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Showing posts from January, 2009

नेताओं की डगर पे चमचों दिखाओ चल के

राहुल भैया खूब पैरोडी करते हैं, मैंने भी "इन्साफ की डगर पे बच्चों दिखाओ चल के" की पैरोडी कहीं पढ़ी थी, जिसकी दूसरी पंक्ति याद रह गयी "यह देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के". कुछ मूड बना और इतने सुन्दर गीत की जोड़-तोड़ मैंने कुछ यूं कर दी, सिर्फ इसलिये कि मुझे मूल पैरोडी याद नहीं आ रही थी. नेताओं की डगर पे चमचों दिखाओ चल के यह देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के दुनिया की बात सहना और कुछ न मुंह से कहना रूई कान में तुम देके आगे को बढ़ते रहना रख दोगे एक दिन तुम मुंह सब के बंद कर के नेताओं की डगर पे ............. अपने हो या पराये कोई न बचने पाये डाइजेशन देखो तुम्हारा हर्गिज न गड़बड़ाये मौका बड़ा कठिन है, खाना संभल संभल के नेताओं की डगर पे ............. भाई हो या भतीजा तुम सबका ध्यान रखना फुल सात पीढियों का तुम इन्तजाम रखना स्विस बैंक की तिजोरी तुम खूब रखना भर के नेताओं की डगर पे चमचों दिखाओ चल के यह देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के

भारत के लोगों की बुद्धिमानी की एक मिसाल

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बरेली की एक और दिलचस्प घटना का जिक्र करना चाहूंगा.मुझे एक पाश कालोनी कहे जाने वाले मुहल्ले में रुकने का मौका मिला. मैं जहां रुका था वहीं पर चार-छ: मकानों के आगे उ०प्र०आवास विकास परिषद का एक मकान था जिसमें कुछ दुकानें थीं. मकान एक मुख्य सड़क पर था, जिसके कारण तीनों दुकानें काफी चला करती थीं. एक दिन उन दुकानों के आगे लगे हुये शटर की जगह दीवार चुनी हुई दिखाई दी, दूसरी दुकान के आगे चार-पांच ईंटें रखकर चुन दी गयी थीं जिससे ऐसा लग रहा था कि मानो किसी कार के खड़े करने के लिये गैरेज बनाया गया हो. दूसरे दिन वह ईंटें हटाई जा चुकी थीं, दीवार मानो जादू के जोर से गायब हो चुकी थीं. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आखिर मकान मालिक ने ऐसा क्यों किया कि दुकानों को बन्द करने के लिये एक दिन ईंटों की दीवार चुनवाई और एक दिन बाद वह दीवार तुड़वा दी गयी. ऐसा भी नहीं था कि मकान मालिक का दिमागी तवाजन गड़बड़ा गया हो, वह बिल्कुल दुरुस्त था. फिर जब एक-दो लोगों से पूछा तो यह कहानी निकल कर सामने आई कि चूंकि यह मकान आवासीय इलाके में था और लीजहोल्ड पर था, इसे फ्रीहोल्ड कराने के बाद इसका पंजीकरण होना था. चूंकि उत्तर प्रदेश में अब मक...

दरोगा ने किया अपराध

पिछले दिनों मुझे एक बार फिर बरेली जाने का सौभाग्य मिला, जिसे अब कुछ लोग बरेली शरीफ लिखने और बदलने में लगे हैं। पहली घटना - श्यामगंज चौराहे पर वन-वे ट्रैफिक है चार पहिया वाहनों के लिए, लेकिन पुलिस-प्रशासन की सरकारी गाडियाँ निर्बाध रूप से वन-वे में घुस रही हैं। हाथी का झंडा लगी गाडियाँ, पुलिस का निशान लगी गाडियाँ और पुलिस की वर्दी और टोपी से युक्त गाडियाँ भी धड़-धडाती हुई घुसती जा रही हैं। एक गाड़ी के पीछे मैंने अपनी गाड़ी बढ़ा दी, ट्रैफिक सिपाही ने रोका और कहा कि वन-वे है, मैंने कहा आगे जो ऐडीएम साहब जा रहे हैं मैं उनके साथ हूँ, नतीजा मैं भी वन-वे में से निकल आया। दूसरी घटना - एस०पी० साहब को कहीं जाना था, जाम में फँस गए, कैसे सहन होता कि ख़ास को आम वाली दिक्कतें सहनी पड़ें, नतीजा कई व्यापारियों के विरुद्ध एफ०आई०आर० दर्ज और काफी हद तक अतिक्रमण हट गया। प्रश्न यह कि इससे पहले जिन अधिकारियों ने अतिक्रमण नहीं हटवाया तो नि-संदेह उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया क्योंकि जिन नियमों-कानूनों के अंतर्गत जो कार्रवाई अभी की गई है वह पहले किया जाना चाहिए थी, तो जिन लोगों ने अपने कर्तव्यों का ...

क्या श्रीराम सेना ने जो किया उसकी निंदा उचित है?

मीडिया में बहुत होहल्ला इस बात पर हो रहा है कि कुछ लोग जो भगवा ब्रिगेड के सदस्य हैं , जिन्होंने लड़कियों के साथ मारपीट की , वह बिल्कुल नाजायज है और किसी को हक़ नहीं है कि इस तरह से मार - पीट की जाए । मैं भी सहमत हूँ कि यह बिल्कुल नाजायज है , लेकिन इस पर मुझे मीडिया का रवैया अखरता है । यह मीडिया तब कहाँ थी जब जम्मू - कश्मीर में कुछ लड़कियों के चेहरे पर इसलिए तेजाब डाल दिया जाता है कि वे बुरका नहीं पहनतीं । इस मीडिया को उस समय कुछ दिखाई क्यों नहीं देता जब तसलीमा के ऊपर दो मुस्लिम विधायक हमला कर देते हैं , तब मीडिया को हरा रंग और हरी ब्रिगेड नजर क्यों नहीं आती । कैसा दोहरा चरित्र है यह , अगर चार - छ : हिन्दू नासमझी में इस तरह की घटना अंजाम दे देते हैं तो भगवा गुंडे , भगवा कहर , भगवा ब्रिगेड और मुस्लिम विधायक संगठित ढंग से जो कुछ करें वह नजर - अंदाज कर दिया जाता है । इन घटनाओं को लेकर तो मीडिया घंटों बहस - मुबाहिसे करती रहती है , लेकिन दूस...

क्या वे शहीद नहीं हैं जिनके शरीर पर वर्दी नहीं थी , पुलिस अधिकारी नशे के कारोबार में लिप्त

मुम्बई आतंकवादी हमलों के शहीदों के प्रति पूरा सम्मान रखते हुये मैं अपने आपको यह सवाल पूछने से रोक नहीं पा रहा हूं कि जिन पुलिस अधिकारियों की हत्या आतंकवादियों ने कर दी, उनके प्रति तो सरकार ने अपनी जिम्मेदारी निभाकर इतिश्री कर ली. लेकिन बिल्कुल इसी तर्ज पर मुम्बई में जिन आम लोगों के सीने आतंकवादियों ने छलनी कर दिये, उनके लिये सरकार ने क्या किया, उस किशोर को मरणोपरान्त कोई सम्मान क्यों नहीं दिया जा सका, जिसने नारीमन हाउस पर सुरक्षा बलों की अहम मदद की. जो तीन पुलिस अधिकारी एक साथ शहीद हुये (या कहा जाये जिनकी हत्या हुई) वह तो सम्मान के हकदार हैं, क्या मात्र इसलिये कि उनके शरीरों पर पुलिस की वर्दी थी, लेकिन जो वर्दी के बिना शहीद हुये, क्या वह किसी सम्मान के हकदार नहीं हैं? कुछ दिनों पहले पंजाब पुलिस का एक अधिकारी ड्रग्स की तस्करी में लिप्त पाया गया और अब मुम्बई में एक आई०पी०एस० अधिकारी के यहां से सैंतीस किलो हेरोइन की बरामदी हुई है. इससे क्या मेरी इस बात को बल नहीं मिलता कि अगर पुलिस नाम की संस्था को खत्म कर दिया जाये तो सत्तर फीसदी अपराध स्वत: ही खत्म हो जायेंगे.कृपया मेरी पिछली पोस्ट देखे...

गणतंत्र दिवस पर कुछ पुष्प

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पुलिसिया न्याय और कानून

बड़े भाई (अमर सिंह नहीं) अनिल पुसदकर जी के लेखों में नक्सली समस्या के बारे में लगातार गहन विश्लेषण किया जाता रहा है और नक्सली समस्या तथा पुलिस के आचरण के बारे में भी जमीनी हकीकत उजागर की जा रही है. मैंने भी उनके लेख पर टिप्पणी की थी कि सारा देश पता नहीं नक्सली क्यों नहीं बन जाता. इसका जिक्र मैं यहां इसलिये कर रहा हूं क्योंकि इस व्यवस्था को देखकर जो चुभन अन्दर उठती है उससे कभी कभी तो ऐसा लगता है कि मैं भी इस दमन के आगे बेबस होकर क्यों जी रहा हूं मैं भी क्यों उनमें शामिल नहीं हो जाता . अभी कल ही की बात थी जब एक जगह भीड़ लगी थी, आगे बढ़कर देखने पर पता चला कि दो पुलिसिये चाय की दुकान पर काम करने वाले एक गरीब आदमी को पीट रहे थे. पूछताछ करने पर मालूम चला कि उस आम आदमी ने उन नामालूम पुलिसियों के किसी काम को करने को मना कर दिया जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा था. आगे बढ़ता तो शायद मेरी पीठ पर भी उनकी लाठी पड़ने से न चूकती. लिहाजा अन्य पुंसत्वहीन लोगों की भांति मैं भी तमाशबीन खड़ा रहा. फिर भी जब मन नहीं माना तो १०० नम्बर डायल किया और पूरी बात बतायी तो उत्तर मिला कि पुलिस के बीच में क्यों पड़ रह...

इस फोटो के बारे में कुछ बताएं

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पहला फोटो दस वर्ष पहले लिया था घर में लगे एक गुलाब का , कैसा लगा। बहुत नन्हीं सी कली थी, लेंस के आगे एक घरेलू magnifying glass रखकर फोटो क्लिक कर दिया. यह फोटो भी लगभग दस वर्ष पहले लिया था , उस समय तक डिजीटल तकनीक भारत में सामान्यत: उपलब्ध नहीं थी । इस फोटो को गौर से देख कर आप लोग इस फोटो के बारे में कुछ बताएं फिर मैं इस के बारे में बताऊंगा । इस फोटो में कोई भी मोडी फिकेशन नहीं किया गया है , यह भी सिर्फ स्कैन कर पोस्ट कर दिया है ।

कडुवे सच की एक और बानगी

जिन दिनों मुम्बई में हमला हुआ था उन दिनों मैं अपने एक मुस्लिम मित्र (आश्चर्य न करें) के बच्चे को देखने एक अस्पताल में गया जो एक मुस्लिम बहुल इलाके में था. वहां काम करने वाले लड़के इस बात को कहते हुये अत्यन्त गर्व महसूस कर रहे थे कि ताज, ओबेराय या नारीमन हाउस में दो-दो, तीन-तीन लड़ाकों (मुस्लिम युवाओं) ने कैसे कमांडों को नाकों चने चबा दिये और इतने दिनों तक मोर्चा लेते रहे. जाहिर है इस प्रकार की मानसिकता इस देश को कहां ले जा रही है, इस पर सभी को विशेष तौर पर मुस्लिमों को विचार करने और फिर इस मानसिकता को दूर करने की आवश्यकता होगी, अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि भारत में भी अफगानी कबीलाई इलाकों की तरह लड़कियों को स्कूल न भेजने, पुरुषों को दाढ़ी रखने और न जाने क्या क्या तालिबानी हुक्म झेलने पड़ेंगे और यह भी हो सकता है कि यहां भी तालिबानी व्यवस्था लागू हो जाये. यह एक अटल सत्य है कि मुस्लिम समाज में जो लोग इन कट्टर पंथियों से दूर रहना चाहते हैं उन्हें संख्या बल से दबा दिया जाता है .

कडुवा सच

बहुत से मुस्लिमों से क्षमा के साथ:-(क्षमा इसलिये क्योंकि मैं जानता हूं कि सभी ऐसे नहीं हैं, लेकिन मजबूरी वश सामुदायिक संज्ञा के रूप में लेना पड़ रहा है) १- इस देश को पाकिस्तान से कोई खतरा नहीं है, क्योंकि राजनीतिक दलों ने भारत में ही कई कबीलाई इलाके बनवा दिये हैं अर्थात वोटों के सौदागरों ने कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में कानून व्यवस्था को ताक पर रखवा दिया है. किसी पुलिस वाले से मालूम कर देखें कि उनके लिये किसी मुस्लिम बहुल इलाके में से किसी मुस्लिम अभियुक्त की गिरफ्तारी का प्रयास करते समय कैसा प्रतीत होता है. २-विगत दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, अमरोहा, बदायूं, रामपुर जाने का मौका मिला. ऐसा किस देश में होता होगा जहां गांवों में बहुसंख्यक समुदाय(?) के लोग अपने धार्मिक कार्यक्रमों में लाउडस्पीकर भी न लगा पाते हों और प्रशासन भी उन्हें यह कहकर दुत्कारता हो कि दंगा कराओगे क्या और कोई भी नई परम्परा नहीं डालने दी जायेगी. मुस्लिम बहुल इलाकों में तथाकथित बहुसंख्यक किस प्रकार रहते हैं, जाकर स्वयं देख सकते हैं. ३-२००७ में एक एस०डी०एम० जोकि एक मुस्लिम था, ने बदायूं में दुर्गा जागरण बन्द करा...

थाने के सामने से गुजरता आटो

इस वीडियो को मैंने अपने मोबाइल से लिया था, इसे डाउनलोड कर १००% साइज में चलाकर देखें. मैं एक मित्र के यहां पश्चिमी उत्तरप्रदेश के एक शहर गया था, जब मैं उसके साथ जा रहा था तो देखा कि एक प्रसिद्ध कान्वेन्ट स्कूल में लगे हुये आटो में बच्चे लटक कर जा रहे थे और जहां से यह आटो गुजर रहा था वहीं पर एक थाना या चौकी है. मैंने पीछे बैठे हुये थोड़ा सा वीडियो शूट किया जो आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है. जब कभी कोई दुर्घटना हो जाती है तो आरटीओ, पुलिस-प्रशासन सख्ती दिखाने की कोशिश करने लगता है, लेकिन आठ दिन बाद फिर वही ढर्रा, क्योंकि सभी जगह वसूली करने को रिकवरी अफसर बैठे हुये हैं. कभी-कभी तो ताज्जुब होता है कि आजादी क्यों मिल गयी और कैसे मिल गयी?

मंगल ग्रह के प्राणी के कुछ संस्मरण

एक बार मंगल ग्रह का एक प्राणी भूल से रास्ता भटक कर पृथ्वी पर आ गया. कुछ समय बाद वह वापस अपने ग्रह मंगल पर लौटा. मंगल वासियों ने उसे घेर लिया और पृथ्वी नाम के ग्रह का कोई रोचक वृतान्त्र सुनाने की मांग करने लगे. मंगल ग्रह के उस वाशिन्दे ने सुनाना प्रारम्भ किया :-"पृथ्वी नाम के इस ग्रह पर विभिन्न जातियों के जीव-जन्तु पाये जाते हैं, इनमें दो-पाये, चौपाये, बिना-पाये और सबकुछ पाये शामिल हैं. लेकिन इन सबमें सबसे खतरनाक दो-पाया जानवर है जिसे आदमी कहा जाता है, लेकिन कहीं कहीं तो यह हैवानियत की हदें भी पार कर देता है. इन दो-पायों में एक नेता नाम की ब्रीड भारत नाम के देश में पायी जाती है. नेता बनने के लिये सिर्फ दो-पाया होना आवश्यक है. नेता कोई भी बन सकता है. इसके लिये कोई भी शैक्षिक योग्यता का होना आवश्यक नहीं है, यद्यपि सबसे छोटी सरकारी नौकरी के लिये भी कम से कम आठवां पास होना आवश्यक होता है. कामी (मतलब काम करने वाला)-निठल्ला, चोर-साहूकार, अमीर-गरीब, पढ़ालिखा-अंगूठाटेक, पाकेटमार-डकैत, महिला-पुरुष. लेकिन अगर मार-पीट-चोरी-डकैती-हत्या-बलात्कार-गबन-घोटालों का तजुर्बा रखता हो यह उसके लिये अधिमान...

नेताजी की निगाह में घोटाला

नेताजी से एक पत्रकार ने सवाल कर डाला आपने भी तो किया था एक घोटाला नेताजी ने उपेक्षापूर्ण निगाह पत्रकार पर दौड़ायी फिर उनकी जुबान धड़धड़ायी माई डियर हनी इट इज जस्ट अ सर्कुलेशन आफ मनी जिस खरदिमाग को अर्थशास्त्र का यह सिद्धान्त समझ में नहीं आता है वही घोटाला-घोटाला चिल्लाता है पहले सिद्धान्त पर कायम रहते हुये हमने मनी को दौड़ा दिया है उसे भारत से स्विटजरलैंड तक पहुंचा दिया है दूसरा सिद्धान्त यह कहता है कि नयी मुद्रा बक्सों में बन्द होकर रहती है इस पर भी हम खरे उतरे हैं विश्वास न हो तो चल कर देख लो नयी मुद्रा से हमारे घर के सभी बक्से भरे हैं सिद्धान्तों पर अमल करने को तुम लोग कहते हो घोटाला ऐसा कहकर तुमने तो जनता जनार्दन का ही अपमान कर डाला अरे खर-दिमागों अगर हमने किया होता कोई गड़बड़-झाला तो क्या जनता हमें चुनती देश को स्वर्ग बनाने के सपने बुनती और तो और हमारी पिछली तीन पीढियां क्या ऐसे ही चुनी जा रही हैं जनता को हमारी नीतियां पसन्द आ रही हैं इसलिये ज्यादा भाव मत खाओ जनता के फैसले पर उंगली मत उठाओ

कुछ और फोटो

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आप लोगों से प्रोत्साहन पाकर कुछ और फोटो पोस्ट कर रहा हूँ, पेड़-पौधों-पशु-पक्षियों-पुरानी इमारतों और नदी-तालाबों से मुझे अपनी तरफ खींचती हैं। कुछ और फोटो जो साधारण SLR से खींचे थे, स्कैन कर आगे किसी समय पोस्ट करूंगा।

कुछ फोटो

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अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी - महिलाओं के शोषण पर

एक अफगानी महिला साबरा ने भारतीय सेना के डाक्टर चन्द्रशेखर पंत (आजकल पिथौरागढ में तैनात) पर यह आरोप लगाया है कि इस डाक्टर ने उससे झूठ बोलकर साबरा से शादी कर ली. इस महिला ने अपनी शादी के सबूतों के बतौर शादी के फोटो भी प्रस्तुत किये. महिला का कहना था कि वह भारत आकर पिथौरागढ के जिलाधिकारी से मिली, गृह मन्त्रालय के अधिकारियों से मिली लेकिन अभी तक कोई लाभ नहीं हुआ. इस महिला ने चन्द्रशेखर पंत की यूनिट में जाकर उसके कमांडिंग आफीसर से मिलने की कोशिश की लेकिन कमांडिंग आफीसर से उसकी मुलाकात नहीं हो सकी. यद्यपि महिला आयोग ने इस महिला की शिकायत पर कुछ कार्रवाई करने का प्रयास किया है. साबरा का यह भी कहना था कि उसे यह प्रलोभन भी दिया गया कि वह कुछ रुपये लेकर मामले को खत्म करे. लेकिन साबरा का कहना है कि वह अपने साथ किये गये इस धोखे की सजा चन्द्रशेखर पन्त को दिलाकर ही दम लेगी. यदि साबरा द्वारा लगाये गये आरोप सत्य हैं तो निश्चित रूप से ही यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. इस मामले में अधिकारियों द्वारा दिखाई जा रही संवेदन-हीनता तो घोर निन्दनीय है. इस मामले में निष्पक्ष जांच कर यदि चन्द्रशेखर पंत दोषी पाये...

पुलिस द्वारा किया गया एनकाउंटर या हत्या

पुलिस ने एक बार फिर अपना क्रूर चेहरा दिखाया उत्तरान्चल के खटींमा में। इस घटना में एक युवक (जिस पर अपनी प्रेमिका के साथ मिलकर एक हत्या करने का आरोप भी था) ने अपनी मांग को पूरा कराने के लिये सरे-बाजार अपनी प्रेमिका की बहन के सिर पर देसी पिस्तौल लगा दी (लगभग उसी तरह जैसे कि राहुल राज ने किया था अन्तर इतना है कि राहुल राज पर किसी हत्या का आरोप भी नहीं था और न ही उसने किसी के सिर पर पिस्तौल लगाई थी)। कुछ ही देर में वहां तमाशबीन इकट्ठे हो गये और पुलिस वाले भी। पुलिस वालों ने उस युवक से बात करने की कोशिश की और जब उनके सब्र का बांध टूट गया तो कमांडो बनने की नाकाम चेष्टा की। और उनकी इस हरकत को देखकर उस युवक ने अपनी प्रेमिका की बहन पर गोली चला दी। इसके बाद क्या था बहादुर पुलिस ने उस युवक की भी हत्या कर दी। मैं यहां फिर उस युवक द्वारा की गयी वारदातों का समर्थन नहीं कर रहा, बल्कि यह कहना चाहता हूं कि जब स्वयं पुलिस ही कानून का पालन नहीं करती तो वह कानून का अलम्बरदार कैसे बन सकती है। बिल्कुल स्पष्ट बताया जाता है कि अपराधी को पकड़ने के लिये न्यूनतम बल प्रयोग किया जाना चाहिये, लेकिन चाहे वह राहुल राज ...

हड़तालों से देश में अफरा-तफरी मच गयी

हड़तालों से देश में अफरा-तफरी मच गयी है। आश्चर्य तब होता है जब पेट्रोलियम कंपनियों के अधिकारी हड़ताल पर जाते हैं. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था जब यह पता चला कि पेट्रोलियम कंपनी के ताजा-ताजा भर्ती हुए जूनियर मैनेजमेंट अधिकारी का वेतन एक लाख रुपये प्रति माह के आसपास था. इनकी कम्पनियां घाटे में हों या मुनाफे में, इन्हें हर वर्ष लाखों में बोनस मिलता है. अगर केन्द्र या राज्य सरकारों के सी-डी क्लास के कर्मचारी जिनका वेतन अधिकतम दस-पन्द्रह हजार होता होगा, हड़ताल करें तब भी समझ में आता है, लेकिन लाखों रुपये प्रतिमाह पाने वाले हड़ताल करें, मेरी मोटी बुद्धि से परे है. वकील भी हड़ताल पर हैं, वैसे भी भारतीय कानून और कानूनी प्रक्रिया को वकीलों का स्वर्ग कहा गया है। वकीलों को इससे कोई मतलब नहीं कि उनके मुवक्किलों को जल्द न्याय मिले. राम जेठमलानी के समय मुकदमों की समय-सीमा निर्धारित करने के लिये एक बिल लाने का प्रावधान किया जा रहा था, लेकिन वकीलों के सौभाग्य से वह बिल आ ही नहीं सका. वकीलों पर भी ए़स्मा लागू किया जाना चाहिये, इनकी जब इच्छा होती है हड़ताल पर चले जाते हैं, बिना यह सोचे कि एक मुवक्किल/एक गवाह जिसकी...

आह पड़ोसी वाह पड़ोसी

पड़ोसी शब्द से तो परिचित होंगे ही. किसी व्यक्ति के मुंह से अपने पड़ोसी के बारे में आपको धाराप्रवाह प्रशंसा सुनने को मिल सकती है तो किसी दिलजले के मुंह से कटुशब्दों की बौछार भी उसी तीव्रता के साथ सुनने को मिलेगी. मकान खरीदते समय या किराये पर लेते समय अच्छा पड़ोस पाना किसी भी व्यक्ति की सर्वप्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण इच्छा होती है, और ऐसे में उसकी छटी इन्द्री भी पूर्ण तीव्रता के साथ सक्रिय हो जाती है। पड़ोस कैसा है, पड़ोसी (विशेषत: पड़ोसन) कैसे हैं, उनका स्वभाव कैसा है, कितने बच्चे हैं, वगैरह-वगैरह, ऐसे कितने ही प्रश्नों की प्रश्नावली मकान लेने से पूर्व तैयार कर ली जाती है. अगर बेटियां जवान हैं तो पड़ोसी कुंवारा न हो, विवाहित हो तो फिर उसके लड़के न हों और हों तो फिर जवान न हों. अब अगर पड़ोस मिला है तो पडो़स तो मिलेगा ही और पडो़सी मुफ्त में। अब शर्मा जी के बराबर वाले वर्षों से वीरान पडे़ मकान में किरायेदार आये तो शर्मा जी को बड़ी प्रसन्नता हुई. शर्मा जी ने पड़ोसी महोदय से उनके घर को अपना ही समझने को क्या कह दिया कि बस पड़ोसी महोदय ने उनके इस कथन को ब्रह्मवाक्य मान लिया और इस पर बाकायदा अमल करना प्...

कम से कम कोई तो अच्छा काम किया मायावती ने

दिबियापुर, औरेया के थानाध्यक्ष होशियार सिंह को बर्खास्त कर कम से कम एक तो अच्छा काम किया मायावती सरकार ने. कानून व्यवस्था को बनाये रखने का पूरा दायित्व पुलिस प्रशासन का होता है, और यदि पुलिस ठीक से काम करने लगे तो आधे से ज्यादा अपराध तो अपने आप कम हो जायेंगे. होशियार सिंह एक चैनल पर आकर खुद को पाक-साफ बता रहे थे (जनाब को खबर थी कि शेखर तिवारी मनोज गुप्ता को उठाकर ले गया है, मनोज गुप्ता की पत्नी की शिकायत पर जब थाने से दरोगा आया तो थोड़ी देर बाद ही उसकी बात होशियार सिंह से हुई और वह वापस चला गया) और बड़े अधिकारियों तथा और पुलिस वालों की भी पोल खोल रहे थे कि चन्दा इकठ्ठा किया जा रहा था और फफूंद के थानाध्यक्ष के पास जमा किया गया था. भारत में हर कोई जानता है कि थाने में पोस्टिंग कैसे होती है और पैसा नीचे से ऊपर तक कैसे जाता है और जो एक बार थानेदार पा गया उसकी वित्तीय स्थिति कितनी मजबूत हो जाती है. जो पकड़ गया वो चोर बाकी सब साहूकार. एक सवाल यदि होशियार सिंह और शेखर तिवारी ने किसी आम आदमी को मार दिया होता तो क्या शेखर तिवारी गिरफ्तार होता और थानेदार बर्खास्त होता. दूसरा सवाल यदि चैनल को होशिया...

जब मुझे धार्मिक आयोजनों से वितृष्णा हुई

नवम्बर में मुझे एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला, यह एक धार्मिक कार्यक्रम था देवी भगवती की चौकी का. मैं निर्धारित समय पर पहुंच गया. कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ. कुछ देर बाद मुझे खीज होने लगी, खीज का असली कारण था तेज आवाज में बजते हुए लाउड स्पीकर्स. इन तेज बजने वाले साउंड सिस्टम मुझे हमेशा खीज पहुंचाते हैं, चाहे देवी-जागरण हो, रामायण हो, कोई सार्वजनिक सभा, विवाह समारोह हो या फिर मंदिरों की आरती, मस्जिदों में दी जाने वाली अजान या अन्य कोई कार्यक्रम. संभवत: कबीर दास जी ने इसी दिन के कहा था कांकर-पाथर जोड़ कर मसजिद दयी बनाय, ता चढ़ मुल्ला बांग दे का बहिरो भयो खुदाय. खैर जैसे तैसे मैंने इस शोर को प्रारब्ध समझ कर झेला. लेकिन इसके बाद जो हुआ उसे देखकर मेरे अन्दर अजीब सी वितृष्णा पैदा हो गयी. यह एक छोटी सी नृत्य नाटिका थी जिसमें एक व्यक्ति शिव का रूप रख आया और तांडव करने लगा, उसके साथ दो गण भी आये जो अजीब सी भाव-भंगिमायें बना रहे थे, कुछ देर बाद ही एक अन्य व्यक्ति आया जो काली का रूप बनाये हुये था उसने भी एक प्रसंग प्रस्तुत किया. यहां तक ठीक माना जा सकता है लेकिन इस दरमयान उस व्यक्ति ने जादूगरों क...