समझौते को लेकर क्यों रोना???
बड़ा शोर मच रहा है न्यूक्लियर डील के ऊपर, कोई कह रहा है होना चाहिए तो कोई इसकी मुखालफत कर रहा है. अब एक पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने लीक कर दिया तो उस पर फिर बवाल शुरू. मेरा यह कहना है कि हम परमाणु परीक्षण करें या न करें क्या फर्क पड़ता है. जब हमारे शीर्ष नेतृत्व के अन्दर कड़े निर्णय लेने की सामर्थ्य ही नहीं है तो फिर इस सब पर बहस करने की आवश्यकता है ही नहीं. कश्मीर पर कोई निर्णय नहीं, वही ढुलमुल रवैया, पाकिस्तान से चार बार युद्ध में विजय प्राप्त की, लेकिन नतीजा, वार्ता की मेज पर हार गए. पाकिस्तानी गोलाबारी और आतंकवाद में कितने लोग मारे गए, कितने सैनिक शहीद हो गए, लेकिन हमारे नेता बसें दौड़ाते रहे. बांगला देश आतंकियों को प्रश्रय देता रहा, हमारे सैनिकों को मारकर जानवरों की तरह लटका देता है, हमारा नेतृत्व निरीह और बेबस लोगों की तरह देखता रहता है. नेहरू जी ने संसद में घोषणा की थी कि चीन से अपनी एक-एक इंच जमीन वापस लेंगे, और उससे पहले कोई बात नहीं होगी, लेकिन क्या हुआ. जिस देश के नेता सिमी और बजरंग दल को एक पलड़े में तौलते हों और आतंकवादी संगठनों के प्रति घोषित/अघोषित सहानुभूति दिखाते हों और घुसपैठ...