अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन.
पिंक पैंटी को लेकर हमारे यहां बहुत बवाल हुआ. बहुत सारी महिलाओं और उससे अधिक पुरुषों ने पिंक पैंटी ब्रिगेड को भरपूर समर्थन दिया और इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का ध्वजवाहक बताया. पिंक पैंटी भेजने का विरोध करने के लिये अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विरोध बताया और तुलना हिटलर से कर दी. लेकिन पिछले दिनों एक ऐसा कार्य किया गया जो वास्तविक अर्थों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा था और जिसके विरोध में इस तरह की आवाजें बुलंद नहीं हुईं. वह था तमाम संगठनों द्वारा ओपिनियन पोल और चुनाव पूर्व सर्वे के प्रसारण पर रोक. इन पर रोक के पक्ष में तमाम राजनीतिक दल और नेता भी थे. तर्क यह दिया गया कि इससे मतदाता गड़बड़ा जाता है और भ्रमित हो जाता है - क्या भारतीय मतदाता को यह दल बेवकूफ मानते हैं? यदि हां तो फिर ऐसे लोगों को वोट देने का हक नहीं होना चाहिये अन्यथा इस पर रोक गलत है. दूसरा यह कि भारत में सर्वे और पोल के परिणाम ठीक नहीं होते - यदि ठीक नहीं होते तो राजनीतिक दलों को इससे डरने की कोई आवश्यकता ही नहीं है और यदि ठीक होते हैं तो यह और भी अच्छा है हर राजनीतिक दल अपने पक्ष के लिये नकल...