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Showing posts from March, 2009

भारत की वर्तमान दशा पर एक लेख.

यह लेख कुछ पहले मेरे एक मित्र ने लिखा था, जो कि यूनिकोड में पहले कन्वर्ट नहीं कर पाया था अब जाकर इसे यूनिकोड में बदल पाया हूँ, आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत। विगत 15 अगस्त को भारत को स्वतन्त्र हुये 61 वर्ष पूरे हो गये, स्वतन्त्र भारत की एक पीढ़ी अपने शैशव, युवावस्था को पूर्ण कर अपनी वृद्धावस्था में प्रवेश कर गयी।। स्वातन्त्र्य के इन वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, का विश्लेषण करना आज अपरिहार्य हो गया है। आजादी के लिये लड़ने वाले दीवानों ने क्या इसी स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी? हमारा देश एक ऐसे देश में बदल चुका है जहाँ हजारों नियम-कानून हैं, लेकिन एक भी कानून पूरी ईमानदारी से लागू नहीं होता। आजादी के बाद से सैकड़ों घोटाले हो चुके हैं, लेकिन इनमें शामिल एक भी बड़े आदमी को सजा नहीं हुई, यह अलग बात है कि जाने-अनजाने में, मजबूरी वश इनके मोहरे बने छोटे कर्मचारी अवश्य सजा पा गये। जीप घोटाला, बैंक घोटाला, चीनी घोटाला, जमीन घोटाला, चारा घोटाला, शेयर घोटाला, तोप घोटाला, चारा घोटाला, दवा घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, डेयरी घोटाला, न जाने कितने घोटाले हो चुके हैं, कर देने वाली गरीब जनता के पैसे को...

भगत सिंह की शहादत का दिन

आज भगत सिंह की शहादत का दिन है। आइये मिलकर नमन करें उस महान पुरूष को और उनके साथ अन्य अमर शहीदों को जिनके बलिदान के कारण हमें यह स्वतंत्रता नसीब हुई। यह अलग बात है कि हम इसे महफूज न रख पाये।

आ गए लोक सभा चुनाव 2009

एक बार फिर देश तैयार है सैकडों करोड़ रुपए चुनाव में व्यय करने के लिए। फिर वही दल, वही मुखौटे, वही आयाराम-गयाराम। फिर वही दल-बदल दिल-बदल की आड़ में। फिर वही गुंडे-मवाली, जब तक सामने वाले के यहाँ थे अपराधी थे, अब तौबा कर ली। फिर अपराध जब किया था जब सामने वाले के यहाँ थे, अब तो नहीं किया। फिर देश को आगे ले जाने के सपने, साठ सालों में नहीं कर पाये तो अब क्या कर पायेंगे। जब आबादी तिहाई थी तब कुछ नहीं उखाड़ सके तो अब क्या उखाडेंगे। जनता तो पहले भी शोषित थी अब भी रहेगी। फर्क इतना है कि शोषण करने वाले चेहरे बदल जाते हैं। पहले भी बेवकूफ बनाया जाता था अब भी बनाया जाएगा। स्विस सरकार कहती है कि आप चाहे तो अपने देश के भ्रष्टाचारियों का पैसा ले आयें लेकिन यहाँ कौन करेगा और क्यों करेगा। नशा सीमापार से आता है, बॉर्डर पर पोस्टिंग के लिए क्या कुछ नहीं किया जाता। पुलिस जब अपराधियों से मिल जाए या ख़ुद उनके लोग अपराध में लिप्त हों तो देश कैसे चलेगा। सी बी आई राशन घोटाले की जांच को मना कर देती है, बहुत खूब। क्योंकि अपराध बड़ा है, इसलिए बहुत बड़ा अपराध करो और जांच भी नहीं होगी। इस के खिलाफ कुछ हो भी नहीं सक...

वरुण के भाषण से तकलीफ क्यों

वरुण गांधी ने ऐसा क्या कह दिया जो इतनी हाय-तौबा मच गई। जब मुलायम सिंह यह कहते हैं कि वह मुस्लिमों के विरुद्ध कोई काम नहीं करेंगे और देव-बंद जाकर मौलाना से मिलते हैं तो वह धार्मिक भावनाएं भड़काने में नहीं आता। जातियों का जहर घोलना भावनाएं भड़काने में नहीं आता। हिन्दू होने पर गर्व करना और हिन्दुओं पर आक्रमण होने पर उनकी रक्षा करने की बात करना जहर घोलना है। अगर वरुण यह कहते कि वह बाकी धर्म वालों पर हमला करेंगे तो उन्हें इसके लिए सजा मिलना चाहिए, लेकिन अपनी रक्षा की बात करने पर सजा क्यों। रही बात धार्मिक भावनाएं भड़काने की तो हर दल यही करता है। हर वह नैतिक-अनैतिक काम राजनीतिक दल करते हैं जिससे उन्हें वोट मिलें। टिकट तो जाति और धर्म के ऊपर ही दिए जाते हैं। जब सब कुछ जाति और धर्म पर चल रहा है तो वरुण को बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है।

मंगल ग्रह वासियों की निगाह में चुनाव

मंगल ग्रह के प्राणियों ने एक बार गलती से अपनी दूरबीन का मुंह पृथ्वी की तरफ मोड़ दिया, उस पर कोढ़ पर खाज यह कि उस दूरबीन के दायरे में भारत आ गया. ऊपर से उन दिनों आम चुनाव होने वाले थे. भारत झंडों, बैनरों, पोस्टरों से पट गया था. टैम्पो हाई हो रहा था, गली-गली में शोर हो रहा था. किसी-किसी स्थान पर लोगों की भीड़ इकठ्ठी हो रही थी और कहीं-कहीं लोगों का एक रेला सा जाता दिखाई दे रहा था. मंगल ग्रह के प्राणी ने जल्दी से अपने इर्द-गिर्द के प्राणियों को आवाज दी और उन्हें भी यह दुर्लभ नजारा दिखाया. जब उन प्राणियों की समझ में कुछ नहीं आया तो फिर वह उसी पृथ्वी रिटर्न मंगली के पास गये और उसे सम्पूर्ण किस्सा बताकर इसके विवेचन की प्रार्थना की. पृथ्वी रिटर्न मंगली ने अपने साथियों पर एक उड़ती नजर डाली और बिल्कुल ऐसी नजरों से देखा जैसे कि अमेरिका से कोई प्रवासी भारतीय वापस भारत आकर अपने साथियों को देखता है. उसने बताना प्रारम्भ कर दिया-"अभी-अभी आप लोगों ने पृथ्वी के जिस हिस्से को देखा वह भारत है, जैसा कि मैं बता चुका हूं कि प्रवास के दौरान मेरा ठिकाना भारत ही था. इस देश भारत में पंचायती व्यवस्था लागू है, अर...

पन्द्रह साल की उमर में भंग रणवीर की वर्जिनिटी

आ........ पर खबर थी कि रणवीर की वर्जिनिटी पन्द्रह साल की उमर में भंग हो गई थी. यह खबर फ्लैश करने और वेब-साईट पर डालने का औचित्य क्या था. चैनल नैतिकता का रक्षक है, भगवा रंग (अब तो रंग भी नहीं छोड़े इन चैनल वालों ने) की खूब खबर लेता है, लेकिन इस खबर को दिखाने में कोई आपत्ति नहीं है. कल को अन्डर-गारमेन्ट का साइज भी बताया जा सकता है. यह भी बताया जा सकता है कि कंडोम प्रयोग किया गया या नहीं अथवा कोई अन्य गर्भ-निरोधक प्रयुक्त हुआ या फिर किया ही नहीं गया. था तो किसने किया और कौन सा किया. कंडोम था किस प्रकार था, कौन सा ब्रांड पसन्द है और किस कलर का पसन्द है. भारतीय पसन्द है या विदेशी. यदि महिला (माना जा सकता है कि बालिग होगी अन्यथा नाबालिग के साथ यौन सम्बन्ध बनाने में तो सम्भवत: बलात्कार का मामला बनता) बालिग थी तो उसने क्या प्रयोग किया इस पर भी शोध की पूरी गुंजाइश है. फिर थोड़े दिन बाद कोई महिला भी सामने आ सकती है जो यह दावा कर सकती है कि रणवीर की जो वर्जिनिटी भंग हुई थी, वह उसी के कारण हुई थी. और लोकप्रियता हासिल करने का यही आलम रहा तो वह दिन दूर नहीं कि किसी खबरिया चैनल पर कोई अभिनेत्री (?) यह ...

दंगे का आंखों देखा हाल

परसों एक दूसरे शहर जाना पड़ा. शाम को वापस आते समय रास्ते में देखा कि एक जगह काफी भीड़ इकट्ठी थी, जाम लग गया था. जानने पर पता चला कि वारावफात के रास्ते को लेकर कुछ विवाद हो रहा है. देखते ही देखते मुस्लिम सम्प्रदाय के काफी लोग एकत्र हो गये. मैं गाड़ी को न इधर ले जा सकता था और न उधर. गाड़ी से जैसे तैसे उतरा और एक गली की तरफ बढ़ गया. मेरे पास छुपकर खड़े रहने के अतिरिक्त और कोई चारा भी नहीं था. मिनटों में ही हजारों लोग जमा हो गये, और देखते ही देखते पहले पत्थर और फिर गोलिय़ां चलने लगीं. उनकी तरफ से ऐसी तैयारी लग रही थी जैसे वे किसी युद्ध में हिस्सा लेने जा रहे हों. जाहिर है कि उनमें से अधिकतर नाजायज असलहों से लैस थे. पुलिस की संख्या और तैयारी कम थी, लगता था कि उन्हें इस बात का भान ही नहीं था कि ऐसी घटना हो सकती है और इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पास हथियार होंगे. जो नारे लग रहे थे उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि यहां इस्लाम खतरे में आ गया है और उसके लिये यह लड़ाई लड़ी जा रही थी. उस समय वहां के हमलावर एकराय थे, किसी पार्टी और खेमे में नहीं बंटे थे और न ही पार्टी विशेष से सम्बन्धित व्यक्ति को निशाना ...

होली की बधाई

आज सभी देशवासियों को होली की बधाई।

अंधविश्वासों को बढ़ावा दे रहे हैं चैनल

कल रात धोखे से एक खबरिया चैनल लग गया. चैनल पर एक सज्जन के बारे में बताया जा रहा था कि वे ट्रांसपोर्टर थे और उनके धंधे को बुरी नजर लग गयी. फिर एक लड़का आया जिसने यह बताया कि वह बहुत अच्छा विद्यार्थी था लेकिन उसके एक रिश्तेदार की बुरी नजर लग गयी. ऐसे ही दो-तीन लोग और दिखाई दिये जो अपने साथ हुई दुर्घटनाओं के बारे में बता रहे थे, इसके बाद फिर पीछे से इस का इलाज बताया गया कि एक यन्त्र खरीदो और बुरी नजर से बचो. बुरी नजर इस यन्त्र से टकरा कर लौट जाती है. मुझे बड़ा अजीब भी लगा और कुछ हद तक रोचक भी. फिर एक चैनल पर शिव भक्त दिखाई देता है जो यह कहता है कि उसे शिव का आशीर्वाद प्राप्त है और वह भगवान शिव के आशीर्वाद को एक कवच में पिरो चुका है जो भी उस कवच को धारण करेगा उसे व्यापार में, सामाजिक जीवन में लाभ की प्राप्ति होगी. इसी प्रकार हनुमान कवच, दुर्गा कवच और सांई कवच बेचे जा रहे हैं. यह खबरिया चैनल वैसे तो बड़े धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने का दावा करते हैं लेकिन मुनाफा कमाने के लिये कोई भी हथकंडा अपनाने से नहीं चूकते. पैसे कमाने की होड़ में यह भी नहीं देखते कि इन विज्ञापनों से उन्हें तो आय...

धर्म निरपेक्षता का एक और उदाहरण प्रस्तुत किया मुलायम सिंह ने

धर्म निरपेक्षता का एक और उदाहरण प्रस्तुत किया मुलायम सिंह ने . एक पोस्ट में मैंने धर्म - निरपेक्षता के बारे में बहुत थोड़ा सा लिखा था जिसे पढ़कर कई पाठकों ने कड़ी आपत्ति जताई . अब असली धर्म - निरपेक्षता क्या है यह देखिये - उलेमाओं के चरण पखारना वोटों की खातिर , सच्चर कमेटी लागू करने का आश्वासन , उर्दू अध्यापकों की भर्ती पर इतराना और बढा़ने की घोषणा ( यह अलग बात है कि संस्कृत धीरे - धीरे मरती रहे ), मुसलमानों के विरोध में कभी कोई काम न करने की घोषणा ( जैसे कि अभी तक मुसलमानों के खिलाफ ही सारे काम हुये हैं - इसके बावजूद मुसलमानों की जनसंख्या में हिन्दुओं के मुकाबले कई गुना वृद्धि हुई है समानुपात में ). इसका दूसरा पहलू भी देखिये इस पर न तो हिन्दू कुछ बोलेंगे न धर्मनिरपेक्षी ( शायद यही असली धर्मनिरपेक्षता है ), फिर अगर यही काम कोई हिन्दू नेता किसी हिन्दू धर्माचार्य के पास जाकर करता और ऐसे ही आश्वासन हिन्दुओं के लिये देता तो अब तक तमाम चैनल वाले ...

लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला कहीं कोई सुनियोजित षड़यन्त्र तो नहीं ??

लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला कहीं कोई सुनियोजित षड़यन्त्र तो नहीं है ? तीन मार्च को जो हमला श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हुआ , वह बिल्कुल उसी तरह से स्टेज किया गया जैसा कि मुम्बई में हुआ था . इसके बाद ऐसे भी बयान आये कि यह लोग बाहर से आये थे , भारत का नाम भी लपेटने की कोशिश की गयी . यह भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में भारत के विरुद्ध कुछ सबूत गढ़े जायें . यद्यपि भारत के सत्ताधारी नेता अपनी पीठ स्वयं थपथपा रहे हैं कि भारत ने इस बार पाकिस्तान को बिना किसी शक्ति प्रदर्शन के और रुपये की बर्बादी किये बिना घुटने टिकवा दिये , लेकिन सत्य यह है कि न तो एनडीए सरकार ही कुछ कर पायी और न वर्तमान . यदि मुम्बई हमले में विदेशी और इतनी बड़ी संख्या में लोग नहीं मारे जाते तो इतना हो - हल्ला नहीं मचता और एक बार फिर निन्दा प्रस्ताव पारित हो जाता . इस बार भी क्या हुआ कुछ नहीं , हमारे यहां के कुछ नेता अमेरिका और ब्रिटेन का मुंह जोहते रहे . उन्हें इस...

चुनावी विज्ञापनों पर लुटाया जा रहा जनता का धन..

चुनाव आसन्न हैं , हर चैनल और अखबार में सरकारों का विज्ञापन आ रहा है . पिछली सरकार अर्थात एनडीए के समय इंडिया शाइन खूब दिखाई देता था अब भारत की प्रगति हर चैनल पर चिल्ला रही है . उत्तरप्रदेश की सरकार भी अपनी नीतियों का बखान करती हुई दिखाई दे रही है . जाहिर है कि निजी चैनल इन विज्ञापनों को मुफ्त में तो प्रसारित करने से रहे , हर रोज करोड़ों रुपये लुटाये जा रहे होंगे इन विज्ञापनों पर . किसकी मेहनत की कमाई है , किसकी जेब के रुपये हैं यह . जो भी सरकार रहे , दोनों हाथों से पैसा लुटाती है . अभी ओबामा ने हर हफ्ते किये जाने वाले कार्यों - व्ययों का ब्यौरा देना प्रारम्भ कर दिया है , लेकिन भारत सरकार की गोपनीयता का आलम देखिए कि मन्त्री के रिश्तेदारों की सम्पत्ति को भी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता . धन्य है भारत देश .

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन.

पिंक पैंटी को लेकर हमारे यहां बहुत बवाल हुआ. बहुत सारी महिलाओं और उससे अधिक पुरुषों ने पिंक पैंटी ब्रिगेड को भरपूर समर्थन दिया और इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का ध्वजवाहक बताया. पिंक पैंटी भेजने का विरोध करने के लिये अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विरोध बताया और तुलना हिटलर से कर दी. लेकिन पिछले दिनों एक ऐसा कार्य किया गया जो वास्तविक अर्थों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा था और जिसके विरोध में इस तरह की आवाजें बुलंद नहीं हुईं. वह था तमाम संगठनों द्वारा ओपिनियन पोल और चुनाव पूर्व सर्वे के प्रसारण पर रोक. इन पर रोक के पक्ष में तमाम राजनीतिक दल और नेता भी थे. तर्क यह दिया गया कि इससे मतदाता गड़बड़ा जाता है और भ्रमित हो जाता है - क्या भारतीय मतदाता को यह दल बेवकूफ मानते हैं? यदि हां तो फिर ऐसे लोगों को वोट देने का हक नहीं होना चाहिये अन्यथा इस पर रोक गलत है. दूसरा यह कि भारत में सर्वे और पोल के परिणाम ठीक नहीं होते - यदि ठीक नहीं होते तो राजनीतिक दलों को इससे डरने की कोई आवश्यकता ही नहीं है और यदि ठीक होते हैं तो यह और भी अच्छा है हर राजनीतिक दल अपने पक्ष के लिये नकल...

एक और कैद

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एक कैद वह थी और एक यह है। कंटीले तारों की बाड़ में बंद हिरन का बच्चा।