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Showing posts from March, 2010

जंतर-मंतर पर टिप्पणी नहीं छापी गयी..और गौतम राजरिषी जी की आज की पोस्ट पर एक टिप्पणी.

टिप्पणी छापना न छापना हर एक का हक है. जो टिप्पणी श्रीमान शेष नारायण जी के ब्लाग जंतर-मंतर  "मोदी से एस आई टी की पूछताछ के पीछे क्या है" पर नहीं छापी गयी, उसमें मैंने जो पूछा था उसका लब्बो-लुआब यह  था " यह लेख ठीक लग रहा है लेकिन इसके साथ यह भी बताने की कृपा करें कि कश्मीर में हुये हिन्दुओं के नरसंहार के पीछे कौन दोषी  है, चौरासी के दंगों में सिखों के कत्लेआम के लिये आप किसे दोषी मानते हैं और अगले लेख में इस भी कुछ लिखने की कृपा करें"  राजनीतिक सामाजिक मुद्दों और आम आदमी की चिंताओं और सवालों को बहस की मुख्य धारा में लाने की एक कोशिश तो अवश्य है श्रीमान शेष नारायण सिंह जी की लेकिन इस टिप्पणी को न छापने से मुझे निराशा हुई है, क्योंकि इससे पूर्व काफी तीखी टिप्पणियों को भी श्री सिंह ने माडरेट नहीं किया.   गौतम राजरिषी जी के ब्लाग पर एक श्रद्धान्जलि थी उनके एक मित्र के लिये. टिप्पणी बंद कर रखीं थीं और इसके पीछे एक सही कारण भी था. मैं टिप्पणी देना चाहता था लेकिन वहां न दे सका इसलिये यहां दे रहा हूं.   हे सैनिक मर मर जायेगा तो क्य...

अब कौन मिलेगा

आंखों में आंसुओं के सिवा अब कौन मिलेगा, ख्वाबों में ख्यालों के सिवा अब कौन मिलेगा, जाते हो तो जाते हुए बस इतना बता दो, इस घर में तुम्हारे सिवा अब कौन मिलेगा, अब सुबह हुई नाश्ते का वक्त हुआ है, इस नाश्ते में चाय के सिवा अब कौन मिलेगा, नौ बज चुके हैं टिफिन भी तैयार नहीं है, इस टिफिन में जूठों के सिवा अब कौन मिलेगा, रुखसत करो ड्यूटी को मैं तैयार खड़ा हूँ, रुखसत को अब सदके के सिवा कौन मिलेगा, अब शाम हुई राह भी मैं घर की चला हूँ, इस घर में हमारे सिवा अब कौन मिलेगा। -श्री अली द्वारा उनकी स्वर्गीय पत्नी को समर्पित.  यह पुराने ब्लाग पर पोस्ट की गयी थी तकरीबन ढ़ाई बरस पहले.

आरजू

अब कोई तमन्ना नहीं बाकी, अब कोई आरजू नहीं बाकी। उनके कूंचे से निकले जनाजा मेरा, है बाकी तो ये आरजू बाकी। इश्क तो बाकी है अभी हममें, उनमें मगर वफा नहीं बाकी, सोचता हूँ खल्बत में, वो किसको देंगे सजा, यहाँ तो न दिल बाकी और न ही जाँ बाकी। जाम पे जाम आज तू पिलाये जा, मस्त नजरों से अपनी तू छलकाए जा। रिंद हूँ मैं न बहकेंगे मेरे कदम, आज मैं नहीं बाकी या मय नहीं बाकी। अब कोई सहारा नहीं बाकी, अब कोई किनारा नही बाकी, छोड़ कर भंवर में सभी चल दिए, तूफानों से खेलेगी जिंदगी बाकी। यह श्री घनश्याम जी की रचना है.

कितनी मेहनत करती है

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कितनी मेहनत करती है, फूलों-फूलों फिरती है. करती है मकरन्द इकठ्ठा, मधु जिससे बनता है.मम्मी-पापा, दादा-दादी सबको अच्छा लगता है. 

ज न्यूज की समाचार वाचिका और सम्पादक को चित्र और प्रतिमा में अन्तर नहीं पता

जी हां,  पूरी तरह से सत्य है. ज. न्यूज की समाचार वाचिका समाचार पढ़ रही थीं कि सचिन ने स्व०राज सिंह डूंगरपुर की प्रतिमा का अनावरण किया जबकि वास्तव में वह एक चित्र था. कितनी बड़ी भूल. हिन्दी का अनादर हिन्दीभाषी ही कर रहे हैं और उसकी गरिमा को धूल-धूसरित भी कर रहे हैं. अभी एक दैनिक में भी एक लेख पढ़ा था और एक-दो ब्लाग पर भी यह पढ़ने को मिला कि हिन्दी की लिपि देवनागरी की जगह रोमन हो जाये तो इसमें क्या बुराई है. बहुत सारे लोग रोमन में हिन्दी लिखते हैं-पढ़ते हैं और नये स्क्रिप्ट राइटर भी हिन्दी को रोमन लिपि में ही लिखते हैं. मुझे लगता है कि शायद इसी तरह के लोगों ने ही यह समाचार लिखा और सम्पादित किया होगा. इस तरह के कुतर्क देकर यह लोग क्या सिद्ध करना चाहते हैं और हिन्दी के विरुद्ध किस प्रकार का कुचक्र चलाया जा रहा है. आखिर रोमन में हिन्दी लिखने से भाषा को क्या हासिल हो जायेगा जो देवनागरी में लिखने से नहीं होता. यहां तक कि यदि कभी रोमन में हिन्दी को लिखना पड़ता है तो बड़ा अजीब सा महसूस होता है. इस प्रकार के लोगों की यह तो हिम्मत नहीं पड़ती कि यह लिख सकें कि अंग्रेजी को...

दाऊद उर्फ हेडली के बारे में दो सवाल

पहला मीडिया से :- हेडली को दाऊद गिलानी (असली नाम) कहने या लिखने में दम खुश्क क्यों होता है? किसी से कोई खतरा है क्या ?? दूसरा भारत सरकार से :- घर के भेदियों से निपटने में स्यूडो धर्मनिरपेक्षी आड़े आ जाते हैं, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को भी एक किनारे रख दिया जाता है. एक सांसद और एक विधायक ने आतंकियों की मदद की, उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी. हेडली-हेडली का राग अलापा जा रहा है. दाऊद गिलानी अगर भारत आ जाता तो क्या कर लेते? अंकल पूछताछ की इजाजत दे देंगे तो क्या कर लिया जायेगा, सिवाय इस के कि कुछ लोगों को अमेरिका जाने का मौका मिल जायेगा.

तेईस मार्च के शहीदों को शत-शत नमन.

भगत सिंह, राजगुरू और सहदेव को उनके शहीदी दिवस पर शत-शत नमन..

चित्र पहेली का उत्तर

समीर साहब और शास्त्री साहब के उत्तरों को छोड़कर बाकी उत्तर थोड़े से पास तक पहुंच रहे हैं. यह एक मजार के पास के चित्र हैं, जहां लोग हजारों की संख्या में इकठ्ठे हुये हैं. और इसके कारण जाम लग गया जो लगभग एक घंटे तक लगा रहा तथा यात्रियों को वापस लौटकर अपने गंतव्य के लिये अन्य मार्गों का प्रयोग करना पड़ा.  पुलिस वालों ने भी जाम खुलवाने की जगह यात्रियों को वापस लौटाना ही उचित समझा. सऊदी अरब, जो कि एक कट्टर इस्लामी मुल्क है, में भी कोई धार्मिक आयोजन सड़कों पर आयोजित नहीं किया जाता, जबकि भारत में यह आम है. नागरिकों और यात्रियों की सुविधा-असुविधा से किसी को कोई सरोकार नहीं. बस अपना झंडा ऊंचा होता रहे. न जाने कितने ही ऐसे तमाम आयोजन पूरे देश में किये जाते हैं जिससे आम आदमी को असुविधा होती है. जाने कितने ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो अतिक्रमण कर बनाये गये हैं. लेकिन वोटों की गन्दी राजनीति के चलते इन्हें गिराया नहीं जाता. मेरा निवेदन है कि जो भी धार्मिक स्थल अतिक्रमण कर बनाये गये हों उन्हें बिना किसी भेदभाव के हटा दिया जाये. लगभग हर धर्म के लोगों ने सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण कर धार्मिक स्थलों का निर्मा...

आज की चित्र पहेली

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इन तस्वीरों को देखकर बताईये कि यहां क्या हो रहा है? ये चित्र मेरे एक मित्र ने उपलब्ध कराये हैं.

कमांडेंट बिरदी का क्या दोष था जो उन्हें गिरफ्तार किया गया

कमांडेंट बिरदी का क्या दोष था जो उन्हें गिरफ्तार किया गया. क्या यह उनका दोष था कि उन्होंने दंगाईयों की भीड़ पर, जो कि दंगा कर रही थी, पर आंसू गैस छोड़ने और फायरिंग करने का आदेश दे दिया और जिसमें एक लड़के की मौत हो गयी. इन परिस्थितियों में कल कोई भी अधिकारी गोली चलाने के आदेश अतिविषम परिस्थितियों में भी नहीं देगा. और जब दंगाईयों को किसी भी प्रकार का डर रहेगा ही नहीं तो फिर उन्हें नंगा नाच करने से कौन रोक सकता है. जब पूरे देश में लाखों लोग पुलिस कस्टडी में मार दिए जाते हैं तो सरकारों को कुछ भी कष्ट नहीं होता और पुलिसवाले अपनी पूरी सेवा कर आराम से रिटायर हो जाते हैं, लेकिन यदि एक दंगाई मारा जाता है तो हंगामा बरप जाता है, क्योंकि मरने वाला हिन्दू नहीं था. जैसे कि रजनीश के मामले में हुआ. चूंकि उसने एक मुस्लिम लड़की से शादी कर ली थी जो कि उस लड़की के धर्मनिरपेक्ष परिवार वालों को हजम नहीं हुआ लिहाजा पुलिस से मिलकर रजनीश को मार दिया गया. जैसा कि आमतौर पर होता है कि ऐसे मामलों में सभी धर्म-निरपेक्षी और मानववादी चुपचाप बैठ जाते हैं, इसमें भी चुप्पी मार कर बैठ गये.  जम्मू-कश्मीर में जिस प्रकार से ...

क्या हमारे देश को भी ऐसा ही देखना चाहते हैं राजनीतिबाज.?

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इन चित्रों को देखिये. यह एक अफ्रीकी देश के चित्र हैं, जिसकी जनसंख्या के अनुपात में खाद्यान्न उपलब्ध नहीं है. लोग बहुत गरीब हैं. धरती भी बंजर हो चुकी है. एक हाथी मर गया, लोगों को पता चला और देखिए फिर मरे हुये हाथी पर कैसे हाथ साफ किया. भूख भी क्या नहीं कराती. हड्डियां तस्करों के काम आयेंगी. हमारे देश में भी जनसंख्या अबाध रूप से बढ़ रही है, पिछले साठ सालों में तीन गुना हो चुकी है. जंगल कटे, खेत बनाये गये, खेत खत्म कर मकान. जनसंख्या रोकने के कानून पर इस्लाम आड़े आता हो न आता हो, धर्मनिरपेक्ष नेता जरूर आड़े आ जाते हैं. कहीं ऐसा न हो जाये कि हम लोगों की आने वाली पीढ़ियों को भी इन्हीं हालातों का सामना करना पड़े.

रिलायन्स वाले ऐसे काटते हैं ग्राहकों की जेब से पैसे...

नमूना पेश-ए-खिदमत है... आप किसी जरूरी कार्य में व्यस्त हैं अथवा यात्रा कर रहे हैं. रिलायन्स के ही किसी अनजाने नम्बर से काल आती है. आप काल रिसीव कर लेते हैं. दूसरी ओर से मशीनी आवाज आने लगती है किसी स्कीम को प्रमोट करने के लिये. आप झुंझलाते हैं और काल काट देते हैं, यदि गलती से भी आपका हाथ किसी भी अंक पर पड़ जाता है या नहीं भी पड़ता है तब भी समझ लीजिये कि कोई VAS एक्टीवेट हो गयी आपके मोबाईल पर.. अब आपके अकाउंट में जब उननचास रुपये कट गये और आप ने ध्यान नहीं दिया तो कोई बात ही नहीं, इसी तरह हर माह आपके खाते में से राशि कटती रहेगी और आपको पता भी नहीं चलेगा क्योंकि एक्टीवेशन के समय कोई मैसेज नहीं भेजा जाता. यदि आपने इसपर गौर कर लिया और आप आश्चर्य चकित हुये कि पैसे कैसे कट गये, फिर आपने कस्टमर केयर पर बात की तो वहां उपलब्ध व्यक्ति आपको बतायेगा कि फलां तारीख को आपके मोबाइल पर काल आई थी और उसे आपने उठा लिया था, फलां सर्विस एक्टीवेट हो गयी. आप अब नाराज होने के सिवा कुछ नहीं कर सकते. दूसरी ओर से फिर आपको रिलीफ देते हुये वह सर्विस डी-एक्टीवेट कर दी जाती है. मजे की बात यह कि अगर आपके खाते में पैसे न...

माया की माला पर ही हमला क्यों? बाकियों को क्यों बख्शा जा रहा है??

मायावती को लखनऊ में नोटों की माला पहनाई गयी, जिस पर जांच बैठ चुकी है. क्या सिर्फ इसलिये कि यह सबके सामने पहनाई गयी थी? इससे पहले मुलायम सिंह सैफई में करोड़ों रुपये की लागत से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की बोइंग उतरने लायक हवाई पट्टी बनवा चुके हैं. जिस पर उनका हवाईजहाज उतरता भी रहता है. पिछले टेन्यूर में लालू तीन सौ उनहत्तर बार रेलवे के विशेष सैलून में यात्रा करते हैं और बाद में एक विशेष पास भी जारी होता है जिसमें कि वह सपरिवार एसी-प्रथम में यात्रा करने के हकदार होते हैं. कांग्रेस ने नेहरू-इंदिरा-राजीव की याद में न जाने कितने स्मारक बनवाये और पैसा खर्च किया. अन्य सत्ताधारी दलों के हिस्से में भी ऐसी चीजें अवश्य होंगी. सत्ताधारियों के अकस्मात ही अरबपति बनने के किस्से अब आश्चर्य से नहीं देखे जाते. जनता के पैसे पर अफसर और नेता मौज करते हैं. प्रश्न यह नहीं है कि मायावती ने क्या किया या मुलायम ने क्या किया. प्रश्न यह है गरीब जनता की भलाई पर जो पैसा खर्च होना चाहिये वह नेता और अफसर अपने ऊपर कैसे खर्च कर लेते हैं? उनसे जबावतलबी क्यों नहीं होती, उनके विरुद्ध जांच बिठाकर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती. एक ...

हरियाणा में एसटीएफ भंग

पिछली कई पोस्ट में मैंने पुलिस कर्मियों के भ्रष्टाचार के ऊपर और अपराधीकरण के बारे में लिखा था. भारतीय पुलिस के लिये जस्टिस श्रीमन ए०एन०मुल्ला ’संगठित अपराधियों के गिरोह’ के रूप में संबोधित किया था. लगभग हर रोज कहीं न कहीं से पुलिस कर्मियों द्वारा किये जा रहे अपराधों के बारे में खबर सुनने को मिल ही जाती है. यह तो वे वारदातें हैं जो हाईलाईट हो जाती हैं, इनसे हजारों गुना ऐसी वारदातें होती हैं जो सामने आती ही नहीं. एक चैनल पर एंकर एक आईपीएस अफसर से हरियाणा में एसटीएफ की कारगुजारियों के बारे में बात कर रही थी. हरियाणा में एसटीएफ को एक ज्वैलर से वसूली के सिलसिले में भंग कर दिया. यह वसूली की कार्रवाई सीसीटीवी में रिकार्ड हो गयी. ज्वैलर अपनी जान की सलामती की गुहार लगाता दिखाई दिया. आईपीएस अफसर लगातार यह सिद्ध करने में लगी थीं कि जनता को पुलिस में भरोसा दिखाना चाहिये और सब एक जैसे नहीं होते. पता नहीं वह कौन सा पैमाना होता है जिससे आम जनता यह जान सकती है कि कौन सा पुलिसवाला सही पुलिसवाला है और कौन सा गलत. वह यह भी कह रही थीं कि ऊपर भी अफसर बैठे हुये हैं लोगों को उनसे राब्ता कायम करना चाहिये. मैं...

त्यागी जी के ब्लाग परशुराम२७ में कुछ गड़बड़ है

त्यागी जी के ब्लाग परशुराम२७ में कुछ गड़बड़ है. जब भी टिप्पणी पोस्ट करने जाओ तो कहीं और रीडायरेक्ट हो जाता है. कई बार एक ही लेख चार-चार पांच-पाच जगह अलग-अलग ब्लाग और शीर्षकों से पढ़ने को मिलता है तो कभी-कभी अकुलाहट होने लगती है. हो सकता है कि इससे भी कोई लाभ होता हो, लेकिन एक ही रचना कई ब्लागों पर, मुझे थोड़ा सा अटपटा लगता है. क्षमाप्रार्थना सहित. पाबला जी बता ही चुके हैं कि ब्लागर पर नई सुविधा से कुछ असुविधा होने लगी है. सभी ब्लागर्स एक बार चेक कर लें, मेरे ब्लाग में यदि कोई गड़बड़ी नजर आ रही हो तो कृपया बतायें. आज माडरेशन बस यूं ही लगा कर एक प्रयोग सा कर रहा हूं, कल या परसों इसे हटा दूंगा. चलते-चलते नेता जी से पूछा एक सवाल, जो कड़ा था, भ्रष्टाचार पर खड़ा था. आप क्यों करते हैं ऐसा, क्यों खाते हैं जनता का पैसा, नेता का दिमाग चकराया, उसने अपने दिमागी घोड़े को दौड़ाया, और ऐसा उत्तर सरकाया, जिसे सुनकर हमारा दिमाग भन्नाया, बोले, ऐसा कर हम करते हैं तुम्हारे जैसे लोगों पर उपकार, और तुम रहे हो हमें धिक्कार, अरे मूरख, यदि हम ऐसा नहीं करेंगे, हम भी तुम्हारी तरह सूखी रोटी पर गुजारा करेंगे, तो यह पैसा औरों...

कानपुर के रेल बाजार थाना प्रभारी ने व्यवसायी मुकेश सिंह का अपहरण कर हत्या की.

कानपुर के रेल बाजार थाना प्रभारी ने एक व्यवसायी मुकेश सिंह का अपहरण किया और फिर उसके तीन दिन बाद उसकी लाश एक नहर से बरामद हुई. पुलिस निरंकुश हो चुकी है. कारण साफ है नीचे से ऊपर तक फैला हुआ भ्रष्टाचार. किस नेता और अफसर को हर चौराहे पर होती वसूली दिखाई नहीं देती? चौकी इन्चार्ज और थानेदारों का रुतबा और आर्थिक हैसियत देख लीजिये. आय से कई गुना अधिक सम्पत्ति बना चुके होते हैं. अपनी पत्नी और रिश्तेदारों के नाम कृषि भूमि दिखाकर और कृषि भूमि से आय दिखाकर करोड़ों रुपये का कालाधन सफेद बनाकर मौज करते हैं. हर कोई जानता है कि भ्रष्टाचार कहां होता है, किस प्रकार होता है, कौन शामिल है और क्यों होता है. लेकिन कार्रवाई कोई करना नहीं चाहता. जो चाहते हैं उनकी संख्या नगण्य है और ऐसे लोगों के हाथ बांध दिये जाते हैं. पुलिस इसलिये और भी अधिक निरंकुश हो जाती है कि पुलिस के खिलाफ कार्रवाई कौन कर सकता है, जिन पुलिस वालों के खिलाफ जांच होती है, वह किसी पुलिस वाले द्वारा ही की जाती है. अदालत के लिये सबूत और गवाह चाहिये और पुलिस के खिलाफ सबूत और गवाह! थाने में हुई हत्याओं के आरोपी पुलिस वालों को पहले निलम्बित और गिर...

मकबूल फिदा हुसैन का विरोध करने वाले फुटपाथी फतवेबाज हैं!

यह कहना है आई-बी-एन-७ के असोसियेट एक्सीक्यूटिव प्रोड्यूसर श्रीमान पंकज श्रीवास्तव का. उन्होंने यह भाव अपने ब्लाग "हुसैन के चित्र पर जस्टिस कौल का फैसला" में प्रकट किये थे. अब जान लीजिये कि उनके अनुसार वे पाठक या देशवासी जो मकबूल फिदा हुसैन की बनाई हुई अश्लील तस्वीरों का विरोध करते हैं, फुटपाथी समझ रखने वाले फतवेबाज हैं. "(....................................... उम्मीद की जानी चाहिए कि हुसैन के चित्रों पर फुटपाथी समझ रखने वाले फतवेबाज, इस फैसले की रोशनी में आईना http://khabar.josh18.com/blogs/23/432.html जरूर देखेंगे।)" फिर टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देखिये "रीतेश जी, ये लेख मैंने नहीं लिखा। ये दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस का फैसला है। कहीं आप मानसिक दिवालियेपन की बात माननीय न्यायमूर्ति.....। आंखों के साथ दिमगा का इस्तेमाल न करने से ऐसे ही नतीजे निकलते हैं..."

क्या कश्मीर अलग देश है?

खबर आ रही थी कि पीडीपी एक बिल ला रही है जम्मू कश्मीर विधानसभा में, जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर की महिलाओं की नागरिकता दूसरे प्रदेश में शादी करने पर खत्म हो जायेगी. इस बिल का समर्थन कांग्रेस और ने०का० ने किया है और भाजपा ने इसका विरोध किया है. क्या देश है हमारा, एक देश के अन्दर दूसरा देश. जहां तक मेरी छोटी सी बुद्धि कहती है कि नागरिकता किसी देश की होती है, प्रदेश की नहीं. भतीजा जो काम महाराष्ट्र में कर रहा था, उससे कहीं अधिक घातक कार्य जम्मू-कश्मीर के नेता कर रहे हैं, लेकिन इस पर सब ने चुप्पी साध रखी है. शायद यही सब कारण देश को फिर विखंडन के कगार पर ले जायेंगे, लेकिन बस एक वोटों की पट्टी है जो हमारे नेताओं को कुछ देखने नहीं देती. सत्तालोलुप नेताओं याद रखो देश से ही सब कुछ है, जब देश ही न बचेगा तो नेतागिरी करने कहां जाओगे. चलते-चलते - महात्मा गांधी की प्रतिमा के आगे सांसद बैठकर धरना दे रहे थे. ये वही सांसद थे जिन्होंने राज्य सभा में सभापति के हाथों से महिला आरक्षण बिल की प्रतियां छीन कर फाड़ दी थीं. महात्मा गांधी भी इस नौटंकी को देखकर आंसू बहा रहे होंगे.

बरेली में दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार मौलाना तौकीर रजा की रिहाई.

अभी अभी पता चला है बरेली में साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के आरोपी इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खां की रिहाई हो गई है, ऐसा भी बताया जा रहा है कि सम्भवत: शासन ने दंगा भड़काने का आरोप वापस ले लिया है. जिन अधिकारियों ने मुकदमा दर्ज कराकर गिरफ्तारी की कार्रवाई की थी, उनका तबादला कर दिया है. इससे पहले दिनांक दस मार्च को हजारों की संख्या में मुस्लिमों ने गिरफ्तारी के विरुद्ध इकठ्ठा होकर दबाव बनाने की कोशिश की थी. शायद अब धीरू जी की भी परेशानी दूर हो जायेगी क्योंकि अब शायद शहर में कर्फ्यू भी खत्म कर दिया जायेगा.

मित्रों थोड़े से विजेट्स कम कर लो

मेरी दो विनतियां हैं सीधी सी-- एक तो यह कि थोड़े से विजेट्स कम लगायें और एक कम जटिल टेम्प्लेट प्रयोग करें जिससे कि मेरे स्लो इंटरनेट कनेक्शन पर आप लोगों के ब्लाग थोड़ा जल्दी खुल सकें तथा यह कि फोन्ट थोड़ा बड़ा रख लें और बैक ग्राऊंड कलर थोड़ा ऐसे कर दें जिससे कि पढ़ने में आसानी हो सके. दूसरी यह कि इसके अलावा वर्ड वेरीफिकेशन यदि लगा रखा है तो उसे हटा दें, यदि आवश्यक हो तो माडरेशन लागू कर दें. टिप्पणी देने के बाद वर्ड वेरीफिकेशन आने पर बड़ी कोफ्त होती है. कई बार लोगों को पता भी नहीं होता कि उनका वर्ड वेरीफिकेशन आन है क्योंकि ब्लाग बनाते समय ब्लागर में बाई डिफाल्ट यह आन ही होता है जिसे कमेन्ट्स आप्शन में जाकर आफ किया जा सकता है. मेरे पास स्लो कनेक्शन है और मैं नेटबुक का प्रयोग करता हूं जिससे मुझे थोड़ी असुविधा होती है. चूंकि यह मेरी सुविधा के लिये है, इसलिये मेरी आप लोगों से प्रार्थना है कि यदि सम्भव हो तो इस पर ध्यान देने की कृपा करें. कल मैं भी दो विजेट हटाऊंगा.

उपदेशक और धर्मप्रचारक कृपया ध्यान दें

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नाइजीरिया में भयंकर खूनी संघर्ष हुआ है....... मुस्लिमों और ईसाईयों के बीच..... पूरी खबर यहां देखें... http://www.latimes.com/news/nation-and-world/la-fg-nigeria-violence9-2010mar09,0,1624783.story मुस्लिम उपदेशक जो हिन्दुओं को आईना दिखाने की कोशिश करते रहते हैं और सौ खोट निकालते हैं सनातन धर्म में, इस खबर को पढ़ें और मारकाट में लिप्त अपने इन बंधुओं को भी समझायें कि इस्लाम हिंसा को बढ़ावा नहीं देता......... इस्लाम शांति बनाये रखने का पक्षधर है......... इस खबर में लिखा है कि मुस्लिमों ने ईसाईयों के तीन गांवों पर हमला कर नरसंहार किया........ जब मैंने इस सामूहिक कब्रगाह को देखा तो मेरा कलेजा मुंह को आ गया.... मुस्लिमों और ईसाईयों के बीच हुई इस हिंसा में जो मरे होंगे, चाहे वे ईसाई रहे हों या मुस्लिम, वे भी किसी के बाप-भाई-बेटे, मां-बहन-बेटियां होंगे........ पता नहीं लोग कैसे इस को सत्य मान लेते हैं कि मरने के बाद यह मिलेगा और वह मिलेगा ....... जो चीज जिंदगी में नहीं मिल सकी वह मरने के बाद मिलेगी, कमाल है.... खैर मेरा उद्देश्य कटाक्ष करना नहीं बल्कि इस हकीकत को दिखाना है कि धार्मिक कट्टरता से ...

कृपालु जी के भंडारे में छुपा कड़ुवा सच

कृपालु जी द्वारा दिये गये भंडारे में मची भगदड़ में बहुत बड़ी संख्या में लोग मारे गये. मीडिया पर लगातार इसके बारे में खबरें आ रही हैं. यद्यपि आश्रम की तरफ से तो मृतकों के परिजनों और घायलों के लिये कुछ तात्कालिक सहायता देने की खबर आई लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने तो हद कर दी यह कहकर कि उनका खजाना खाली है और सरकार इन लोगों के लिये कुछ नहीं कर सकती. अरे साहब, ये सब दलित ही थे. इस के पीछे का कड़ुवे सच को पहचानिये. जो लोग बीस रुपये और एक धोती तथा एक-दो बर्तनों की खातिर इतनी बड़ी संख्या में इकठ्ठे हुये, जाहिर है वह किसी धनकुबेर के खानदानी तो हो नहीं सकते. यही भारत के सांसदों और विधायकों के भाग्य विधाताओं का दुर्भाग्य है कि वोट लेते समय तो हर व्यक्ति कालीन बना दिखाई देता है और वोट लेने के बाद उसे वह भाग्य विधाता कीड़े-मकोड़े लगने लगते हैं. इस घटना के तमाम कारण गिनाये जा रहे हैं-आश्रम प्रबन्धन की लापरवाही, प्रशासनिक अदूरदर्शिता. लेकिन असली कारण है भारत की नब्बे प्रतिशत जनसंख्या की आर्थिक हालत जिसे सब इग्नोर कर रहे हैं. ऊपर से दाग अच्छे हैं, की तर्ज पर समझाया जा रहा है कि मंहगाई अच्छी है. देश के कर्णधार...

बरेली के कुछ चित्र तीन और चार मार्च के.

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सभी चित्र दैनिक जागरण के ई-पेपर से लिये गये हैं. साभार.

बरेली में दंगा

न जाने देश में ऐसे कितने दंगे होते होंगे जिनकी खबरों को दबा दिया जाता है. अभी बरेली में एक दंगा हुआ था जिसमें करोड़ों रुपये की हानि हुई लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इसकी खबरें दबा दी गयीं. किस्सा यूं है कि जुलूसे-मुहम्मदी का जुलूस निकला जा रहा था. इस शहर में पिछले दस सालों से सबसे उदार माने जाने वाले बरेलवी मसलक ने बड़ी प्रगति की है. दस वर्ष पहले तक आला-हजरत का कोई ऐसा विशेष नाम नहीं था, किन्तु पिछले दस सालों में यहां आने वाले जायरीनों की संख्या लाखों में पहुंचने लगी है. इसी प्रकार यहां एक जगह है शाहदाना, जिसके पास में कुछ वर्ष पूर्व स्वर्गवासी हुये एक मुस्लिम सज्जन की मजार बनाई गयी है और अब वहां भी उर्स होने लगा है. पिछले कई दिनों से यहां जुलूस निकाले जा रहे थे, जिनमें मुस्लिम व्यक्ति सफेद कुर्ता-पाजामा, काले रंग का अरबों द्वारा पहना जाने वाला चोगा, हाथ में तलवारें, चापड़ इत्यादि लेकर तथा हरे रंग के झण्डे जिन पर चांद तारे का निशान बना होता है, लेकर जुलूस निकालते हैं. पता नहीं किस नियम के तहत इस शस्त्र प्रदर्शन को हरी झण्डी दी जाती है, जबकि सिक्खों के अलावा कोई भी व्यक्ति इस प्रकार शस्त...

मकबूल फिदा हुसैन के समर्थन में आई रुदालियां अब कहां हैं?

इस खबर को पढ़िये. यह आईबीएन से साभार ली गयी है. इसमें लिखा है कि कर्नाटक के किसी अखबार में तस्लीमा नसरीन के एक तथाकथित लेख के छपने के बाद हिंसा भड़क उठी जिसमें दो लोगों की मृत्यु हो गयी. प्रदर्शनकारियों ने (मुस्लिम दंगाइयों ने नहीं) दुकानों को आग लगाई, वगैरा. कहां चली गयी हैं वे रुदालियां जो अभी तक मकबूल फिदा हुसैन के समर्थन में अपनी-अपनी दुकान खोले बैठी थीं. इस पर धर्मनिरपेक्ष नेता, समाजसेवी और मुस्लिम धर्मगुरुओं सभी चुपचाप बैठे हैं. (यहां मुस्लिम से मेरा अर्थ श्री महफूज जी जैसे लोगों से अलग कट्टर लकीर के फकीरों से है). अब क्यों नहीं आगे आते, अब टेलीविजन पर कोई सच बोलने वाला, कोई डंके की चोट पर सच कहने वाला इस पर आगे आकर यह कहने का साहस करेगा कि यह सब दंगाई हैं, धार्मिक आतंकवाद फैला रहे हैं. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर कुठाराघात कर रहे हैं. शायद नहीं. सहिष्णु होने और न होने के बीच यही अंतर है. खबर पढ़ें. "तस्लीमा का कहना है सोमवार को कर्नाटक में जो हुआ उससे मैं सदमे में हूं। मुझे पता चला है कि कर्नाटक के एक अखबार में मेरे नाम से छपे एक लेख के बाद ये बवाल हुआ है। लेकिन मैं कहना चाहत...

वह कैन उठाने वाला

आज होली थी. सबके लिये. बड़े प्रसन्न थे लोग. मिठाई, गुझिया, पापड़, ठंडाई और न जाने क्या क्या. बच्चे और जवान मस्त थे. चौराहों पर रखी हुई होली, बजते हुये साउंड बाक्स, नाचते हुये लड़के. लाल-नीले-पीले चेहरे लिये हुये. हर कोई अपनी मस्ती में मशगूल. सब एक दूसरे को बधाई देते, गले मिलते. रंगों के डिब्बे खाली हो जाने पर उन्हें सड़क पर उछाल देते. थोड़ी देर बाद एक लड़का बारह-तेरह साल का उधर से गुजरता है. उसका भी चेहरा लाल-नीला पुता हुआ है. उसके बदन पर भी एक फटी हुई शर्ट है. लेकिन थोड़ा फर्क है. उसकी पीठ पर एक झोला है. लोग सड़क पर डिब्बे, कैन फेंक रहे हैं, वह उन कैन, डिब्बों को उठा कर अपनी पीठ पर टंगे झोले में इकठ्ठा कर रहा है. उसकी पैंट की पिछली जेब में एक प्लास्टिक का डिब्बा है जिसमें रंग भरा है, जिसका प्रयोग वह भी कर लेता है. मैं उसे रोक कर पूछता हूं. "क्या नाम है?" "वसीम". उत्तर मिला. "पढ़ते क्यों नहीं हो, तुम्हारी उमर तो पढ़ने की है." कहीं कुछ चुभता सा महसूस हुआ "बाप मजदूरी करता है, इतनी कमाई नहीं होती. पांच भाई बहन हैं. कुछ करेंगे नहीं तो खायेंगे क्या?" एक फोटो ल...