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केंद्रीय कर्मचारियों के लिए अच्छी ख़बर

केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए एक अच्छी ख़बर है. No. AB.14017/61/2008-Estt. (RR) Government of India Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions Department of Personnel and Training NewDelhi Sixth Central Pay Commission's recommendationsrevision of pay scales- amendment of Service Rules/Recruitment Rules The recommendations of 6th CPC have been considered by the Government and the CCS (Revised Pay) Rules 2008 have since been notified on 29th August, 2008. Consequently, in place of the pre- revised pay scales, the revised pay structure comprising the Pay Band and Grade Pay/Pay Scale has come into effect. Some of the pre-revised pay scales have been merged and some others are upgraded/likely to be upgraded. In the light of these, it has been decided that the following consequential steps to amend the existing Service Rules/Recruitment Rules shall be undertaken on a priority basis: (i) Substituting the existing scales by the Grade Pay alongwith the Pay Band The existing pay sc...

मतदान का कम प्रतिशत, अल्पसंख्यकों के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं और आतंकवाद से निपटने में बाधक है भ्रष्टाचार

लखनऊ में मात्र ३३ प्रतिशत मतदान हुआ और मेरे अनुमान के अनुसार जो प्रत्याशी दस प्रतिशत मत प्राप्त कर लेगा वह संसद पहुंच जायेगा. इसका सीधा सा मतलब यह है कि १०० में से १० की पसंद ही १०० का प्रतिनिधित्व करेगी. यह एक बड़ी अप्रिय स्थिति है जिसके कारण दो-तीन सांसद वाले दल अति महत्व प्राप्त कर लेते हैं और फलस्वरूप सौदेबाजी की गुंजाइश हो जाती है. इससे यह भी पता चलता है कि भारतीय लोकतन्त्र कोई बहुत अधिक सफल और लोकप्रिय नहीं है. मतदाता राजनैतिक दलों से मायूस हो चुके हैं. इस स्थिति से निपटने के लिये निम्न उपाय किये जा सकते हैं. १-मतदान को अनिवार्य बनाया जाये. २-प्रधानमन्त्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाये. ३-सांसद को चुनने के लिये पहली और दूसरी वरीयता की व्यवस्था की जाये. ४-महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिये ५४५ महानुभाव पर न छोड़ा जाये बल्कि इसके लिये जनमत संग्रह किया जाये जो बाध्यकारी हो. ५-प्रशासन को पूरी तरह से राजनैतिक व्यवस्था से अलग रखा जाये. इस समय विश्व को अल्पसंख्यक रहनुमाओं तथा धर्मनिरपेक्ष नेताओं की घनघोर आवश्यकता है. हमारे देश के अल्पसंख्यक रहनुमा तथा धर्मनिरपेक्ष नेता पता नहीं कहां चले...

भारत की वर्तमान दशा पर एक लेख.

यह लेख कुछ पहले मेरे एक मित्र ने लिखा था, जो कि यूनिकोड में पहले कन्वर्ट नहीं कर पाया था अब जाकर इसे यूनिकोड में बदल पाया हूँ, आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत। विगत 15 अगस्त को भारत को स्वतन्त्र हुये 61 वर्ष पूरे हो गये, स्वतन्त्र भारत की एक पीढ़ी अपने शैशव, युवावस्था को पूर्ण कर अपनी वृद्धावस्था में प्रवेश कर गयी।। स्वातन्त्र्य के इन वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, का विश्लेषण करना आज अपरिहार्य हो गया है। आजादी के लिये लड़ने वाले दीवानों ने क्या इसी स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी? हमारा देश एक ऐसे देश में बदल चुका है जहाँ हजारों नियम-कानून हैं, लेकिन एक भी कानून पूरी ईमानदारी से लागू नहीं होता। आजादी के बाद से सैकड़ों घोटाले हो चुके हैं, लेकिन इनमें शामिल एक भी बड़े आदमी को सजा नहीं हुई, यह अलग बात है कि जाने-अनजाने में, मजबूरी वश इनके मोहरे बने छोटे कर्मचारी अवश्य सजा पा गये। जीप घोटाला, बैंक घोटाला, चीनी घोटाला, जमीन घोटाला, चारा घोटाला, शेयर घोटाला, तोप घोटाला, चारा घोटाला, दवा घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, डेयरी घोटाला, न जाने कितने घोटाले हो चुके हैं, कर देने वाली गरीब जनता के पैसे को...

आ गए लोक सभा चुनाव 2009

एक बार फिर देश तैयार है सैकडों करोड़ रुपए चुनाव में व्यय करने के लिए। फिर वही दल, वही मुखौटे, वही आयाराम-गयाराम। फिर वही दल-बदल दिल-बदल की आड़ में। फिर वही गुंडे-मवाली, जब तक सामने वाले के यहाँ थे अपराधी थे, अब तौबा कर ली। फिर अपराध जब किया था जब सामने वाले के यहाँ थे, अब तो नहीं किया। फिर देश को आगे ले जाने के सपने, साठ सालों में नहीं कर पाये तो अब क्या कर पायेंगे। जब आबादी तिहाई थी तब कुछ नहीं उखाड़ सके तो अब क्या उखाडेंगे। जनता तो पहले भी शोषित थी अब भी रहेगी। फर्क इतना है कि शोषण करने वाले चेहरे बदल जाते हैं। पहले भी बेवकूफ बनाया जाता था अब भी बनाया जाएगा। स्विस सरकार कहती है कि आप चाहे तो अपने देश के भ्रष्टाचारियों का पैसा ले आयें लेकिन यहाँ कौन करेगा और क्यों करेगा। नशा सीमापार से आता है, बॉर्डर पर पोस्टिंग के लिए क्या कुछ नहीं किया जाता। पुलिस जब अपराधियों से मिल जाए या ख़ुद उनके लोग अपराध में लिप्त हों तो देश कैसे चलेगा। सी बी आई राशन घोटाले की जांच को मना कर देती है, बहुत खूब। क्योंकि अपराध बड़ा है, इसलिए बहुत बड़ा अपराध करो और जांच भी नहीं होगी। इस के खिलाफ कुछ हो भी नहीं सक...

दंगे का आंखों देखा हाल

परसों एक दूसरे शहर जाना पड़ा. शाम को वापस आते समय रास्ते में देखा कि एक जगह काफी भीड़ इकट्ठी थी, जाम लग गया था. जानने पर पता चला कि वारावफात के रास्ते को लेकर कुछ विवाद हो रहा है. देखते ही देखते मुस्लिम सम्प्रदाय के काफी लोग एकत्र हो गये. मैं गाड़ी को न इधर ले जा सकता था और न उधर. गाड़ी से जैसे तैसे उतरा और एक गली की तरफ बढ़ गया. मेरे पास छुपकर खड़े रहने के अतिरिक्त और कोई चारा भी नहीं था. मिनटों में ही हजारों लोग जमा हो गये, और देखते ही देखते पहले पत्थर और फिर गोलिय़ां चलने लगीं. उनकी तरफ से ऐसी तैयारी लग रही थी जैसे वे किसी युद्ध में हिस्सा लेने जा रहे हों. जाहिर है कि उनमें से अधिकतर नाजायज असलहों से लैस थे. पुलिस की संख्या और तैयारी कम थी, लगता था कि उन्हें इस बात का भान ही नहीं था कि ऐसी घटना हो सकती है और इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पास हथियार होंगे. जो नारे लग रहे थे उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि यहां इस्लाम खतरे में आ गया है और उसके लिये यह लड़ाई लड़ी जा रही थी. उस समय वहां के हमलावर एकराय थे, किसी पार्टी और खेमे में नहीं बंटे थे और न ही पार्टी विशेष से सम्बन्धित व्यक्ति को निशाना ...

चुनावी विज्ञापनों पर लुटाया जा रहा जनता का धन..

चुनाव आसन्न हैं , हर चैनल और अखबार में सरकारों का विज्ञापन आ रहा है . पिछली सरकार अर्थात एनडीए के समय इंडिया शाइन खूब दिखाई देता था अब भारत की प्रगति हर चैनल पर चिल्ला रही है . उत्तरप्रदेश की सरकार भी अपनी नीतियों का बखान करती हुई दिखाई दे रही है . जाहिर है कि निजी चैनल इन विज्ञापनों को मुफ्त में तो प्रसारित करने से रहे , हर रोज करोड़ों रुपये लुटाये जा रहे होंगे इन विज्ञापनों पर . किसकी मेहनत की कमाई है , किसकी जेब के रुपये हैं यह . जो भी सरकार रहे , दोनों हाथों से पैसा लुटाती है . अभी ओबामा ने हर हफ्ते किये जाने वाले कार्यों - व्ययों का ब्यौरा देना प्रारम्भ कर दिया है , लेकिन भारत सरकार की गोपनीयता का आलम देखिए कि मन्त्री के रिश्तेदारों की सम्पत्ति को भी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता . धन्य है भारत देश .

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन.

पिंक पैंटी को लेकर हमारे यहां बहुत बवाल हुआ. बहुत सारी महिलाओं और उससे अधिक पुरुषों ने पिंक पैंटी ब्रिगेड को भरपूर समर्थन दिया और इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का ध्वजवाहक बताया. पिंक पैंटी भेजने का विरोध करने के लिये अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विरोध बताया और तुलना हिटलर से कर दी. लेकिन पिछले दिनों एक ऐसा कार्य किया गया जो वास्तविक अर्थों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा था और जिसके विरोध में इस तरह की आवाजें बुलंद नहीं हुईं. वह था तमाम संगठनों द्वारा ओपिनियन पोल और चुनाव पूर्व सर्वे के प्रसारण पर रोक. इन पर रोक के पक्ष में तमाम राजनीतिक दल और नेता भी थे. तर्क यह दिया गया कि इससे मतदाता गड़बड़ा जाता है और भ्रमित हो जाता है - क्या भारतीय मतदाता को यह दल बेवकूफ मानते हैं? यदि हां तो फिर ऐसे लोगों को वोट देने का हक नहीं होना चाहिये अन्यथा इस पर रोक गलत है. दूसरा यह कि भारत में सर्वे और पोल के परिणाम ठीक नहीं होते - यदि ठीक नहीं होते तो राजनीतिक दलों को इससे डरने की कोई आवश्यकता ही नहीं है और यदि ठीक होते हैं तो यह और भी अच्छा है हर राजनीतिक दल अपने पक्ष के लिये नकल...

बाबा रामदेव द्वारा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की स्थापना और उन पर लगाये गए आरोप

पिछले दिनों बाबा रामदेव द्वारा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की स्थापना की गई जिसका मुख्य उद्देश्य भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिये कार्य करना है। एक वेब-पत्रिका पर बाबा रामदेव के इस कदम के बारे में काफी विस्तृत जानकारी दी गयी थी. जाहिर है कि इस लेख पर लोगों ने टिप्पणियां भी की थीं. कुछ टिप्पणियों में यह कहा गया था कि बाबा लूट रहे हैं, बाबा ने इतने करोड़ रुपया कमा लिया है, उनकी फार्मेसी का टर्न-ओवर इतना है. बाबा हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं,बाबा ने चार-छ: कलाबाजी सीख ली हैं, बाबा प्रोपेगैण्डा कर रहे हैं और बाबा अब राजनीति में आकर सत्ता कब्जाना चाहते हैं. मैं ऐसे व्यक्तियों से कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूं :- ऐसे कितने लोग हैं जो स्वयं या अपने बच्चों को बाबा की भांति बनाना चाहेंगे. ऐसे कितने लोग हैं जो अपने शारीरिक, भौतिक और सामाजिक सुखों को त्यागना चाहेंगे. क्या फार्मेसी चलाना कोई गुनाह है. क्या ये लोग बतायेंगे कि बाबा ने किसके लिये इतने रुपये इकठ्ठा किये. क्या इन लोगों को नहीं पता है कि हरिद्वार में कितना बड़ा चिकित्सालय-विश्वविद्यालय बाबा ने बनाकर खड़ा किया है क्या बाबा जबरदस्...

एक और तस्वीर देखिये भारत के भविष्य की.

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एक और तस्वीर देखिये भारत के भविष्य की

कोई मुझे धर्म-निरपेक्षता के बारे में बतायेगा क्या

मैं धर्म-निरपेक्षता की अवधारणा के बारे में जानना चाहता हूँ। इसके बारे में अधिकाधिक तथ्य बताने की कृपा करें। यह अवधारणा कहाँ से उत्पन्न हुई, किसने इसे लागू किया, क्यों लागू किया, इसमें क्या अच्छाइयाँ हैं, क्या इसके दोष हैं, यह शब्द कहाँ से लिया गया, इसका शाब्दिक अर्थ क्या है, इत्याद ि । हमारे देश में यह कहाँ से आई, किस राजनेता ने इसे लागू किया, और कितने देश हैं जहाँ धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत का पालन किया जा रहा है, उस देश में अन्य धर्मों के मानने वालों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है। इसके अतिरिक्त इस अवधारणा से सम्बंधित अन्य जानकारी भी उपलब्ध कराने की कृपा करें, जो मैं ऊपर लिखने में छोड़ गया हो सकता हूँ। आशा है कि आप लोग धर्म-निरपेक्षता के बारे में मेरा ज्ञानवर्धन करने की कृपा करेंगे।

द ग्रेट इंडियन ब्लास्ट तमाशा

पहले पुंसत्वहीन लोगों की तरफ़ से :- आओ वीर आतंकियो आओ तुम्हारा स्वागत है इस धर्मनिरपेक्ष मुल्क में हम तैयार हैं तुम्हारे स्वागत को हमारे बच्चे भी, आओ तुम बम लगाओ हमारी जडें बहुत मजबूत हैं हिलेंगी नहीं तब भी, जब हमारा अस्तित्व खत्म हो जायेगा, तब भी कौमी तराने गूंजते रहेंगे चाहे उन्हें सुनने वाला कोई न हो तुम हमारी पीढियों को तबाह कर सकते हो क्योंकि तुम अल्प हो हम अपने बच्चों को आगे करते रहेंगे तुम उनके सीने चाक करते रहना क्योंकि तुम अल्प हो और जो चीज बढ जाती है उसे खत्म होना ही होता है इसलिये तुम बम लगाओ हम तुम्हें सजा नहीं देंगे, खीर देंगे खीर खाओ और इन्तजार करो कि कब एक आई सी ८१४ उडे और कब तुम्हें शाही मेहमान की तरह छोडा जाये तुम हमारे उन बच्चों के सीने गोलियों से छलनी कर दो जिन्हें हमने प्यार से पाला था बडे अरमानों से पोसा था तुम बम लगा सकते हो हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे क्योंकि हम वास्तविक धर्म निरपेक्ष हैं हम इतिहास से भी सबक नहीं लेंगे क्योंकि हम बहुल हैं, हम निरपेक्ष हैं आओ तुम स्वतन्त्र हो कहीं भी बम लगाओ ट्रेन में, पार्क में, पूजा स्थलों में, अदालतों में लेकिन हम फिर भी चुप रह...

आर्थिक मंदी से बेहाल दुनिया

आर्थिक मंदी से दुनिया बेहाल है , शेयर मार्केट धड़ाम हो चुके हैं । लोग आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या करने जैसे दुर्भाग्यपूर्ण कदम भी उठा रहे हैं । मेरा भी कुछ रुपया म्युचुअल फंडों में लगा हुआ था जो आज की तारीख में घटकर तिहाई रह गया है। मेरे पड़ोस में रहने वाला जयप्रकाश जो मोची का काम करता है , उसने मुझसे एक सवाल किया जोकि उसी के शब्दों में लिख रहा हूँ - " भाई साहब , अखबार में रोज आ रहा है कि दुनिया में मंदी आ रही है , कंपनियों के शेयर रोज गिर रहे हैं , लेकिन महंगाई वहीं के वहीं । न तेल - साबुन के दाम कम हुए , न आटा - चावल के , बसों - टेंपो के किराये जो बढ़ जाते हैं कभी कम नहीं होते । मंदी बहुत है लेकिन मकान सस्ते नहीं हुए , न जमीनों के दाम कम हुए , न लोहे सीमेंट के । सब्जियों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि घर का खर्च कैसे चलता है , हम ही जानते हैं । स्कूल की फीसें कम नहीं हुईं , कापी - किताबों के दाम कम नहीं हुए , जूते - कपड़े भी उतने ही महंगे हैं ।...

किस लिए चुनते हैं हम इन्हें.

पिता जी कहते थे कि एक रुपये में से सिर्फ पन्द्रह पैसे नीचे तक पहुंच पाते हैं, उनके सुपुत्र का कहना है कि यह राशि अब पांच पैसे तक पहुंच गयी है। कितना महान काम किया है, यह ज्ञान बाँट कर। पिछले साठ सालों में अधिकतर उन्हीं के दल का शासन रहा है। इस महान कृत्य के लिए देश उनका ऋण कैसे चुका पायेगा। दिल्ली वाली मैडम कहती हैं कि लड़कियां adventurous न बनें। लखनऊ वाली मैडम कहती हैं कि मुझे पता है थाने बिकते हैं, अब यह सब बंद करना होगा। ललुआ मोची वहीं का वहीं खड़ा है, जहाँ उसके बाप-दादा खड़े थे। घरेलू मोर्चे वाले छोटे मंत्री जी असम में होने वाले धमाकों पर कहत े हैं कि असम में यह सब होता रहता है। बड़े मंत्री जी कहते हैं कि विस्फोट होना है यह तो मालूम था लेकिन कब और कहाँ होगा यह मालूम नहीं था। आख़िर किस लिए चुनते हैं हम इन जन-प्रतिनिधियों को। प्रतिनिधि हैं, इसलिए प्रति व्यक्ति से इकट्ठी हुई निधि पर ऐश करने के लिए। जरा सोचिये। क्या आवश्यकता है हमें ऐसे जन प्रतिनिधियों की, केवल इसलिए कि हम इन्हें चुने, ये ऐयाशी करें हमारे पैसे पर, हमारे ऊपर लाठी-गोली चलवायें और हमारे ऊपर हमले होते रहें ये व्यवस्था क...

हमारे सांसद

जरा एक नजर नीचे भी डाल लीजिये, हम जो सांसद चुनकर भेजते हैं, उन्हें क्या क्या सुविधाएँ मिलती हैं। किस तरह से ये किसी राजा महाराजा से कम हैं। इनके लिए न्यूनतम योग्यता कुछ भी नहीं, चपरासी के लिए भी कम से कम आठवाँ पास होना चाहिए। इनके विरुद्ध चाहे हत्या जैसे संगीन अपराध में मुकदमे दर्ज हों, थोडी बहुत सजा भी हो गई हो तब भी सांसद चुने जा सकते हैं, लेकिन अगर कोई लड़का मार-पीट में फँस गया हो तो उसे सरकारी नौकरी मिलना असंभव है। सरकारी नौकर अगर हड़ताल पर रहे तो कई दफा उसे तनख्वाह नहीं मिलती, ये सदन में सोते रहें, हंगामा करते रहें, न भी आयें तब भी सारी सुविधाओं के पात्र हैं। एक सरकारी कर्मचारी को यह कहकर चुनाव में हिस्सा लेने नहीं दिया जाता कि वह लाभ के पद पर है, लेकिन इनसे ज्यादा लाभ कौन पाता है, नीचे स्पष्ट हो जायेगा (ध्यान दें कि मैं निकम्मे सरकारी नौकरों के पक्ष में नहीं बोल रहा हूँ, मैं केवल एक तुलना कर रहा हूँ)। यह भी कहा जाता है कि सरकारी कर्मचारी व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन जितनी पहुँच इन सांसदों की होती है, उतनी किसी भी सरकारी कर्मचारी की नहीं हो सकती। Have...

प्रत्येक भारतीय के लिए जानने लायक कुछ तथ्य

निम्न लिखित विचार आज की मेरी पोस्ट पर श्री विजय कुमार शर्मा जी ने अपनी टिप्पणी के रूप में दिए हैं, जो मुझे इतने अच्छे लगे कि उनकी पूरी टिप्पणी को ही मैंने यहाँ पेस्ट करदिया है - (मैं शर्मा जी का आभार व्यक्त करता हूँ) "इस चुनाव के पहले जान लेने लायक कुछ तथ्य- http://knol।google।com/k/suresh-kumar-sharma/strong-argument-and-follower-of-this/3mxnj9h0lwhon/11# please promote it। दुनिया की क्रांतियों का इतिहास कहता है कि परिवर्तन के लिए दो चीजों की आवश्यकता है । एक अकाट्य तर्क और दूसरा उस तर्क के पीछे खड़ी भीड़ । अकेले अकाट्य तर्क किसी काम का नही और अकेले भीड़ भी कुम्भ के मेले की शोभा हो सकती है परिवर्तन की सहयोगी नही । इस युग के कुछ अकाट्य तर्क इस प्रकार है - * मशीनों ने मानवीय श्रम का स्थान ले लिया है । * कम्प्यूटर ने मानवीय मस्तिष्क का काम सम्भाल लिया है । * जीवन यापन के लिए रोजगार अनिवार्य होने की जिद अमानवीय है । * 100% रोजगार सम्भव नही है । * अकेले भारत की 46 करोड़ जनसंख्या रोजगार के लिए तरस रही है । * संगठित क्षेत्र में भारत में रोजगार की संख्या मात्र 2 करोड़ है । * दुनिया के ...

फिर आया चुनाव का मौसम

चुनाव का मौसम सर पर है, फिर नेता बरसाती मेंढकों की तरह टर-टराने लगेंगे. फिर सावन-भादों की वर्षा की तरह चारों तरफ़ से घोषणाओं, वादों और मैनिफेस्टो की बारिश होने लगेगी. कुछ घोषणाएं अमर हो चुकी हैं जिनमें गरीबी हटाओ, बेरोजगारी का उन्मूलन, भ्रष्टाचार का समूल नाश, सांप्रदायिक ताकतों पर लगाम, आर्थिक सम्पन्नता, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने जैसी अनादिकाल से चली आ रही घोषणाएं शामिल होंगी. नेताओं को इंसान अब इंसान नजर नहीं आयेंगे, बल्कि वोट नजर आयेंगे. किसी की शक्ल में पंजा तो कोई कमल का फूल, कोई साइकिल तो किसी नेता की आंखों के सामने इंसान हाथी की सूरत में भी नजर आएगा. कुछ दिनों तक अब बड़े से बड़ा दबंग आदमी भी कलुवा को चाचा कहकर पाँव छूता दिखाई देगा, हर घर में कोई न कोई रिश्तेदार बन जायेगा। चाचा, चाची, ताऊ, ताई, मामा, मामी, भइया, भाभी, बुआ, फूफा, भतीजा, भतीजी, जीजा, जीजी न जाने कितने नए रिश्तेदार पैदा हो जायेंगे (अब यह बात और है कि इस तरह की रिश्तेदारियों में कोई पत्नी जैसा रिश्ता निभाना पसंद नहीं करेगा, अन्यथा नेताजी न जाने कितने रिश्ते बना लें) । हर वह आदमी जिसे उनकी गाड़ी के सामने आ जाने पर...

समझौते को लेकर क्यों रोना???

बड़ा शोर मच रहा है न्यूक्लियर डील के ऊपर, कोई कह रहा है होना चाहिए तो कोई इसकी मुखालफत कर रहा है. अब एक पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने लीक कर दिया तो उस पर फिर बवाल शुरू. मेरा यह कहना है कि हम परमाणु परीक्षण करें या न करें क्या फर्क पड़ता है. जब हमारे शीर्ष नेतृत्व के अन्दर कड़े निर्णय लेने की सामर्थ्य ही नहीं है तो फिर इस सब पर बहस करने की आवश्यकता है ही नहीं. कश्मीर पर कोई निर्णय नहीं, वही ढुलमुल रवैया, पाकिस्तान से चार बार युद्ध में विजय प्राप्त की, लेकिन नतीजा, वार्ता की मेज पर हार गए. पाकिस्तानी गोलाबारी और आतंकवाद में कितने लोग मारे गए, कितने सैनिक शहीद हो गए, लेकिन हमारे नेता बसें दौड़ाते रहे. बांगला देश आतंकियों को प्रश्रय देता रहा, हमारे सैनिकों को मारकर जानवरों की तरह लटका देता है, हमारा नेतृत्व निरीह और बेबस लोगों की तरह देखता रहता है. नेहरू जी ने संसद में घोषणा की थी कि चीन से अपनी एक-एक इंच जमीन वापस लेंगे, और उससे पहले कोई बात नहीं होगी, लेकिन क्या हुआ. जिस देश के नेता सिमी और बजरंग दल को एक पलड़े में तौलते हों और आतंकवादी संगठनों के प्रति घोषित/अघोषित सहानुभूति दिखाते हों और घुसपैठ...

हमें फिर भी शर्म नहीं आती.

एक स्वर्ण, दो कांस्य मिल गए, मीडिया ने ऐसा गुणगान किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे भारत ने पदक तालिका में टॉप किया हो. उन तीनों खिलाड़ियों का गुणगान अवश्य करना चाहिए जिन्होनें अपने बल-बूते पर यह पदक हासिल किए लेकिन यह उनके अपने प्रयास थे, बाकी ५३ खिलाड़ी और ४६ अधिकारियों का बड़ा दल जो बीजिंग गया था, उनके बारे में भी बताया जाना चाहिए, ४६ अधिकारियों के दल का क्या औचित्य था, सानिया मिर्जा की माँ उनके कोच के रूप में कैसे चली गयीं. हमारी महिला खिलाड़ी अपनी पारंपरिक पोशाक तक नहीं पहन सकीं. हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को न्यौता तक नहीं मिला. पिछले ओलम्पिक के, उससे पिछले ओलम्पिक के और इसी प्रकार पिछले कई ओलंपिकों के समय के अखबारों की कतरनें उठाकर देखिये, सब में अधिकारियों के वही बयान छपे होंगे कि अगले ओलम्पिक में अच्छा करेंगे, खिलाड़ियों का वही दुखड़ा और वही बहाने. शर्म यह देखकर आना चाहिए कि जमैका जैसा छोटा देश भी छ; स्वर्ण पदक जीतता है. हमारे देश में सबसे पहले पॉलिटिक्स उसके बाद नौकरशाही फिर भाई-भतीजा वाद और तदुपरांत कैरियर की चिंता, यह सब ऐसे नासूर हैं जो खिलाड़ियों को आगे बढ़ने नहीं ...