी भी दे सकूं, जो मैंने प्रिय ब्लोग्स की लिस्ट बनाई है उसमें मुझे बहुत सारे लोग जोड़ने पड़ेंगे तथा फिर उनके ब्लोग्स को खोलना पड़ेगा। जिन मित्रों के नाम मैं यहाँ पर नहीं दे सका हूँ उनसे क्षमा प्रार्थी हूँ। लेकिन जो सहृदय मेरे ब्लॉग पर आयें हैं उनके ब्लोग्स तो कम से कम मैं अवश्य देखना चाहता हूँ। और केवल यह न समझिये कि केवल उन्ही के, इन मित्रों के अतिरिक्त बहुत सारे ब्लोग्स हैं जिन पर मैं नियमित रूप से जाना पसंद करता हूँ, कृपया मुझे आसान तरकीब बताएं।

मतदान का कम प्रतिशत, अल्पसंख्यकों के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं और आतंकवाद से निपटने में बाधक है भ्रष्टाचार

लखनऊ में मात्र ३३ प्रतिशत मतदान हुआ और मेरे अनुमान के अनुसार जो प्रत्याशी दस प्रतिशत मत प्राप्त कर लेगा वह संसद पहुंच जायेगा. इसका सीधा सा मतलब यह है कि १०० में से १० की पसंद ही १०० का प्रतिनिधित्व करेगी. यह एक बड़ी अप्रिय स्थिति है जिसके कारण दो-तीन सांसद वाले दल अति महत्व प्राप्त कर लेते हैं और फलस्वरूप सौदेबाजी की गुंजाइश हो जाती है. इससे यह भी पता चलता है कि भारतीय लोकतन्त्र कोई बहुत अधिक सफल और लोकप्रिय नहीं है. मतदाता राजनैतिक दलों से मायूस हो चुके हैं. इस स्थिति से निपटने के लिये निम्न उपाय किये जा सकते हैं. १-मतदान को अनिवार्य बनाया जाये. २-प्रधानमन्त्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाये. ३-सांसद को चुनने के लिये पहली और दूसरी वरीयता की व्यवस्था की जाये. ४-महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिये ५४५ महानुभाव पर न छोड़ा जाये बल्कि इसके लिये जनमत संग्रह किया जाये जो बाध्यकारी हो. ५-प्रशासन को पूरी तरह से राजनैतिक व्यवस्था से अलग रखा जाये. इस समय विश्व को अल्पसंख्यक रहनुमाओं तथा धर्मनिरपेक्ष नेताओं की घनघोर आवश्यकता है. हमारे देश के अल्पसंख्यक रहनुमा तथा धर्मनिरपेक्ष नेता पता नहीं कहां चले...