सीबीआई की विश्वसनीयता पर फिर प्रश्नचिन्ह। मुलायम का मामला हो या माया का या फिर अन्य दलों के राजनीतिक दलों के नेताओं के मामले हों , उच्चतम न्यायालय की लताड़ बताती है कि सीबीआई को राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करना पड़ता है . निठारी कांड में फैसला हुआ , सीधे शामिल दोषियों को फांसी हुई , सीबीआई के खाते में सफलता जुड़ी़ , अच्छा लगा . एक अहम सवाल इससे जुड़ा हुआ यह है कि जिन सरकारी अधिकारियों और पुलिस के जिन अफसरों ने इन्हें बचाने की कोशिश की , उन्हें अभियुक्त क्यों नहीं बनाया गया ? पंधेर को लेकर इतनी उदार क्यों है सीबीआई ? लेकिन बोफोर्स के अभियुक्तों को निकलने का मौका किसने दिया और क्यों दिया ? सिखों का नरसंहार का मामला ही देखिये , गवाह कहता है मैं गवाही देने के लिये तैयार हूं , लेकिन सीबीआई को गवाह का ही पता नहीं चलता . चारा कांड में असली गुनहगार अभी तक क्यों बचे हैं . लखूभाई पाठक का मामला हो या पनडुब्बी , सेंट कीट्स हो स्टैम्प घोटाला , नेता क्यों ...