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Showing posts from September, 2010

ठुमक चलत रामचन्द्र, बाजत पैंजनियां....

इस भजन को सुनिये और तुलसी बाबा ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी कि जहां देहिक, देविक, भौतिक क्लेश न हों, सभी लोग बराबर हों, सब को बराबरी का हक मिले, उस रामराज्य की तरफ बढ़ने की कामना में मेरा साथ दीजिये. जहां राष्ट्रप्रेम हो, सद्भाव हो, वास्तविक धर्मनिरपेक्षता हो, कानून का शासन हो, न्याय हो. सही मायनों में सर्वधर्म समभाव हो, सही अर्थों में बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय हो. यही मेरी कामना है ..

दिल्ली से गोरखपुर गरीबरथ से..

गोरखपुर जाना था. गोया तलाश की गयी कि कौन सी ट्रेन ठीक रहेगी. चंद ट्रेनों की खोज-खबर ली गयी. अन्तिम रूप से चयन किया गया अमृतसर-सहरसा गरीबरथ का. पूरी ट्रेन एअर-कण्डीशण्ड है. इसमें चेयरकार तथा एसी-थ्री टिअर कोच हैं. थ्री-टिअर में एक सीट रिजर्व कराई गयी. नियत दिन व समय पर यात्रा प्रारम्भ हुई. ट्रेन सही समय पर थी, इसलिये थोड़ी राहत महसूस हुई. अन्दर पहुंचने के बाद अपनी सीट पर विराजमान हुये. बाकी सब ठीक-ठाक ही था, लेकिन जो असल परेशानी थी, वह ट्रेन के अन्दर हुई. ट्रेन में कई परेशानियों से वास्ता पड़ता है. यदि आप सामान्य (अनारक्षित) बोगी में यात्रा कर रहे हैं, तो उसमें चढ़ना ही अपने आप में एवरेस्ट विजय के समान है. यहां तक कि सामान्य स्लीपर कोच में भी भीड़ घुसी रहती है. इस भीड़ में कुछ पुलिसवाले भी आपको मिलेंगे, जो अपनी वर्दी का फुल सदुपयोग कर आपको अपनी आरक्षित सीट पर बैठने का मौका देकर अहसान करते हैं. इन बोगियों में किन्नर भी मिल जायेंगे जो आपकी जेब को हल्का करने का नैतिक दायित्व पूरा करते हैं. रही बात टायलेट की, तो उसे आप खोल ही नहीं सकते. मैं भी कुछ अधिक जल्दी ही कर गया. खोलेंगे तो जब, जब वहां तक ...

हे राम, हा राम - चैनलों पर रामभक्तों का प्रस्तुतिकरण

हर चैनल पर इस तरह से दिखाया जा रहा है जैसे कि राम का नाम लेना गुनाह हो गया हो. बड़ी शर्मिन्दगी का अहसास कराया जाता है हर राम भक्त को. रामभक्तों की आस्था पर जैसे प्रश्न उठाये जा रहे हैं, क्या किसी अन्य धर्मावलम्बियों के साथ यह व्यवहार किया जा सकता है? कभी नहीं. राम का नाम लेना अपशब्द का पर्याय बनाया जा रहा है. कोई चैनल यह बताने को तैयार नहीं कि राम अयोध्या में पैदा नहीं हुये तो कहां हुये. क्या ऐसे ही प्रमाण मक्का-मदीना-जेरुसलम के बारे में मांगे जायेंगे. मन में क्षोभ है. एक पुरानी रचना प्रस्तुत कर रहा हूं. हे राम,तुम कौन हो, एक कवि की कल्पना, या इस देश के दुर्भाग्य की अल्पना, कौन हो तुम प्रमाण चाहिये, तुम्हारे होने का सूक्ष्म ही सही, इतिहास में कुछ परिमाण चाहिये, ऐतिहासिक प्रमाणों के बिना हम कुछ भी नहीं मानेंगे, यदि इतिहास में दर्ज नहीं होगा तो अपने बाप को भी बाप नहीं मानेंगे, क्यों नहीं कराया अपने पैदा होने का रजिस्ट्रेशन, बिना मतलब में करा दिया इतना फ्रस्ट्रेशन, पता नहीं बाल्मीकि ने तुमको कहां से खोज लिया और तुलसी ने क्यों रच दिया एक ग्रन्थ, संभवत: साम्प्रदायिकता की भट्टी में झोंकना चाह...

आमिर खान द्वारा सड़क पर मूत्र विसर्जन न करने की अपील........

एक बहुत अच्छा विज्ञापन आ रहा है जिसमें आमिर खान लोगों को बता रहे हैं कि क्या चीजें हमें नहीं करना चाहिये. इस विज्ञापन में अन्त में एक महिला दिखाई जाती है जो अपने पुत्र को सड़क किनारे मूत्र त्याग कराती है. इस विज्ञापन के पीछे मुख्य कारण है आने वाले कामनवेल्थ खेलों में भारत के लोगों की छवि उभारना. एक सवाल देश की सबसे अच्छी सड़कों में से किसी एक का भी नाम बताइये, देश के सबसे अच्छे नगरों में से किसी एक का भी नाम बताइये, जिसमें आपको लघु/दीर्घ शंका से निवृत होने के लिये पर्याप्त और ढ़ंग की प्रसाधन सुविधा सरकार ने बनवाई हो. अब यह मत कह दीजियेगा कि लोगों को घर से ही कुछ व्यवस्था कर चलना चाहिये. कितनी असुविधा और शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता है जब आपको किसी नगर या किसी मार्ग पर तीव्र लघु/दीर्घ शंका होती है और फिर आपको दूर-दूर तक निवृत होने के लिये कोई स्थान नहीं दिखाई देता. इस नारकीय स्थिति का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता. सभ्य और सुसंस्कृत होना किसे अच्छा नहीं लगता. लेकिन .....?

प्रधान जी की अपील ....

प्रधान जी अपील कर रहे हैं कि सभी पक्षों को न्यायालय का सम्मान करना चाहिये. बात अच्छी है. लेकिन प्रधान जी बताने की कृपा करेंगे कि शाहबानो मामले में कोर्ट द्वारा दिये गये निर्णय के लिये संविधान संशोधन कर क्यों पलट दिया गया. क्या उस समय कोर्ट की हैसियत में कोई अन्तर था और आज की तारीख में कुछ और अन्तर आ गया है. जिस देश में प्रधान जी खुद कहते हैं कि संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है, वहां आसानी से समझा जा सकता है कि देश किस तरफ जा रहा है. भगवान (माफ कीजियेगा) भला करे.

पहले गुर्जर और अब जाट

पहले गुर्जर और अब जाट. आरक्षण को लेकर फिर हंगामा. एक बार फिर वही प्रक्रिया दोहराई जायेगी जो राजस्थान में गुर्जरों और सरकार द्वारा अपनाई गई थी. बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है, जहां से शुरू होती है. आखिर आरक्षण को लेकर यह अंधी दौड़ कहां जाकर खत्म होगी. दर-असल आरक्षण का लाभ वास्तव में जिन्हें मिलना चाहिये उन्हें आज भी नहीं मिला है. यह पूरी प्रक्रिया ही फूलप्रूफ नहीं है. जातिगत अनहर्ताओं को खत्म करने के लिये गये प्रावधानों के राजनीतिबाजों द्वारा किये गये भरपूर दुरुपयोग से जातिगत वैमनस्यता को खूब बढ़ावा मिला है. धर्म, जाति और भाषा तथा कबीलाई संस्कृति के अन्य तत्वों के समागम से राजनीतिबाजों ने एक ऐसा भस्मासुर पैदा कर दिया है जो एक दिन खुद उन्हें ले डूबेगा, बस थोड़े समय का इन्तजार करना पड़ेगा. आरक्षण के द्वारा हर कोई एक बाईपास चाहता है सरकारी नौकरी में जाने का. कल गुर्जर थे, आज जाट हैं, कल कोई और जाति होगी. कुछ प्रदेशों में वोट-बैंक की खातिर मुस्लिमों को भी आरक्षण दिया जा चुका है. अब यह मुद्दा जिस स्थिति में पहुंच चुका है वहां से पीछे लौट सकना तो मुमकिन है ही नहीं. ऐसे में एक मात्र यही रास्ता बचता...

दिल्ली, बाढ़ और अटल बिहारी बाजपेई की सरकार...

अटल बिहारी बाजपेई जी की सरकार के समय एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना बनाई गयी थी और वह योजना थी नदियों के आपस में जोड़ने की. जिसका यह उद्देश्य था कि देश की सभी बड़ी नदियों को आपस में जोड़ दिया जाता जिससे कि पूरे देश में इन नदियों में पानी खत्म होने की समस्या उत्पन्न न होती तथा किसी भी नदी में बाढ़ आने पर उस नदी के पानी को दूसरी नदियों की तरफ मोड़ दिया जाता. सरकार गई, योजना चली गई. पता चला कि सम्भवत: यूपीए के किसी युवा नेता ने इस योजना पर यह कहते हुये आपत्ति जता दी कि इस योजना से प्राकृतिक संसाधनों के साथ खिलवाड़ होगा और देश के लिये विनाशकारी सिद्ध होगा, लेकिन बाढ़  द्वारा हो रही विनाशलीला ने यह सिद्ध कर दिया है कि अटल बिहारी बाजपेई की सरकार द्वारा नदियों को आपस में जोड़ने की योजना विनाशकारी न होकर विकासकारी सिद्ध होती. इस प्रार्थना के साथ कि बाढ़ से होने वाली विनाशलीला अब तो बन्द हो..