आम आदमी की जेब काट रही हैं यहां की कम्पनियां
पिछले लेख में मैंने दवाईयों व अस्पतालों के बारे में लिखा था, इस बार कुछ उपभोक्ता उत्पादों के बारे में बात कर ली जाये. बात करते हैं बिस्किट से, कुछ कम्पनियों ने दाम बढाने की जगह दस से पन्द्रह प्रतिशत तक वजन में कमी कर दी. यही हाल रहा साबुनों का, बजाय कीमत बढाने के वजन में कमी कर ग्राहकों को धोखा देना अधिक अच्छा समझा गया. मिठाईयों के मामले में तो और भी बेदर्दी से ग्राहक की जेब काटी जाती है, भारत के पिचानवे प्रतिशत शहरों में मिठाई के साथ ही डिब्बा भी तोला जाता है, इस डिब्बे का वजन एक दुकान पर एक सौ सत्तर ग्राम पाया गया अर्थात जिस डिब्बे का मूल्य दो-तीन रुपये होता है वह ग्राहक को लगभग तीस-पैंतीस रुपये का पडा. रेडीमेड कपडों का बुरा हाल है, बहुत अनाप-शनाप कीमत लिख दी जाती है, उसके बाद एक के साथ एक फ्री, एक के साथ दो फ्री या पचास+बाकी पर पचास प्रतिशत तक छूट का प्रलोभन दिया जाता है. ऐसा कौन सा दानी व्यवसायी है जो एक के साथ दो वस्तुयें मुफ्त देगा. वाहनों के किराये का भी यही हाल है, जितनी बार भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढते हैं,निजी ट्रांसपोर्ट वाले अपना किराया भी बढा देते हैं, पेट्रोल-डीजल के दामों...