किस लिए चुनते हैं हम इन्हें.
पिता जी कहते थे कि एक रुपये में से सिर्फ पन्द्रह पैसे नीचे तक पहुंच पाते हैं, उनके सुपुत्र का कहना है कि यह राशि अब पांच पैसे तक पहुंच गयी है। कितना महान काम किया है, यह ज्ञान बाँट कर। पिछले साठ सालों में अधिकतर उन्हीं के दल का शासन रहा है। इस महान कृत्य के लिए देश उनका ऋण कैसे चुका पायेगा। दिल्ली वाली मैडम कहती हैं कि लड़कियां adventurous न बनें। लखनऊ वाली मैडम कहती हैं कि मुझे पता है थाने बिकते हैं, अब यह सब बंद करना होगा। ललुआ मोची वहीं का वहीं खड़ा है, जहाँ उसके बाप-दादा खड़े थे। घरेलू मोर्चे वाले छोटे मंत्री जी असम में होने वाले धमाकों पर कहत े हैं कि असम में यह सब होता रहता है। बड़े मंत्री जी कहते हैं कि विस्फोट होना है यह तो मालूम था लेकिन कब और कहाँ होगा यह मालूम नहीं था। आख़िर किस लिए चुनते हैं हम इन जन-प्रतिनिधियों को। प्रतिनिधि हैं, इसलिए प्रति व्यक्ति से इकट्ठी हुई निधि पर ऐश करने के लिए। जरा सोचिये। क्या आवश्यकता है हमें ऐसे जन प्रतिनिधियों की, केवल इसलिए कि हम इन्हें चुने, ये ऐयाशी करें हमारे पैसे पर, हमारे ऊपर लाठी-गोली चलवायें और हमारे ऊपर हमले होते रहें ये व्यवस्था क...