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मेरे शहर के आटो

कभी बैठकर देखिये मेरे शहर के आटो पर. क्या खूब हैं, बढ़िया हरा रंग, जिस पर काले रंग से सुशोभित होता है "CLEAN CITY GREEN CITY".  और इस हरे रंग तथा इन शब्दों के सहारे शहर ग्रीन भी हो रहा है और क्लीन भी. दरअसल पेड़-पौधों के कटने से पर्यावरण में हरियाली में जो कमी आयी है, उस कमी की पूर्ति आटो और बसों को हरा रंग कर पूरी की जा सकती है. जिधर भी देखिये हर तरफ क्लीन और ग्रीन ये दो शब्द ही दिखाई देते हैं और इस तरह पर्यावरण भी दूषित होने से बच जाता है तथा प्रदूषण नियन्त्रण वालों का भी काम आसान हो जाता है. आटो के नीचे से धुंआ भले ही काले रंग का निकलता हो लेकिन आटो का रंग हरा होने से पर्यावरण दूषित नहीं होता है, इसी सिद्धान्त के चलते प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के लोग अन्य कार्यों पर अपना ध्यान बखूबी केन्द्रित कर पाते हैं. इस के साथ ही इनके इंजनों से जो आवाज निकलती है वह किसी शास्त्रीय संगीत से कम नहीं होती, पता नहीं लोग क्यों शोर की शिकायत करते हैं जबकि सुन्दरता देखने वाले की आंखों में होती है, के अनुरूप ही संगीत सुनने वाले के कानों में होता है, एक निश्चित सिद्धान्त है. आटो के इंजन से निकलती ह...

भारत की वर्तमान दशा पर एक लेख.

यह लेख कुछ पहले मेरे एक मित्र ने लिखा था, जो कि यूनिकोड में पहले कन्वर्ट नहीं कर पाया था अब जाकर इसे यूनिकोड में बदल पाया हूँ, आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत। विगत 15 अगस्त को भारत को स्वतन्त्र हुये 61 वर्ष पूरे हो गये, स्वतन्त्र भारत की एक पीढ़ी अपने शैशव, युवावस्था को पूर्ण कर अपनी वृद्धावस्था में प्रवेश कर गयी।। स्वातन्त्र्य के इन वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, का विश्लेषण करना आज अपरिहार्य हो गया है। आजादी के लिये लड़ने वाले दीवानों ने क्या इसी स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी? हमारा देश एक ऐसे देश में बदल चुका है जहाँ हजारों नियम-कानून हैं, लेकिन एक भी कानून पूरी ईमानदारी से लागू नहीं होता। आजादी के बाद से सैकड़ों घोटाले हो चुके हैं, लेकिन इनमें शामिल एक भी बड़े आदमी को सजा नहीं हुई, यह अलग बात है कि जाने-अनजाने में, मजबूरी वश इनके मोहरे बने छोटे कर्मचारी अवश्य सजा पा गये। जीप घोटाला, बैंक घोटाला, चीनी घोटाला, जमीन घोटाला, चारा घोटाला, शेयर घोटाला, तोप घोटाला, चारा घोटाला, दवा घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, डेयरी घोटाला, न जाने कितने घोटाले हो चुके हैं, कर देने वाली गरीब जनता के पैसे को...

आ गए लोक सभा चुनाव 2009

एक बार फिर देश तैयार है सैकडों करोड़ रुपए चुनाव में व्यय करने के लिए। फिर वही दल, वही मुखौटे, वही आयाराम-गयाराम। फिर वही दल-बदल दिल-बदल की आड़ में। फिर वही गुंडे-मवाली, जब तक सामने वाले के यहाँ थे अपराधी थे, अब तौबा कर ली। फिर अपराध जब किया था जब सामने वाले के यहाँ थे, अब तो नहीं किया। फिर देश को आगे ले जाने के सपने, साठ सालों में नहीं कर पाये तो अब क्या कर पायेंगे। जब आबादी तिहाई थी तब कुछ नहीं उखाड़ सके तो अब क्या उखाडेंगे। जनता तो पहले भी शोषित थी अब भी रहेगी। फर्क इतना है कि शोषण करने वाले चेहरे बदल जाते हैं। पहले भी बेवकूफ बनाया जाता था अब भी बनाया जाएगा। स्विस सरकार कहती है कि आप चाहे तो अपने देश के भ्रष्टाचारियों का पैसा ले आयें लेकिन यहाँ कौन करेगा और क्यों करेगा। नशा सीमापार से आता है, बॉर्डर पर पोस्टिंग के लिए क्या कुछ नहीं किया जाता। पुलिस जब अपराधियों से मिल जाए या ख़ुद उनके लोग अपराध में लिप्त हों तो देश कैसे चलेगा। सी बी आई राशन घोटाले की जांच को मना कर देती है, बहुत खूब। क्योंकि अपराध बड़ा है, इसलिए बहुत बड़ा अपराध करो और जांच भी नहीं होगी। इस के खिलाफ कुछ हो भी नहीं सक...

एक और तस्वीर देखिये भारत के भविष्य की.

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एक और तस्वीर देखिये भारत के भविष्य की

कोई मुझे धर्म-निरपेक्षता के बारे में बतायेगा क्या

मैं धर्म-निरपेक्षता की अवधारणा के बारे में जानना चाहता हूँ। इसके बारे में अधिकाधिक तथ्य बताने की कृपा करें। यह अवधारणा कहाँ से उत्पन्न हुई, किसने इसे लागू किया, क्यों लागू किया, इसमें क्या अच्छाइयाँ हैं, क्या इसके दोष हैं, यह शब्द कहाँ से लिया गया, इसका शाब्दिक अर्थ क्या है, इत्याद ि । हमारे देश में यह कहाँ से आई, किस राजनेता ने इसे लागू किया, और कितने देश हैं जहाँ धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत का पालन किया जा रहा है, उस देश में अन्य धर्मों के मानने वालों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है। इसके अतिरिक्त इस अवधारणा से सम्बंधित अन्य जानकारी भी उपलब्ध कराने की कृपा करें, जो मैं ऊपर लिखने में छोड़ गया हो सकता हूँ। आशा है कि आप लोग धर्म-निरपेक्षता के बारे में मेरा ज्ञानवर्धन करने की कृपा करेंगे।

किस लिए चुनते हैं हम इन्हें.

पिता जी कहते थे कि एक रुपये में से सिर्फ पन्द्रह पैसे नीचे तक पहुंच पाते हैं, उनके सुपुत्र का कहना है कि यह राशि अब पांच पैसे तक पहुंच गयी है। कितना महान काम किया है, यह ज्ञान बाँट कर। पिछले साठ सालों में अधिकतर उन्हीं के दल का शासन रहा है। इस महान कृत्य के लिए देश उनका ऋण कैसे चुका पायेगा। दिल्ली वाली मैडम कहती हैं कि लड़कियां adventurous न बनें। लखनऊ वाली मैडम कहती हैं कि मुझे पता है थाने बिकते हैं, अब यह सब बंद करना होगा। ललुआ मोची वहीं का वहीं खड़ा है, जहाँ उसके बाप-दादा खड़े थे। घरेलू मोर्चे वाले छोटे मंत्री जी असम में होने वाले धमाकों पर कहत े हैं कि असम में यह सब होता रहता है। बड़े मंत्री जी कहते हैं कि विस्फोट होना है यह तो मालूम था लेकिन कब और कहाँ होगा यह मालूम नहीं था। आख़िर किस लिए चुनते हैं हम इन जन-प्रतिनिधियों को। प्रतिनिधि हैं, इसलिए प्रति व्यक्ति से इकट्ठी हुई निधि पर ऐश करने के लिए। जरा सोचिये। क्या आवश्यकता है हमें ऐसे जन प्रतिनिधियों की, केवल इसलिए कि हम इन्हें चुने, ये ऐयाशी करें हमारे पैसे पर, हमारे ऊपर लाठी-गोली चलवायें और हमारे ऊपर हमले होते रहें ये व्यवस्था क...

हमारे सांसद

जरा एक नजर नीचे भी डाल लीजिये, हम जो सांसद चुनकर भेजते हैं, उन्हें क्या क्या सुविधाएँ मिलती हैं। किस तरह से ये किसी राजा महाराजा से कम हैं। इनके लिए न्यूनतम योग्यता कुछ भी नहीं, चपरासी के लिए भी कम से कम आठवाँ पास होना चाहिए। इनके विरुद्ध चाहे हत्या जैसे संगीन अपराध में मुकदमे दर्ज हों, थोडी बहुत सजा भी हो गई हो तब भी सांसद चुने जा सकते हैं, लेकिन अगर कोई लड़का मार-पीट में फँस गया हो तो उसे सरकारी नौकरी मिलना असंभव है। सरकारी नौकर अगर हड़ताल पर रहे तो कई दफा उसे तनख्वाह नहीं मिलती, ये सदन में सोते रहें, हंगामा करते रहें, न भी आयें तब भी सारी सुविधाओं के पात्र हैं। एक सरकारी कर्मचारी को यह कहकर चुनाव में हिस्सा लेने नहीं दिया जाता कि वह लाभ के पद पर है, लेकिन इनसे ज्यादा लाभ कौन पाता है, नीचे स्पष्ट हो जायेगा (ध्यान दें कि मैं निकम्मे सरकारी नौकरों के पक्ष में नहीं बोल रहा हूँ, मैं केवल एक तुलना कर रहा हूँ)। यह भी कहा जाता है कि सरकारी कर्मचारी व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन जितनी पहुँच इन सांसदों की होती है, उतनी किसी भी सरकारी कर्मचारी की नहीं हो सकती। Have...

प्रत्येक भारतीय के लिए जानने लायक कुछ तथ्य

निम्न लिखित विचार आज की मेरी पोस्ट पर श्री विजय कुमार शर्मा जी ने अपनी टिप्पणी के रूप में दिए हैं, जो मुझे इतने अच्छे लगे कि उनकी पूरी टिप्पणी को ही मैंने यहाँ पेस्ट करदिया है - (मैं शर्मा जी का आभार व्यक्त करता हूँ) "इस चुनाव के पहले जान लेने लायक कुछ तथ्य- http://knol।google।com/k/suresh-kumar-sharma/strong-argument-and-follower-of-this/3mxnj9h0lwhon/11# please promote it। दुनिया की क्रांतियों का इतिहास कहता है कि परिवर्तन के लिए दो चीजों की आवश्यकता है । एक अकाट्य तर्क और दूसरा उस तर्क के पीछे खड़ी भीड़ । अकेले अकाट्य तर्क किसी काम का नही और अकेले भीड़ भी कुम्भ के मेले की शोभा हो सकती है परिवर्तन की सहयोगी नही । इस युग के कुछ अकाट्य तर्क इस प्रकार है - * मशीनों ने मानवीय श्रम का स्थान ले लिया है । * कम्प्यूटर ने मानवीय मस्तिष्क का काम सम्भाल लिया है । * जीवन यापन के लिए रोजगार अनिवार्य होने की जिद अमानवीय है । * 100% रोजगार सम्भव नही है । * अकेले भारत की 46 करोड़ जनसंख्या रोजगार के लिए तरस रही है । * संगठित क्षेत्र में भारत में रोजगार की संख्या मात्र 2 करोड़ है । * दुनिया के ...

फिर आया चुनाव का मौसम

चुनाव का मौसम सर पर है, फिर नेता बरसाती मेंढकों की तरह टर-टराने लगेंगे. फिर सावन-भादों की वर्षा की तरह चारों तरफ़ से घोषणाओं, वादों और मैनिफेस्टो की बारिश होने लगेगी. कुछ घोषणाएं अमर हो चुकी हैं जिनमें गरीबी हटाओ, बेरोजगारी का उन्मूलन, भ्रष्टाचार का समूल नाश, सांप्रदायिक ताकतों पर लगाम, आर्थिक सम्पन्नता, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने जैसी अनादिकाल से चली आ रही घोषणाएं शामिल होंगी. नेताओं को इंसान अब इंसान नजर नहीं आयेंगे, बल्कि वोट नजर आयेंगे. किसी की शक्ल में पंजा तो कोई कमल का फूल, कोई साइकिल तो किसी नेता की आंखों के सामने इंसान हाथी की सूरत में भी नजर आएगा. कुछ दिनों तक अब बड़े से बड़ा दबंग आदमी भी कलुवा को चाचा कहकर पाँव छूता दिखाई देगा, हर घर में कोई न कोई रिश्तेदार बन जायेगा। चाचा, चाची, ताऊ, ताई, मामा, मामी, भइया, भाभी, बुआ, फूफा, भतीजा, भतीजी, जीजा, जीजी न जाने कितने नए रिश्तेदार पैदा हो जायेंगे (अब यह बात और है कि इस तरह की रिश्तेदारियों में कोई पत्नी जैसा रिश्ता निभाना पसंद नहीं करेगा, अन्यथा नेताजी न जाने कितने रिश्ते बना लें) । हर वह आदमी जिसे उनकी गाड़ी के सामने आ जाने पर...