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Showing posts from April, 2010

कोबाल्ट ले लो कोबाल्ट

जिस देश में कोबाल्ट को कबाड़ियों के हाथों  बेच दिया जाता है उस देश में न्यूक्लियर सेफ्टी बिल में महज पांच सौ करोड़ रुपये के हर्जाने का प्रावधान! इससे पहले कैगा के एक परमाणु वैज्ञानिक संदेहास्पद अवस्था में मृत पाये गये. नाभिकीय संयंत्र में एक कर्मचारी वाटर कूलर में संक्रमित पानी भर देता है. कोबाल्ट - ६० जिस मशीन में प्रयुक्त होता था, उसे बेच दिया गया. बेचने वालों के बारे में क्या कहा जाये और क्या कहा जाये परमाणु सुरक्षा की जिम्मेदारी रखने वाले लोगों की निगाहबीनी पर. मंहगाई पर देश की जनता को कैसे बेवकूफ बनाया जाता है, परसों के कटौती प्रस्ताव से पता चल ही गया. इसलिये जब तक जियो, बोनस मानकर जियो. हमारे नेता भारत को तो स्वर्ग बना नहीं पाये लेकिन भारत के लोगों को स्वर्गवासी बनाकर उन्हें स्वर्ग दिखाने के सारे इन्तजाम कर चुके हैं..

काला धुंआ और कल-कल बहती नहर........

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सुबह का नजारा था. नहर में बहते पानी ने मन मोह लिया. वैसे भी मनुष्य एक सामाजिक "जीव" ही है. और जीव जन्तुओं का प्राकृतिक निवास तो जंगल ही है इसीलिये नदी, झरने, पहाड़, जंगल, पेड़-पौधों की ओर आदमी खुद ही आकर्षित हो जाता है. उसके अन्दर का "जीव" जग उठता है. शारदा नदी से निकली इस "माइनर" में शीतल पानी बह रहा था, जिसे देखकर खुद को रोक न सका. आगे बढा तो इस सुन्दरता के बीच काला धुंआ उगलती चिमनियां दिखाई दीं एक भट्टे की. देखिए कैसा काला धुंआ निकल रहा है इसकी चिमनियों से. लोगों ने नदियों के रुख बदल दिये, तालाब और कुंये पाट दिये. नदियों में सीवर और कारखानों की वेस्टेज डाल कर उन्हें प्रदूषित कर दिया बढ़ती जनसंख्य़ा और लोगों के लोभ ने हमारी सारी प्राकृतिक सम्पदा को खतरे में डाल दिया है. जनसंख्या को रोकना आज की सबसे बड़ी मांग है. राजनीति बाज तो ऐसा कभी चाहेंगे ही नहीं क्योंकि उनके लिये लोग इन्सान नहीं हैं बल्कि वोट हैं... चित्र आगे पीछे हो गये हैं. माफ कीजियेगा...

आईपीएल बोले तो इण्डियन पालिटिशियन लीग.

बहुत ही गंद उछल चुकी है आईपीएल को लेकर. हवाला, सट्टेबाजी और न जाने क्या क्या. देश की जनता को बेवकूफ और गुमराह करने का इससे बढ़िया उदाहरण हो ही नहीं सकता. पवार की पुत्री सुप्रिया सुले के पति की भी हिस्सेदारी निकली. पटेल की भूमिका पर भी लोगों ने उंगली उठाई. उनकी सुपुत्री ढ़ाई लाख से कैरियर शुरूकर तीस लाख के पैकेज पर पहुंच गईं मात्र तीन-चार साल में बीसीसीआई के अन्दर. अभी यह भी  पता चला कि चंडीगढ़ से चेन्नई जाने के लिये एक नागरिक फ्लाइट को चार्टर में बदल दिया गया, जिसे पूजा पटेल ने बुक कराया था. अब किसी की क्या मजाल कि पूजा जी के लिये मना कर सके कि नागरिक फ्लाइट को चार्टर में नहीं बदला जा सकता जब तक कि एक भी यात्री विमान में हो. ईमेल का चक्कर भी पता चल रहा है कि कैसे किस किस को ईमेल कर आईपीएल की टीमों की संभावित बोली लगाई गयी. कहीं किसी आईएएस का कनेक्शन पता चल रहा है तो कहीं किसी मन्त्री का. लोग खामखाह अपना टीवी चला कर बिजली का बिल बढ़ा रहे हैं, स्टेडियम में जाकर पैसे फूंक रहे हैं और भाई लोग  करोड़ों का टैक्स बचा रहे हैं, काले धन को गोरा बना रहे हैं. पवार और पटेल पाक साफ निकल आये. ठीकर...

लिखने तो कुछ और जा रहा था लेकिन इन हृदय विदारक खबरों को पढ़ने के बाद मन नहीं हुआ

जयपुर। जयपुर में एक लड़की के दोस्त ने उसका अश्लील MMS बनाकर न सिर्फ खुद शारीरिक शोषण किया बल्कि एक और लड़के के साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। इसके बाद शुक्रवार को लड़की की जलने से मौत हो गई। परिवार का आरोप है उसे जलाकर मारा गया है। उसकी मौत से गुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए जिसके बाद पुलिस और भीड़ के बीच जमकर झड़प हुई।जयपुर के कालवाड़ रोड पर रहने वाली ये लड़की प्राइवेट स्कूल में टीचर थी। मौत से पहले पुलिस को दिए बयान में उसने आरोप लगाया कि नफीस नाम के युवक ने उससे पहले दोस्ती की और फिर उसका अश्लील एमएमएस बनाकर यौन शौषण किया।लड़की के मुताबिक नफीस एमएमएस की आड़ में उसे अपने दोस्त वसीम से शारीरिक संबंध बनाने को मजबूर कर रहा था जिसके चलते उसने स्कूल जाना तक छोड़ दिया लेकिन नफीस ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और एमएमएस के खुलासे की धमकी देता रहा।परिवार का आरोप है कि लड़की को जलाया गया है जबकि पुलिस का कहना है कि उसकी हत्या नहीं हुई बल्कि उसने खुदकुशी की है। इलाके के लोगों का आरोप है कि पुलिस मामले को खुदकुशी का रूप देकर आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है ।  नोएडा। राजधानी दिल्ली से सटे न...

काश मैं एक बार फिर तुमसे मिल सकूं!

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यही कोई दो महीने पहले मेरे घर अंगूर की लताओं में एक बुलबुल ने अपना रैन बसेरा बनाया. पहले एक तिनका लाई जो मालूम भी नहीं चला, और छ:सात दिन की मेहनत ने रंग दिखाया - बुलबुल का घोंसला तैयार हो गया. जाने कहां-कहां से धागे लाई और कहां-कहां से तिनके! खैर प्रारम्भ में ध्यान नहीं दिया, लेकिन थोड़े दिन बाद ही उसके चहचहाने की आवाजें अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने लगीं. लू चल रही हो या कड़ी धूप हो, आंधी हो या बरसात, वह अपने डैने फैलाकर घोंसले में बैठी रहती. जब हल्की हवा चलती तो झूले की तरह घोंसला भी आगे पीछे होता और ऐसा लगता जैसे कि कोई छोटा बच्चा झूले में बैठकर आनन्द उठा रहा हो. एक दिन पाया कि वह बुलबुल अपनी चोंच में खाने की चीजें लेकर आने लगी है और घोंसले में ले जाती है अर्थात उसके घर में बच्चों का शुभागमन हो गया है. अब वह चीजें लाती और घोंसले में बैठे अपने नवजात शिशुओं के लिये खिलाती. इस समय तक केवल अंदाजा मात्र था क्योंकि घोंसला ऊंचाई पर था और बच्चे छोटे थे, इसलिये यह पता ही नहीं चलता था कि कितने बच्चे हैं. पन्द्रह दिन पहले एक चूजे का सिर दिखाई दिया. बहुत खुशी हुई उस नये सदस्य को देखकर. फिर तीन-चार दि...

सुनहरे गेहूं, नीलगाय और काला धुंआ....

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खेतों में लहलहाते गेहूं की फसल सुबह-सुबह ऐसे लग रही थी जैसे कि खेतों में सोना उग आया हो.. ऐसे ही थोड़े न धरती को रत्नगर्भा कहा गया है... हमारी शस्यश्यामला भूमि.. इस सोने जैसी फसल को काटता हुआ हमारा अन्नदाता. इसकी हालत सुधारने के वादे और दावे तो खूब किये जाते हैं लेकिन नतीजा वही रहता है ढ़ाक के तीन पात. गल्ले की सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार खत्म करने की खूब कसमें खाई जाती हैं लेकिन  यह रवायत कसम खाने और बयान देने तक ही सीमित रहती है.   इसके बाद दूसरी तरफ देखा तो नीलगायों का एक झुंड दिखाई दिया. दूर से हिरन की तरह दिखाई देता है यह जानवर खाता कम है लेकिन नुकसान अधिक करता है.. लेकिन किया भी क्या जाये लाखों एकड़ जंगल मटियामेट कर दिये गये अब यह बेचारे जानवर जायें भी तो कहां जायें... कल कुछ और फोटो आपकी खिदमत में पेश किये जायेंगे...काले धुंये के फोटो कल ...

उफ्फ ये धूप..

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कानपुर में प्रवेश करते ही एक ट्रक दिखाई दिया जिस पर फजलगंज की स्पेलिंग लिखी थी "FAGAL GANJ". और इसी ट्रक के पिछले पहिये के नीचे एक वृद्धा बैठी हुई थी धूप से बचने की कोशिश में... सूर्य देव पूरी तेजी से बरस रहे थे लेकिन इस वृद्धा का साहस भी उनकी तेजी से डिगने वाला नहीं था...

मृत शरीरों को ले जाने वाले वाहन अब जिन्दों को ढो रहे हैं-देश का नेतृत्व भी नागरिकों को इसी तरह ढ़ो रहा है..

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लखनऊ-कानपुर राजमार्ग पर न जाने ऐसी कितनी बसें दिखाई दीं जो सवारियों को ढ़ो रही हैं.. ये बसें किसी समय मृत शरीरों को ले जाती थीं और मेडिकल कालेज, लखनऊ के आस-पास बहुतायत में खड़ी दिखाई देती थीं. अब मेडिकल कालेज भी इफरात में हैं और एम्बुलेन्स भी, लिहाजा इनका अस्तित्व खतरे में पड़ता दिखाई दिया तो मालिकान ने इन्हें जिन्दा सवारियों को ढ़ोने में लगा दिया.. अब देखिये इनके मालिकों का नजरिया, जो हमारे देश के होनहार कर्णधारों से हूबहू मिलता है. जिन्दा को ले जाने वाले वाहन पर "लाश के वास्ते" मिटाने तक की जहमत नहीं उठाई गई. और ठीक भी है कर्णधार भी जिन्दों और मुर्दों में अन्तर कहां मानते हैं.

विरोधाभास या फिर प्रगतिशीलता....

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देखिए और तय कीजिये कि यह विरोधाभास है या प्रगतिशीलता या फिर जमाने के साथ चलने की कवायद. कुल मिलाकर हवा का एक नया झोंका आने की तैयारी कर रहा है, आइये इसका स्वागत करें..

विश्व गौरेया दिवस पर मेरे यहां भी गौरेया आई-संविधान के जनक बाबा साहब को नमन

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विश्व गौरेया दिवस पर मेरे यहां भी गौरेया आई, जिसका चित्र प्रस्तुत है. वैसे तो कई चित्र लिये थे किन्तु समयाभाव के कारण एक ही पोस्ट कर रहा हूं.. आज चौदह अप्रैल को संविधान के जनक बाबा साहब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर को नमन... भारतीय दलितों के हित में कार्य करने वाले शीर्षस्थ पुरुष को नमन..

जब भी मैं सड़क पर निकलता हूं..

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ऐसे दृश्य देखने को मिल ही जाते हैं. हर चौकी, थाने, परिवहन वालों के साथ दस्तूरी निभती रहती है. बदस्तूर चलता रहता है ये सिलसिला. हुक्मरान आंखे फेर लेते हैं .आईएस, IPS बनने वाला बनने से पहले सब देखता है, बनने के बाद भूल जाता है. जब कभी दुर्घटना होती है तो रस्म अदायगी के बतौर चार-छ: का चालान और डी-एम, एस-एस-पी,आर-टी-ओ के कड़कते बयान छप जाते हैं. इति श्री हो जाती है. इन बेचारों की मजबूरी है दो रुपये बचाने के लिये जान जोखिम में डालना, लेकिन इसे रोकने वालों की तनख्वाह तो एक लाख रुपये महीने तक है, फिर भी ये मजबूर हैं. हाय-हाय ये मजबूरी. अब मजबूरी का नाम मत पूछना. फोटो पर नजर डालिये और देखिये इन मजबूरों को..

विस्फोट की यह पोस्ट क्यों लोड नहीं हो रही...

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कल से मैं इस पोस्ट को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन यह पोस्ट लोड नहीं हो पा रही... बार-बार ४०४ error लिख कर आ रहा है... क्या यह कोई तकनीकी खराबी है या फिर यह पोस्ट विस्फोट.काम से हटा दी गयी है, कृपया बतावें. धन्यवाद...

नृशंसता की हद

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इस चित्र में एक श्रीलंकाई सैनिक एक तमिल गुरिल्ला (?) को गोली मार रहा है...पिछले वर्ष जनवरी, २००९ की तस्वीर है..क्या ये उचित तरीका माना जा सकता है विद्रोहियों पर काबू पाने का?? यदि ये उचित नहीं तो फिर भारत सरकार ने चुप्पी क्यों साधी और यदि ये उचित है तो आतंकवादियों/नक्सलियों/उल्फा विद्रोहियों इत्यादि के साथ यही तरीका क्यों नहीं अपनाया जाता... वैसे शायद मनुष्य आज से पांच-दस हजार वर्ष पहले कहीं अधिक संस्कारी और सभ्य (सिविलाइज्ड) था जब राज्य जैसी संस्था का नामो-निशान नहीं था. आदमी के पास देश, राज्य और निजी संपत्ति जैसी चीजें नहीं थीं. हिंसा भी नहीं थी और यदि थी भी तो जीवन-यापन हेतु या फिर अस्तित्व की रक्षा हेतु.... ऐसी मानवीय सभ्यता से तो हिमयुग अधिक अच्छा.. नहीं क्या ????

तस्वीर बोलती है...

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तस्वीरें भी बोलती हैं. मैं सोच रहा हूं कि चित्रों के लिये एक और ब्लाग बना लूं. कैसा आइडिया है सर जी.. अख्तर साहब, नाराज मत होइयेगा, बाकी धर्मस्थलों के अतिक्रमण के भी चित्र नये ब्लाग पर लगाऊंगा.

नक्सलियों के हाथों शहीद हुये जवानों को श्रद्धान्जलि

हे सैनिक मर मर जायेगा तो क्या जायेगा ? वोट बैंक भी तो नहीं है फिर क्या पता कितने अपने कितने विपक्षियों के होते हो सकता है कि साम्प्रदायिक होते, धर्मनिरपेक्षियों के लिये न होते... इसलिये मर.. आत्मा है अजर, अमर इस पर विश्वास कर... मर.. मरेगा तभी तो शहीद का दर्जा पायेगा... तभी तो वादा कर पायेंगे तेरे बुत लगाने का.. एक पेट्रोल पम्प दिलाने का... तू मरेगा तभी तो नोबेल शांति का हमें मिलेग.. शांति की जमीन पर ही तो खड़ा होता है दोस्ती का महल.. चल घर से निकल, टहल.. अपनी चेकपोस्ट पर पहुंच, सीमा पर पहरेदारी कर, और इंतजार कर, दुश्मन की गोली का, नेताओं की बेशर्म ठिठोली का, घर से निकल, बाजार चल, यात्रा कर, और फिर इंतजार कर, बम के फटने का, एक दुर्घटना घटने का, कफन का, भाषण का.. नेताओं की कुटिल राजनीति के राशन का. मर. यह लिखी थी गौतम राजरिषी जी के मित्र को श्रद्धान्जलि देने के लिये टिप्पणी के रुप में. लेकिन पता न था कि यह मुझे नक्सलियों के हाथों शहीद होने वाले सिपाहियों के लिये श्रद्धान्जलि देने के काम भी आयेगी..... दुख और क्षोभ के साथ..

किसी साफ्टवेयर की मदद से क्या मैं अपने ब्लाग का बैक-अप ले सकता हूं?

प्रश्न आप लोगों के समक्ष है. मैं अपने ब्लाग के लेखों का एक बैक-अप बनाना चाहता हूं. कोई साफ्टवेयर उपलब्ध हो तो बताने की कृपा करें, क्योंकि एक-एक कर लेख खोलना फिर कापी-पेस्ट अपने आप में बड़ी जहमत भरा कार्य है. शुरूआती समय में तो मैं एक कापी बनाता था लेकिन बाद में मैंने सीधे ही ब्लागर के एडिटर पर लिखना प्रारम्भ कर दिया. अब यह महसूस करता हूं कि लेखों की एक प्रति अन्यत्र कहीं सुरक्षित होना चाहिये। कोई बढ़िया साफ्टवेयर जिसमें डाटनेट इत्यादि की आवश्यकता न पड़ती हो तो और बेहतर रहोगा. कृपया इस मामले में मुझे निर्देशित करने की कृपा करें।

क्या इस तरह के अतिक्रमण उखाड़ फेंकना नहीं चाहिये.....

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एक चित्र आज प्रस्तुत कर रहा हूं. एन-एच-२७ पर पिछले दो वर्ष के अन्दर यह धार्मिक स्थल यहां पर उग आया है.. सड़क से मात्र दस फिट दूर.. इसकी दशा से भी इस बात का अन्दाजा लगाया जा सकता है..रोड साइड एक्ट के अन्तर्गत यह स्थल यहां नहीं बनाया जा सकता और अतिक्रमण की परिधि में आता है..न जाने कितने नेता, विधायक, सांसद, विधि क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति और अफसर यहां से गुजरते हैं, लेकिन किसी की नजर इस पर नहीं जाती.. जब यह बनना प्रारम्भ हुआ था उसी समय रोक दिया जाता कुछ नहीं होता.. अब इसे हटाने की हिम्मत किसी माई के लाल की नहीं.. कमोबेश हर धर्म के लोग इस तरह से जगह कब्जाते हैं..  यह पता नहीं किसका है, हिन्दू ने जगह घेरी है या मुस्लिम ने.. लेकिन इस्लाम में ऐसे कब्जा कर कोई निर्माण करने की इजाजत नहीं, फिर पता नहीं कौन से ऐसे लोग हैं जो गैर-इस्लामी कार्यों में लिप्त हैं. स्वयं इस्लामिक धर्मगुरुओं को आगे आना चाहिये और बाकी सभी को भी.. सड़क घेरने से क्या जल्दी स्वर्ग(जन्नत) मिल जाता है? घेरने वालों को तो नहीं लेकिन सड़क पर चलने वालों को जन्नतनशीं बनाने में ऐसे अतिक्रमण अच्छी भूमिका निभाते हैं.  आपका क्या ख...

आज के लिये एक फोटो.. देश की जनता का भी कुछ ऐसा ही हाल है...

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