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Showing posts from October, 2009

ब्राण्ड नेम न लिखूं तो क्या करूं??

मेरे एक मित्र हैं सर्जन. हड्डियों के. अच्छे हैं लिहाजा खूब भीड़-भाड़ भी रहती है. पिछले दिनों मुझे कुछ तकलीफ हुई तो मैं उनके पास गया. यद्यपि मेरे घर से काफी दूर है उनका अस्पताल, लेकिन दो सौ रुपये बचाने का लोभ मैं संवार नहीं सका. ऊपर से मित्र तो हैं ही. पहुंचा, उन्होंने देखा, थोड़ी गंभीर मुद्रा बनाई, और कागज पर कुछ शब्द घसीटने लगे. मुझे लगा कि एक अदद एक्स-रे तो जरूर लिखा होगा और भी पता नहीं क्या होगा उनकी कलम से निकलता हुआ. खैर मेरे हाथ को थोड़ा पकड़ कर हिलाया-डुलाया और एक बैन्डेज लगा दिया. बोले आठ-दस दिन हाथ को आराम देना, बस. काफी का आर्डर दे चुके थे. बैठना आवश्यक था, मुझे लग रहा था कि मैं अनावश्यक रूप से उनके काम में खलल डाल रहा हूं, मैंने आशंका जताई तो वे बोले कि चलो "तू आ गया है तो कम से कम थोड़ी देर का मिल गया है, वरना वही रूटीन". हम लोग बचपन के साथी हैं, एक दूसरे की टांग खिचाई का मौका ढूंढ ही लेते हैं. मैं ने काफी के सिप भरते भरते सवाल दाग दिया कि "अभी मेरी जगह कोई और होता तो तू क्या करता, ईमानदारी से बताना?" उत्तर मिला "एक एक्स-रे, विटामिन और कैल्सियम तथा दर्द न...

सेना और पार्टियों में आरक्षण क्यों नहीं है.

सिर्फ़ एक सवाल - भारत की सेना और राजनीतिक दलों में आरक्षण क्यों लागू नहीं किया जा रहा है? क्या एक साजिश नहीं है पिछडों और दलितों के विरुद्ध.

भारत में नब्बे प्रतिशत सरकारी कर्मचारी नौकरी से निकाल दिये जायेंगे

भारत में नब्बे प्रतिशत सरकारी कर्मचारी नौकरी से निकाल दिये जायेंगे, हैरान न हों. बात सही है. किसी भी सरकार की सेवा नियमावली को उठाकर देख लीजिये और फिर सरकारी सेवकों के कामकाज की उनसे तुलना कर लीजिये, खुद-ब-खुद पता चल जायेगा. कुछ चीजें तो प्रक्टीकल नहीं हैं, जिन्हें इनमें से हटाना चाहिये. दूसरी तरफ अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करना किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिये "अनबीकमिंग आफ गवर्नमेन्ट सर्वेन्ट" होता है. एक अफसर पुत्र हाल तक अपने पप्पा की बत्ती लगी सरकारी गाड़ी में स्कूल/कोचिंग जाता रहा, अब वह भी अफसर बन गया है. हाल क्या होगा, भगवान (सिकुलर क्षमा करें) ही मालिक है. एक सज्जन एक प्रमुख संस्था के मुखिया क्या बने उनकी पत्नी जो एक स्कूल में अध्यापिका हैं, को बड़ी दिक्कत हो गयी है. उन्हें भी बत्ती लगी सरकारी गाड़ी में चलना पड़ता है. गाड़ी अब उन्हें छोड़ने व लेने जाती है. बेटे को मजबूरी में गाड़ी में एसी चलाकर बैठना रहता है जब तक मम्मा नहीं आती. बेचारे.

राजेश्वरी देवी ने की आत्महत्या

राजेश्वरी देवी, आंध्रप्रदेश की एक महिला अधिकारी ने पता नहीं क्यों आत्म हत्या कर ली और दुश्मनी निकाली बेचारे नेताओं और विधायकों पर. च्च. बड़े अफसोस की बात है, अरे नेता भी कभी कोई गलत बात करता है पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की तरह. फिर पता नहीं क्यों राजेश्वरी देवी मरते समय इन विधायक पर आरोप लगा गई कि इनके दबाव के कारण वह आत्म हत्या कर रही है. किसी साजिश की तहत यह किया है उन्होंने. है न नेताजी??? हो सकता है उसे आत्महत्या करना अच्छा लगता हो, उस महिला अधिकारी का यह शौक हो. या यह भी हो सकता हो किसी प्रकार की रंजिश निकालना चाहती हो. निर्दोष विधायक को खामखाह ही फंसाने की साजिश.

आशुतोष अस्थाना की मृत्यु और केस लगभग बन्द

आशुतोष अस्थाना, गाजियाबाद नजारत घोटाले के मुख्य अभियुक्त की मौत जेल में हो गयी. पहले परीक्षण करने वाले डाक्टर ने कहा कि प्रथम दृष्टया जहर से हुई मृत्यु लगती है. पोस्टमार्टम करने वाले ने कुछ भी नहीं बताया. डीआईजी जेल को जांच का जिम्मा दिया गया है. बड़े लोगों के नाम लिये थे अस्थाना ने. उसकी पत्नी का कहना था कि अस्थाना ने अपनी हत्या की आशंका जताई थी. जेल में क्या कुछ होता है, कैसे होता है, किनके संरक्षण में होता है, सबको पता है. सच सामने आने की सम्भावना नगण्य है. कुछ विशेष पदों को दिये गये संवैधानिक संरक्षण का पुनर्विलोकन होना चाहिये तथा इन्डियन इवीडेंस एक्ट में अविलम्ब संशोधन वांछनीय है.

आई०आई०टी० की प्रवेश परीक्षा में बैठने हेतु न्यूनतम कट-आफ बढाने का प्रस्ताव

आई०आई०टी० में प्रवेश हेतु इंटर मीडियट में अस्सी प्रतिशत अंक लाना आवश्यक होगा. वह छात्र जो किसी वजह से अस्सी प्रतिशत नहीं ला पायेंगे इस परीक्षा में बैठ नहीं पायेंगे. एक ओर जहां हाईस्कूल की परीक्षायें खत्म की जा रही हैं वहीं दूसरी तरफ इस तरह का प्रयोग. एक तो वैसे ही देश में शिक्षा सम्बन्धी सुविधायें न के बराबर हैं, ऊपर से ऐसी शर्तें. जब पहले ही केवल दो मौके दिये जाते हैं तब इस प्रकार की शर्त का कोई औचित्य समझ में नहीं आता. बल्कि मैं तो यहा तक कहूंगा कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में शैक्षणिक योग्यता में साठ/सत्तर/अस्सी/नब्बे प्रतिशत न्यूनतम अंकों की सीमा नहीं होना चाहिये. यह जरूरी नहीं कि साठ प्रतिशत पाने वाला साल/दो साल में नब्बे प्रतिशत के बराबर नहीं आ सकता. दलित छात्रों के लिये विशेष तौर पर घातक. इससे बेहतर हो कि आरक्षण खत्म ही कर दें, आई०आई०टी० से. खैर ऊपर वाले तेरे हवाले पूरा देश.

एक युवक का सर फोड़ा दिल्ली में एक एस०एच०ओ० ने

पुलिस वाले कभी गलत नहीं होते, न ही वे जो करते हैं वो कभी गलत होता है. दिल्ली में एक लड़के का सर फोड़ दिया एक एस०ओ० ने जो स्वयं नशे में था. लेकिन पुलिस कभी गलत नहीं होती वह जो करती है सही करती है, इसलिये फिर वही सब होगा जो हमेशा होता आया है और वो सब कुछ सही ही होगा. न मानो तो पुलिस वालों के खिलाफ दर्ज मामलों का हश्र देख लो. कुछ दिन बाद मुद्दई खुद ही एक एफीडेविट लगा देता है कि मामला गलत था या कोई अन्य इसमें शामिल था, किसी गलती के चलते नाहक ही बेचारे पुलिस वाले का नाम आ गया.

पुलिस और धर्मनिरपेक्षता

मैं एक थानेदार महोदय को जानता हूं. एक निरीक्षकोचित सभी गुण हैं उनके अन्दर. बड़े कड़क हैं और काफी समृद्ध भी हो चुके हैं जिसके बारे में फिर कभी चर्चा करूंगा. इसके साथ ही सम्भवत: दो व्यक्ति उनकी हवालात में आत्महत्या (?) भी कर चुके हैं, जिससे आप उनके बारे में अन्दाजा लगा सकते हैं. लेकिन मैं इसकी भी बात नहीं कर रहा. अभी होली पर मैंने उन्हें कुछ लड़कों को लठियाते हुये देखा था जो बदतमीजी कर रहे थे. खैर मैंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि यह तो पुलिस वालों का पैदायशी हक भी है और गुण या कला जो भी कह लें. अभी मुझे उनके साथ ईद वाले दिन जाने का सौभाग्य प्राप्त हो गया. उनकी गाड़ी में जिस पर बत्ती लगी हुई थी और एक हूटर भी जो उनके या कह लें पुलिस वालों के नाजायज अधिकार दिखाने का प्रतीक है. उस दिन उन्होंने उसी चौराहे पर गाड़ी रुकवा दी जहां मैं होली वाले दिन उन्हें कुछ लड़कों को लठियाते देख चुका था. कुछ ही देर में पांच-छ: मोटर-साइकिलें बड़ी तेजी से गुजरीं जिसमें हरएक पर तीन-तीन लड़के गोल टोपी लगाये बैठे हुये थे. जाहिर था कि पहनावे से मुस्लिम लग रहे थे. चूंकि महोदय बड़े सख्त किस्म के अफसर हैं इसलिये उन्हें य...

शशि जी शहीदों के लिये जगह बचाकर रखिये

एक-दो रोज पहले एक ब्लाग में शशि शेखर जी के बारे में यह पढ़ने को मिला कि उन्होंने समाचार पत्र में एक फौजी के शहीद होने पर लगी हुई बड़ी हेडलाइन तथा विस्तृत समाचार को यह कहकर छोटा करा दिया कि शहीद होना तो उनका काम है. यह काम उन्होंने जानबूझ कर चुना है, कहने का लब्बो-लुआब यह कि चूंकि एक फौजी की नौकरी में खतरों से खेलना जुड़ा है और मौत उसकी नौकरी का एक हिस्सा है इसलिये उसपर अनावश्यक रूप से पेज काले नहीं करने चाहिये. तमाम अन्य अच्छी बातें भी लिखी थीं शशि जी के बारे में. मुझे यह बात बहुत खटकी. उनकी यह बात ठीक हो सकती है कि मौत और शहादत एक फौजी की सेवा का अनिवार्य अंग हो सकता है. यह जानते हुये कि मौत सेना की नौकरी में कभी भी आ सकती है, लोग अपनी जीविकोपार्जन हेतु स्वेच्छा से सेना को चुनते हैं और आजकल तो बड़ी लम्बी लम्बी लाइनें लगती हैं फौज में भरती के लिये. उनकी बात सिद्धान्तत: सही हो सकती है, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से बिल्कुल अनुचित. एक जवान जो यह जानते हुये सीमा पर खड़ा रहता है कि पता नहीं किस ओर से दुश्मन की गोली आये और उसका सीना चीरकर उसे मौत के हवाले कर दे. न जाने किस तरफ से बम-मोर्टार आकर गिरे...

ममता जी ने बड़ी भलाई का काम किया

ममता जी ने पहली बार बड़ी होशियारी का काम कर दिया है. सबको धता बताते हुये उन्होंने अल्पसंख्यकों को परीक्षाओं में बैठने पर शुल्क से मुक्त कर दिया है. हालांकि महिलाओं के साथ भी ऐसा ही किया गया है, लेकिन इस सबसे बढ़कर यह कि कांग्रेस के सच्चर आयोग के पूरी तरह लागू होने से पहले ही उन्होंने अमोघ ब्रह्मास्त्र चला दिया है. वह दिन दूर नहीं कि बाकी सारे राज्य और केन्द्र सरकार भी देर सबेर ऐसा ही करने लगेंगी. जिनकी आंखें अब भी नहीं खुलीं वह अभी भी चेत जायें, अभी भी समय है, अन्यथा इस देश में आने वाले समय में या तो इस्लामिक राज्य होगा या फिर कई पाकिस्तान बन जायेंगे. अल्पसंख्यकों में आखिर मुस्लिमों के अलावा कौन सा धर्म है जो सत्ता के समीकरण बनाने बिगाड़ने की कूवत रखता है?? कोई नहीं. फिर यह कोई बहुत अधिक दूर या समय की बात नहीं, सिर्फ तीस प्रतिशत हिस्सेदारी पहुंचने दीजिये वोटों में. यही सब धर्मनिरपेक्ष नेता अपने लिये सेफ पैसेज तलाश रहे होंगे. बल्कि अधिक अच्छा हो कि मुसलमानों की आबादी में उनका निजाम अभी अलग कर दिया जाये, क्योंकि उनके लिये जब सब कुछ अलग है, सब कुछ विशेष है, संविधान संशोधन तक कर दिया जाता है...

मुस्लिम ही असल धर्मनिरपेक्ष हैं - एक ताजा किस्सा

जम्मू की रहने वाली अमीना ने एक हिन्दू लड़के से प्रेम विवाह कर लिया. लड़के के घरवालों ने भी लड़की को स्वीकार कर लिया. बस यहीं से शुरूआत होती है असली धर्मनिरपेक्षता की जिसकी दुहाई देते कम से कम मुसलमान (श्रीमान महफ़ूज अली जैसों को छोड़कर) तो नहीं थकते. हुआ यह कि लड़की के घरवालों को कैसे यह सहन होता कि एक मुस्लिम लड़की एक हिन्दू लड़के से शादी कर ले और ऊपर से लड़के के घरवालों ने भी लड़की को स्वीकार कर लिया. नतीजा यह हुआ कि अमीना के पिता और भाई ने पुलिस को साथ मिलाकर शादी के डेढ़ महीने के अन्दर अमीना के हिन्दू पति की हत्या कर दी. अमीना चीख-चीख कर मीडिया के सामने कह रही थी कि उसके बाप और भाई ने उसके पति का कत्ल कर दिया. केरल में मुस्लिम लव जिहाद चला रहे हैं जिसके विरुद्ध न्यायालय में याचिका भी दायर की गयी है, लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया में इसके बारे में कुछ भी नहीं सुना गया. जम्मू में इतनी हृदय विदारक घटना हो गई, कोई धर्म-निरपेक्षी और कोई समाजसेवी, कोई पेज-३ का सेलिब्रिटी इस बारे में कुछ बोलता दिखाई नहीं दिया. और कल्पना कीजिये कि मामला इससे उलट होता तो क्या होता?? तमाम पार्टियों के नेता चीख-चीख कर धर्मन...

समस्या नक्सली नहीं, समस्या स्वयं सरकारें हैं.

फिर नक्सलियों ने गढ़ चिरौली, महाराष्ट्र में सत्तरह पुलिसवालों को मार डाला. फिर वही कवायद, फिर वही बयानबाजी और फिर शोक-सभा-श्रद्धान्जलि का सिलसिला. फिर निन्दा, फिर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन, फिर फोटो में गमगीन दिखने का स्वांग करते नेता दिखाई देंगे. फिर मीडिया में दो दिन तक छाया रहेगा ये मुद्दा, हालांकि मीडिया का भी अपना नफा-नुकसान का आकलन होता है. असम की हिंसा पे चार आंसू नहीं बहाये गये, मिरज के दंगे मीडिया को नहीं भाये, आखिर उनमें गुजरात जैसी बात कहां. तकरीबन असम में भी मृतकों की यही तादाद थी. खैर, मैं कह रहा था कि समस्या नक्सली नहीं सरकारें हैं. कैसे? लेकिन इस शीर्षक से यह मत मान लीजिये कि मैं नक्सलियों या हिंसा का समर्थक हूं. अधिक कुछ लिखने की जरूरत नहीं, कुछ चीजें आपके सामने प्रस्तुत करता हूं. मन्त्री जी एक लाख रुपये रोज के होटल में ठाठ से रहते हैं जबकि करोडों व्यक्तियों को छत नसीब नहीं. कुछ तो ऐसे हैं जो कुल्ला भी स्काच से करते हैं और करोडो़ के लिये पीने का पानी भी मयस्सर नहीं. कुछ के लिये तो नगन जड़ाती थीं वे नगन जड़ाती हैं, स्वसिद्ध है. कहीं सत्ता महारानी का वरदहस्त पाते ही कंगाल अरब...

लोग आपको भूल चुके हैं शास्त्री जी.

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२८ सितम्बर को सरदार भगत सिंह का जन्म दिन था , हम कृतघ्न भारत वासियों ने किस तरह से मनाया था , सबको याद होगा । आज बापू का जन्म दिन है , गनीमत है कि अभी भी सरकारें और कुछ राजनीतिक पार्टियाँ आपको याद कर लेती हैं । और आप की मूर्तियों पर फूल मालाएं चढ़ा दी जाती हैं । सिपाही भी एक जोरदार सलूट मार ते हैं । लेकिन जिस व्यक्ति ने आजादी के बाद देश पर कुर्बानी दी , जो अपने पूरे जीवन में सादगी की मिसाल ब ना रहा , जिसने पूरे देश को यह दिखाया कि गीता में दिए गए उपदेशों पर चलना कैसे सम्भव है । जिसने पोली -- टिक्स में रहते हुए एक पैसा नहीं बनाया , जो पूरा गांधीवादी और राष्ट्रभक्त था , उसे कैसे साइड - लाइन किया जा सकता है , इसे आज के राजनीतिक व्यापारियों से सीखा जा सकता है । कल के अखबारों में एक छोटी सी लाइन छपी मिल जायेगी कि ' बापू के साथ इस अवसर पर शास्त्री जी को याद किया गया ' । दुर्भाग्य है कि इन दोनों महान पुरुषों के जन्म - दिन पर अखबार...