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Showing posts from January, 2011

गारन्टी-वारन्टी क्या है...

दुकान पर कोई भी चीज खरीदिये, विशेषत: इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रानिक्स की. हर दुकानदार सामान बेचते समय उसकी खासियत बताता है और फिर गारन्टी या वारन्टी के बारे में.  पहले लोग बताते थे कि गारन्टी वह वचन होता है जो निर्माता वस्तु के ग्राहक को उस चीज के निजी उपयोग में लाने पर एक निश्चित समयावधि के अन्दर वस्तु में कोई खोट आने पर उस वस्तु को बदलने के लिये देता है. हालांकि गारन्टी के साथ भी कई शर्तें जुड़ी रहती हैं. और यह इतनी अधिक होती हैं, इतने महीन अक्षरों में दर्ज होती हैं और ऐसी भाषा में लिखी होती हैं कि लाखों में बिरला ही इन शर्तों को पढ़ता होगा. वारन्टी के बारे में लोगों ने यह बताया कि गारन्टी के स्थान पर यह नया शब्द वारन्टी आया है और वारन्टी में आवश्यक नहीं कि वस्तु बदलकर दूसरी वस्तु प्रदान की जाये, बल्कि उसी वस्तु को सुधारकर दिया जायेगा. अब असल मुद्दे पर आते हैं. माना मैंने एक मिक्सी खरीदी 01-01-2011 को. इस पर वारन्टी या गारन्टी है छ: महीने की. अर्थात 31-06-2011 तक यह मिक्सी गारन्टी या वारन्टी में है. इस दौरान 25-06-2011 को यह खराब हो जाती है.  मैं इस मिक्सी को दुकानदार को या फिर स...

ताऊ. डाट इन पर कमेन्ट डिस-एबल्ड !

Post a Comment On: ताऊ डाट इन "ताऊ पहेली - 111" No comments yet. - प्रिय बहणों और भाईयों, भतिजो और भतीजियों सबको शनिवार सबेरे की घणी राम राम. ताऊ पहेली के अंक 111 में आपका हार्दिक स्वागत है. नीचे दिखाये गये चित्र को ध्यान से देखिये और फ़टाफ़ट बताईये कि यह कौन सी जगह का चित्र हैं? हमेशा की तरह पहेली के जवाब की पोस्ट मंगलवार सुबह 4:44 AM पर प्रकाशित की जायेगी. [Image] ताऊ पहेली का प्रकाशन हर शनिवार 1:00 AM से 11:00 PM के मध्य कभी भी किया जा सकता है. ताऊ पहेली के जवाब देने का समय कल रविवार शाम 6:00 PM तक या अधिकतम कमेंट सुविधा बंद करने तक है. जरुरी सूचना:-टिप्पणी मॉडरेशन लागू है. समय सीमा से पूर्व ग़लत या सही दोनों ही तरह के जवाब प्रकाशित किए जा सकते हैं. जरूरी नही कि प्रकाशित किये गये जवाब गलत ही हैं. और रोचकता बनाये रखने के लिये गलत जवाब भी रोके जा सकते हैं. अत: अपना जवाब सोच समझकर देवें. नोट : किसी भी तरह की विवादास्पद परिस्थितियों मे आयोजकों का फ़ैसला ही अंतिम फ़ैसला होगा. मग्गाबाबा का चिठ्ठाश्रम मिस.रामप्यारी का ब्लाग ताऊजी डाट काम रामप्यारे ट्वीट्स posted by ताऊ रा...

फिर इन नामों को लाने का क्या लाभ

अभी टेलीविजन पर देख रहा हूं , एक परिचर्चा चल रही है कालेधन की वापसी को लेकर. यह बताया जा रहा है कि विदेशी बैंकों ने हमारे देश को कालाधन जमा करने वाले लोगों की सूची इस शर्त के साथ दी है कि हमारे यहां इन लोगों के नामों का खुलासा नहीं किया जायेगा. यदि इन नामों का खुलासा होना ही नहीं है तो फिर इन नामों को लाने का क्या लाभ. 

बस यूं ही..

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राह चलते कुछ चित्र

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साथ चलते चलते अचानक दोराहे पर जब हमसफर की राह अलग हो जाये तो ? शस्य श्यामला यही है-मेरी मां-हम सब की जीवनदायिनी -जिसकी गोद में खेलने का मन करता है. पेड़-एक शोक गाथा-ये भी कभी ऐसे ही लहलहाते थे जैसे सड़क के किनारे खड़े समय के ये गवाह.. पीली-पीली सरसों-दूर तक लहलहाती हुई-प्रकृति का यह चित्रकार कौन है! सड़क किनारे लगा कोल्हू-गन्ने से रस और फिर रस से गुड़-गरमागरम गुड़ खाने का मन करने लगा और फिर क्या था. देख तेरे कस्बे की हालत क्या हो गई इन्सान. वेस्ट मैनेजमेन्ट हमारे गांवों से अच्छा कहीं नहीं होता. सारा कूड़ा-कचरा उपजाऊ कम्पोस्ट में बदल जाता है. जिन्दगी की एक और शाम तमाम हुई. घर का चूल्हा जलाने के लिये लकड़ियां तो जुटानी ही हैं. सड़क पर टैम्पो और टैम्पो पर टंके हुये इन्सान. अनिर्वचनीय

तिरंगा क्या दुश्मन देश का झंडा है?

एक राजनीतिक दल लाल चौक, श्रीनगर (कश्मीर घाटी) में छब्बीस जनवरी अर्थात गणतन्त्र दिवस को तिरंगा फहराना चाहता है. उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि वे (राजनीतिक दल वाले)  शांत कश्मीर में आग लगाना चाहते हैं और झण्डा फहराने से यदि कोई तनाव फैलता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उस राजनीतिक दल की होगी. भारत का राष्ट्रीय ध्वज एक सार्वजनिक स्थल पर फहराने से तनाव हो सकता है, आग लग सकती है! कमाल है! भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराने से इतना सबकुछ. जो लोग भारतीय झण्डे को फहराने की खिलाफत कर रहे हैं क्या वह भारत की सीमाओं में रहने के योग्य हैं. क्या वह भारतीय कहलाने और भारतीय जमीन पर गुजर-बसर करने के हकदार हैं. ऐसे लोगों को तुरन्त देश से बाहर निकाल दिया जाना चाहिये. और अब्दुल्ला साहब क्या आपकी पुलिस भारतीय झण्डे की रक्षा भी नहीं कर सकती. आपका यह बयान क्या साबित करना चाहता है? देश एक नितान्त नाजुक मोड से गुजर रहा है. राजनीतिबाज अपनी रोटियां सेंकने के लिये कुछ भी कर सकते हैं. कश्मीर को हिन्दुओं से विहीन पहले ही किया जा चुका है. अलगाववादी पूरे कश्मीर को कब्जा चुके हैं. धर्म के नाम पर ही घाटी में अलगाववादी ताकतें स...

आयकर विभाग ने मान लिया कि विन चडढ़ा को बोफोर्स सौदे में दलाली मिली, अब?

आयकर विभाग की अपीलेट ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में यह माना है कि बोफोर्स तोप सौदे में सरकार ने " कुछ अतिरिक्त पैसा " दिया, जोकि विन चड्ढ़ा और क्वात्रोचि के खातों में पहुंचा, लिहाजा इस पर टैक्स देय है. दी गयी यह राशि तोप सौदे के कान्ट्रैक्ट के विरुद्ध थी. अपीलेट ट्रिब्यूनल के इस फैसले से साफ हो गया है कि बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली दी गयी. देखना यह है कि जनता इसे किस तरह हजम कर पाती है. क्वात्रोचि के खाते रिलीज करने में जिस प्रकार की तेजी दिखाई गई थी उससे दाल काली होने का शक हो रहा था जो अब सिक्काबन्द होकर सबके सामने आ गया है.

प्रणब मुखर्जी की बात को मानना चाहिये.

प्रणव मुखर्जी कह रहे हैं कि अभी तक चार जेपीसी बैठी हैं. बोफोर्स काण्ड, हर्षद मेहता, स्टाक मार्केट तथा साफ्ट ड्रिंक में पेस्टीसाइड्स के मामले में और इस सबके बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ. सही कह रहे हैं मुखर्जी साहब. ऐसी समितियों से कुछ भी हासिल नहीं होता सिवा जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी के. जब एक सदन प्रस्ताव पारित करता है और दूसरा उससे सहमत हो जाता है तब जेपीसी बनाई जाती है. अब जेपीसी के पास अधिकार तो बहुत सारे होते हैं, वह किसी को भी बुला सकती है, किसी से भी गवाही ले सकती है. किसी भी कागज को देख सकती है, लेकिन ऐसे कागज को नहीं जिसे सरकार राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा हुआ मानती हो. और इसका सारा कामकाज गोपनीय होता है. पीएसी के अधिकार क्षेत्र में मात्र इतना होता है कि वह सरकार की नीतियों की समीक्षा कर सकती है. निस्संदेह जेपीसी के अधिकार पीएसी से कहीं अधिक होते हैं, लेकिन डर्टी पार्टी-वोट पालिटिक्स के चलते जेपीसी भी कुछ नहीं कर पाती. मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि गोपनीयता का आवरण काले धन्धों को छुपाने के लिये अधिक प्रयोग किया जाता है. विदेशों में इस प्रकार की समितियों का गठन जब भी किया जा...