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Showing posts from December, 2008

आम आदमी की जेब काट रही हैं यहां की कम्पनियां

पिछले लेख में मैंने दवाईयों व अस्पतालों के बारे में लिखा था, इस बार कुछ उपभोक्ता उत्पादों के बारे में बात कर ली जाये. बात करते हैं बिस्किट से, कुछ कम्पनियों ने दाम बढाने की जगह दस से पन्द्रह प्रतिशत तक वजन में कमी कर दी. यही हाल रहा साबुनों का, बजाय कीमत बढाने के वजन में कमी कर ग्राहकों को धोखा देना अधिक अच्छा समझा गया. मिठाईयों के मामले में तो और भी बेदर्दी से ग्राहक की जेब काटी जाती है, भारत के पिचानवे प्रतिशत शहरों में मिठाई के साथ ही डिब्बा भी तोला जाता है, इस डिब्बे का वजन एक दुकान पर एक सौ सत्तर ग्राम पाया गया अर्थात जिस डिब्बे का मूल्य दो-तीन रुपये होता है वह ग्राहक को लगभग तीस-पैंतीस रुपये का पडा. रेडीमेड कपडों का बुरा हाल है, बहुत अनाप-शनाप कीमत लिख दी जाती है, उसके बाद एक के साथ एक फ्री, एक के साथ दो फ्री या पचास+बाकी पर पचास प्रतिशत तक छूट का प्रलोभन दिया जाता है. ऐसा कौन सा दानी व्यवसायी है जो एक के साथ दो वस्तुयें मुफ्त देगा. वाहनों के किराये का भी यही हाल है, जितनी बार भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढते हैं,निजी ट्रांसपोर्ट वाले अपना किराया भी बढा देते हैं, पेट्रोल-डीजल के दामों...

कुछ दिनों पहले होर्स ट्रेडिंग पर लिखा था

घोडों के संग जा रहे लाला चुन्नी लाल इनको ले जाते किधर हमने किया सवाल हमने किया सवाल उन्होंने ली जम्हाई बोले सौ करोड़ हो गई होर्स की कीमत भाई होर्स ट्रेडिंग में सब लगे क्या पीले क्या लाल ले जाता दिल्ली इन्हे इसीलिए तत्काल।

एक अस्पताल में दिखाई देती है पूरे भारत की छवि

अभी भाई अनिल जी का एक लेख पढ़ा था जो दवाईयों के अनाप-शनाप मूल्यों के ऊपर था. हमारे एक मित्र हैं जो अक्सर मजाकिया परिभाषायें बताते रहते हैं. उन्होंने अंग्रेजी शब्द कस्टमर की परिभाषा दी है-वह व्यक्ति जो कष्ट से मरे, कन्ज्यूमर-वह व्यक्ति जो किसी पदार्थ को कन्ज्यूम कर मरे. उनकी इन परिभाषाओं को लेकर पहले मैं हंसता रहता था, लेकिन अब मुझे समझ में आने लगा है कि उनके द्वारा बताई गयी परिभाषायें कम से कम भारतीय परिप्रेक्ष्य में बिल्कुल ठीक हैं. सबसे पहले बात कर ली जाये दवाईयों की, ओवर द काउन्टर मिलने वाला कफ सीरप 45 से 50 रुपये के बीच आता है जिस पर कम से कम आठ से बारह रुपये विक्रेता को मिलते हैं. पित्ती की एक दवाई सेट्रिजीन अलग-अलग ब्रांड नाम से पांच रुपये से लेकर पैंतालीस रुपये में दस तक मिलती हैं. यह बात तमाम दवाईयों पर लागू होती है, अलग-अलग ब्रांड नाम से बिकने वाली एक जेनेरिक दवाई में दस गुना फर्क तक मिलता है. कहा जा सकता है कि पांच रुपये वाली सेट्रिजीन सब-क्वालिटी प्रोडक्ट हो सकती है, यदि ऐसा है तो ड्रग इंस्पेक्टरों के लिये सरकारें क्यों पालती हैं? कम से कम चार ऐसे चिकित्सकों को मैं जानता हूं...

सत्ताधारियों की मानो या जान से हाथ धोने के लिए तैयार रहो.

सत्ता के नशे में चूर होकर औरेया के विधायक शेखर तिवारी ने अपने गुर्गों के साथ मिलकर लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियन्ता मनोज कुमार गुप्ता की पीट-पीट कर हत्या कर दी। हत्या का कारण पैसे की उगाही बताया जा रहा है. यह कोई पहली बार नहीं है जबकि किसी राजनेता ने किसी अधिकारी की हत्या की है, बिहार के सांसद आनंद मोहन को एक आई०ए०एस० अधिकारी की हत्या के आरोप में सजा भी हो चुकी है. न जाने कितने ऐसे उदाहरण सामने आये हैं जब सत्ता के नशे में चूर होकर राजनेताओं तथा उच्च-अधिकारियों ने इस तरह की घटनायें अंजाम दी हैं. और अब तो पुलिस, राजनेता और अपराधियों में विभाजक रेखा इतनी सूक्ष्म हो गयी है कि इनके मध्य कोई अन्तर नजर नहीं आता. इस दुस्साहस का कारण यह है कि राजनेता तथा उच्चाधिकारी सत्ता का दुरुपयोग कर पहले तो अपने विरुद्ध अभियोग ही पंजीक्रत होने नहीं देते, यदि हो भी जाता है तो धीरे से गंभीर धाराओं को हटाकर हल्की धाराओं में बदल देते हैं. उसके बाद मुकदमेबाजी की लम्बी प्रक्रिया में गवाहों को डरा-धमका कर, लालच देकर पूरे मुकदमे का ही मखौल बना दिया जाता है जिसके कारण ऐसे अपराधियों का हौसला बुलंद होता चला जाता ...

मुस्लिम नेताओं का व्यवहार, साम्प्रदायिकता तथा भारतीय संविधान

ए० आर० अंतुले कह रहे हैं कि वह अल्लाह के सिवा किसी और से नहीं डरते, अच्छी बात है, इसलिये उन्हें करकरे के मुद्दे पर बोलने से कोई नहीं रोक सकता. यह भी बिलकुल ठीक है, भारतीय लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की गारंटी दी हुई है. अन्तुले का यह भी कहना है कि उनके बयानों का दुरुपयोग पाकिस्तान में किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद वह करकरे के सम्बन्ध में अपने बयानों पर कायम रहेंगे. खास बात यह कि अन्तुले जो बातें कर रहे हैं वही पूरे भारत के मुसलमान कर रहे हैं, यह बात दीगर है कि यह बातें ऊपर से नीचे लाई जा रही हैं अथवा नीचे से ऊपर लाई जा रही हैं. यहां पर प्रश्न यह उठता है कि अब ऐसा तो नहीं कि जो आतंकवादी मारे गये हैं, ये नेता उनकी राष्ट्रीयता भारत ही न घोषित कर दें और उन्हें हिन्दू न बता दें. जो बात सबको साफ साफ दिखाई दे रही है उस पर उंगली उठाने के पीछे क्या मकसद है? यदि यहां के मुसलमान नेता यह मान रहे हैं कि करकरे के मारे जाने में हिन्दुओं का हाथ हो सकता है तो यह अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि उनकी सोच किस हद तक विकृत हो चुकी है. इन लोगों को जबाव देना चाहिये कि क्या करकरे एक भारत...

मकान क्या वाकई में सस्ते हो गये हैं.

जयप्रकाश से कल मेरी फिर मुलाकात हुई, चूंकि वह एक पढा-लिखा व्यक्ति है लिहाजा जब भी मिलता है देश-विदेश के मुद्दों पर बात होती रहती है. कल का मुद्दा मकान और होमलोन के सस्ते होने का था. मुझसे बोला भाईसाहब, टीवी पर खूब आ रहा है कि होमलोन सस्ते हो गये, अब घर खरीदना आसान हो गया है. मैंने कहा बिलकुल, कुछ बैंकों ने पांच लाख तक के कर्ज के लिये प्रोसेसिंग फीस माफ कर दी है. पांच से बीस लाख तक के कर्ज पर ब्याज के दरों में काफी कटौती की गयी है. उसका चेहरा बात करते करते तमतमाया गया, मुझसे बोला कि आप भी सरकार में शामिल हो गये या फिर कोई नाजायज काम करने लगे हैं या फिर मुझसे मजाक कर रहे हैं. आप को लगता है कि क्या अब मैं अपना मकान ले सकता हूं आप जानते हैं कि यहां सबसे सस्ता मकान कितने का है, कम से कम आठ लाख का. मेरी कमाई कितनी है महीने की? जब मैं दिन-भर मेहनत से काम करता हूं तो लगभग एक महीने में सात-आठ हजार रुपये अधिकतम कमा पाता हूं. इस आठ हजार में मुझे अपने तीनों बच्चों की फीस भी भरनी है, उन्हें कापी-किताबें भी दिलानी हैं, उन्हें स्कूल भेजने का भी इन्तजाम करना है. अपना, अपने बीबी-बच्चों, अपने मां-बाप का...

एक कुछ अभद्र सा किस्सा जिसे लिखना मैं आवश्यक समझता हूँ.

जब मैं B.SC. कर रहा था तब एक किस्सा मुझे मेरे गुरु श्री मुकेश अग्रवाल जी ने बताया था, कुछ अभद्र सा लग सकता है लेकिन इस तरह है। एक बार एक व्यक्ति कहीं से गुजर रहा था जहाँ कुत्ते एक पंक्ति में बैठे हुए थे और सबसे आगे बैठे हुए कुत्ते के सामने रबड़ी पड़ी हुयी थी। उस व्यक्ति को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि रबड़ी पड़े होने के बावजूद कुत्ते चारों तरफ से उसमें मुंह नहीं मार रहे थे और सीधी पंक्ति में बैठे थे। उस व्यक्ति ने सबसे पीछे बैठे कुत्ते से पूछा कि क्या बात है तुम लोग रबड़ी के लिए छीना-झपटी क्यों नहीं कर रहे हो जोकि तुम्हारा प्रकृतिगत स्वभाव है। इस पर उस कुत्ते ने उत्तर दिया कि आगे वाला खायेगा तो निकालेगा तो है ही। मेरे देश को ऐसी ही रबड़ी में बदल दिया है अपने स्वार्थ को पालने वाले दुष्ट लोगों ने। कुत्तों से क्षमायाचना के निवेदन के साथ।

और गोलमा देवी मंत्री बन गयीं.

गोलमा देवी मंत्री बन गयीं जिन्हें पढ़ना तक नहीं आता। जाहिर है कि उनकी जगह काम निपटायेंगे उनके पति। यह बात ठीक है कि यदि वह नहीं पढ़ पायीं तो इसके पीछे कई आर्थिक, सामजिक कारण हो सकते हैं, यह भी ठीक है कि जरूरी नहीं कि स्कूली शिक्षा न पाया व्यक्ति समझदार न हो, जैसे कि राजस्थान के मुख्यमंत्री महोदय ने कहा है। लेकिन यहाँ क्या गोलमा देवी की योग्यता ने उन्हें मंत्री बनवाया है, बिल्कुल नहीं, उनके मंत्री बनाये जाने का एकमात्र कारण है कि गोलमा देवी निर्दलीय विधायक हैं और कांग्रेस को समर्थन दे रहीं हैं। बल्कि यह कहना अधिक ठीक होगा कि समर्थन देने के कारण उन्हें मंत्री-पद से नवाजा गया है। जो व्यक्ति ख़ुद पढ़ नहीं सकता उसके हाथ से न जाने कितने पढ़े-लिखों का और पढ़े-लिखों से सम्बंधित कार्यों का भाग्य निर्धारित होगा। हाय रे भारतीय टाईप के लोकतंत्र, तेरी बलिहारी।

कोई न कोई तो सांठ-गाँठ है इन मुस्लिम नेताओं, धार्मिक गुरुओं तथा धर्मनिरपेक्षियों (सूडो) के बीच

कोई न कोई तो सांठ-गाँठ है इन मुस्लिम नेताओं, धार्मिक गुरुओं तथा धर्मनिरपेक्षियों (सूडो) के बीच - जरा गौर करें कि बाठला हाउस एनकाउंटर के बाद मुस्लिम बुद्धिजीवियों, नेताओं तथा महान धर्म निरपेक्ष नेता अमर सिंह तथा अर्जुन सिंह ने क्या कहा था. अमर सिंह का कहना था कि मोहनलाल शर्मा का स्थानान्तरण हो चुका था और पता नहीं वह वहां क्यों गया था, फिर कहा कि यह भी हो सकता है कि क्या जरूरी है कि शर्मा को आतंकियों की ही गोली लगी हो. लगभग ऐसी ही जुबान कुछ मुस्लिम धर्मगुरू तथा बुद्धिजीवी बोल रहे थे. कोई मुस्लिम छात्र आतंकी हो ही नहीं सकता, लगभग यही कहना था प्रो०मुशीरुल हसन , जामिया के कुलपति का. अर्जुन सिंह भी इन बेकसूर छात्रों के प्रति हमदर्दी जताते और कानूनी सहायता का राग अलापते नहीं थक रहे थे. मुम्बई कांड के बाद कुछ मुस्लिम विद्वानों का यह भी कहना था (श्रीमान मौलाना वहीदुद्दीन साहब को इनमें न गिनें, वह गंभीर,सार्थक बात करते हैं) कि कोई मुस्लिम भला करकरे को क्यों मारेगा (ऐसा लग रहा था जैसे कि हिन्दू विरोध के लिये ही करकरे को जांच सौंपी गयी थी न कि सही जांच करने के लिये, जैसा कि इन लोगों के बयानों से ल...

आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी

आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी, नोट फार वोट कांड में सभी आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गयी. सुधीन्द्र कुलकर्णी जिन्होंने सांसदों की खरीद-फरोख्त खोलने के लिये (राजनीतिक लाभ हेतु ही सही) स्टिंग आपरेशन की भूमिका बांधी थी, उनकी, अमर सिंह के भूतपूर्व कर्मचारी संजीव सक्सेना तथा सुहेल की जांच किसी अन्य एजेंसी द्वारा करवाने की अनुशंसा कर दी गयी. सपा के प्रो०रामगोपाल यादव ने संजीव सक्सेना को भी बरी करने की मांग की. अमर सिंह, अहमद पटेल तथा रेवती रमण सिंह को पूरी तरह से बख्श दिया गया. जब देश की सबसे बडी पंचायत में वोटों की खरीद-फरोख्त हो सकती है और पूरे मामले को खोलने की जगह उस पर लीपा-पोती कर दी जाती है तो आसानी से समझा जा सकता है कि इस देश में न्याय किसे मिलता है और कैसे मिलता है. कांग्रेस भी राजनीति में शुचिता लाने का हो-हल्ला पीटने में तो सबसे आगे रहती है लेकिन कथनी और करनी में अन्तर इस वाकये से स्पष्ट देखा जा सकता है. पता नहीं क्या जरूरत है चुनाव आयोग को आचार संहिता लागू कराने की, आम चुनावों में वोट के बदले दारू-नोट-धोती-जाति-धर्म बांटने वाले प्रत्याशियों के विरुद्ध कार्रवाई करने की. अगर सांसद वो...

चंद्रमोहन जी का आचरण और टेलिविज़न पर महिमामंडन

चन्द्रमोहन जी (हरियाणा के भूतपूर्व उप-मुख्यमंत्री) ने हरियाणा की भूतपूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता से दूसरा विवाह रचाने के लिए धर्म-परिवर्तन कर लिया। हिन्दू धर्म को त्याग इस्लाम को अपना लिया। अपनी कामना-पूर्ति मात्र के लिए धर्म-परिवर्तन क्या दोनों धर्मों की तौहीन से कम है। दोनों लोग यह कहते दिखाई दिए कि यह सब विधि-सम्मत है और चंद्रमोहन जी पिछले अठारह सालों से प्रताड़ना सहन कर रहे थे। क्या यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति अठारह सालों से अपनी पत्नी से व्यथित हो और इतनी लम्बी अवधि तक प्रताड़ना को सहन करता रहे। यह अवश्य है कि भारतीय समाज (विशेषत: हिन्दू सम्प्रदायों) में तलाक लेने को अच्छा नहीं समझा जाता तथा इस व्यवस्था को एवं तलाक देकर दूसरी शादी करने को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है। यह बात भी भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है कि यदि तलाक को एक सामान्य व्यवस्था मानकर स्वीकार कर लिया जाता तो वह स्थिति स्त्रियों के लिए अत्यन्त कष्टदायक परिस्थिति होती। वैसे भी महिला का शोषण तो पूरे संसार में किया जाता रहा है और भारत में तो विशेष तौर पर महिलाओं की स्थिति तुलनात्मक रूप में अधिक ख़राब है। प्रा...

टेलिविज़न पर हास्य के नाम पर परोसी जा रही है अश्लीलता

कल टेलिविजन देखते समय अकस्मात एक समाचार चैनल पर नजर अटक कर रह गयी, इस चैनल पर एक हास्य कार्यक्रम की झलकियां दिखाई जा रही थीं, जिसका नाम सम्भवत: ’कामेडी सर्कस’ था. इस पर जो दिखाया जा रहा था, उसकी थीम एक वालेट और एक पर्स में हो रही बातों पर आधारित थीं. पहला सीन कुछ ठीक-ठाक था, इसलिये कुछ देर और देखने का मन हुआ. कार्यक्रम में जज के रूप में शेखर सुमन तथा अर्चना पूरन सिंह एवं विशेष अतिथि के तौर पर अदाकारा सेलीना जेतली मंचासीन थीं. अगले कुछ सेकंडों के अन्दर जो कुछ उस कार्यक्रम में कहा गया, वह मुझे हू-बहू तो याद नहीं लेकिन जितना याद रहा वह बता रहा हूं, पर्स बने हुये पात्र से वालेट बना हुआ पात्र पूछ्ता है कि तुम्हारी मालकिन क्या-क्या रखती हैं तुम्हारे अन्दर. पर्स बना हुआ कलाकार कहता है कि महीने के उन दिनों के लिये बहुत कुछ ठूंस-ठूंस कर रखती है. बाद में इसका स्पष्टीकरण देते हुये कहता है कि तुमने गलत समझ लिया न, महीने के अन्त में नोट तो रहते नहीं, इसलिये रेजगारी ठूंस-ठूंस कर रखती है. इसी प्रकार जब पर्स बना हुआ कलाकार वालेट से पूछ्ता है कि तुम्हारा मालिक तुम्हारे अन्दर क्या रखता है तो वह जबाव देत...

मुंबई में आतंकी हमलों से राज ठाकरे का सम्बन्ध

आपको शीर्षक अजीब लग सकता है कि मुंबई हमलों से राज ठाकरे का क्या सम्बन्ध है लेकिन आगे चलकर आपको इनमें छुपा हुआ सम्बन्ध स्पष्ट हो जायेगा. आतंकी हमलों के बाद राज ठाकरे के सम्बन्ध में ढेरों संदेश मेरे मोबाइल में आये, जिनमें यह विनती भी थी कि इसे आगे भेज दिया जाये जिससे कि कहीं न कहीं से तो यह संदेश राज ठाकरे तक पहुंच जाये। इसमें यह भी था कि मुम्बई को बचाने राज क्यों नहीं आये और जो कमांडो मुम्बई गये वे उत्तर भारत से गये थे और उत्तर भारतीय थे जिन्होंने मुम्बई-वासियों को बचाया. मैंने एक भी संदेश आगे नहीं भेजा. पता नहीं संदेश भेजने वाले क्या सोचकर संदेश भेज रहे हैं और इससे उन्हें क्या लाभ मिल रहा है. क्या राज ठाकरे इतना मतिमंद है जिसे अपने बयानों का अर्थ नहीं पता है या फिर इन संदेशों में जो भी लिखा गया है, उन बातों से राज ठाकरे अन्जान है? या फिर ऐसे सन्देशों के मिलने के बाद राज ठाकरे को सद्-बुद्धि आ जायेगी. कई करोड रुपये लोगों ने इन संदेशों को एक-दूसरे को भेजने में नष्ट कर दिये, लाभ किसे मिला, या तो मोबाइल कम्पनियों को राजस्व के रूप में, या फिर स्वयं राज ठाकरे को प्रसिद्धि (कु) के ही रूप में....

देश का भला कैसे होगा जब तक राजनीति में ओछे लोग आते रहेंगे

देश का भला कैसे होगा जब तक राजनीति में ओछे लोग आते रहेंगे. बात बिल्कुल साफ है, योजनाओं का तथा अधिकारों का जितना अधिक विकेन्द्रीयकरण किया गया, उतने ही अधिक मौके अधिक लोगों को अधिक भ्रष्टाचार के मिलने लगे.विकेन्द्रीयकरण से मात्र भ्रष्टाचार के सागर में गोते लगाने वालों की संख्या में ही बढोत्तरी हुई है. पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के बाद ग्राम प्रधान पद तक के लिये मारामारी बढने लगी, खून-खराबा तक होने लगा. इसके पीछे एक मात्र कारण है सार्वजनिक धन की बंदरबांट. आखिर वह कौन सी जादू की छडी है राजनीति में जिसके पाते ही एक निर्धन आदमी मात्र ग्राम-प्रधान बनने के बाद ही लाखों में खेलने लगता है, विधायक और सांसदों की तो बात ही छोडिये. इसके पीछे के भी कारण स्पष्ट हैं, या तो ये घाघ लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं या अनैतिक व अवैध कार्य करने वालों को संरक्षण देते हैं तथा इसके बदले धन प्राप्त करते हैं. पूरे देश में सैकडों की संख्या में निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं जिनके ऊपर लूट, हत्या, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में मुकदमा चल रहे हैं तथा जिनके लिये बाहुबली कहकर महिमामंडित किया जाता रहा है। नैतिकता क...

धर्म-निरपेक्षता के बारे में मैं जानना चाहता हूँ.

दो दिन पहले उपर्युक्त विषय के सम्बन्ध में मैंने एक पोस्ट लिखी थी, लेकिन मुझे वैश्विक सन्दर्भ में धर्म-निरपेक्षता के ऊपर कोई जानकारी नहीं मिल पायी। मेरा सभी विद्वत-जनों से निवेदन हैं कि वैश्विक सन्दर्भ में धर्म-निरपेक्षता पर जानकारी देने की कृपा करें.

आज की कुछ खबरें और मेरा नजरिया

कल शहीदों के बारे में रौशन की एक पोस्ट पढ़ी, अच्छी लगी। एक पोस्ट और भी थी जो यह कह रही थी कि अगर यह धमाके ताज की जगह कहीं और हुए होते तो शायद इन पर इतना बवाल भी न होता। कल मुझे यह तथ्य या यह बातें उतनी अच्छी नहीं लग रही थीं। श्रीमान सुरेश चिपलूनकर जी ने भी एक अच्छी पोस्ट मीडिया के बारे में लिखी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी, लेकिन उस समय मुझे यह लग रहा था कि मीडिया ने इस घटना का लाइव टेलेकास्ट कर कम से कम लोगों के अन्दर एक आक्रोश तो पैदा करने का काम किया है। लेकिन आज मुझे पूरी तरह सहमत होना पड़ा, इसलिए क्योंकि असम में एक गाड़ी में विस्फोट हुआ, दो-तीन लोग भी मारे गए, लेकिन हमारे वही तेज चैनल, जान हथेली पर खेलने वाले वही रिपोर्टर आज नदारद थे, क्योंकि इस विस्फोट को दिखाने से टी-आर-पी नहीं बढ़ती। मीडिया के पास बाकी पुलिसवालों के लिए बिल्कुल समय नहीं था, काश कि किसी शहीद सिपाही का भी हाल बयान किया होता । लेकिन मीडिया के इस रोल से कम से कम इतना लाभ तो हुआ ही है कि कल तक जो बेशर्म नेता अपने कहे बयानों से साफ मुकर जाते थे, उनके वह बयान तो पूरी दुनिया तक पहुँचते ही हैं। सहारा वालों का एक काम अच्छा लग...

कोई मुझे धर्म-निरपेक्षता के बारे में बतायेगा क्या

मैं धर्म-निरपेक्षता की अवधारणा के बारे में जानना चाहता हूँ। इसके बारे में अधिकाधिक तथ्य बताने की कृपा करें। यह अवधारणा कहाँ से उत्पन्न हुई, किसने इसे लागू किया, क्यों लागू किया, इसमें क्या अच्छाइयाँ हैं, क्या इसके दोष हैं, यह शब्द कहाँ से लिया गया, इसका शाब्दिक अर्थ क्या है, इत्याद ि । हमारे देश में यह कहाँ से आई, किस राजनेता ने इसे लागू किया, और कितने देश हैं जहाँ धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत का पालन किया जा रहा है, उस देश में अन्य धर्मों के मानने वालों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है। इसके अतिरिक्त इस अवधारणा से सम्बंधित अन्य जानकारी भी उपलब्ध कराने की कृपा करें, जो मैं ऊपर लिखने में छोड़ गया हो सकता हूँ। आशा है कि आप लोग धर्म-निरपेक्षता के बारे में मेरा ज्ञानवर्धन करने की कृपा करेंगे।