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श्री सुरेश चिपलूनकर जी से अभूतपूर्व मेल खाते एक ब्लागर के विचार.

श्री सुरेश चिपलूनकर जी की इस पोस्ट को देखें - http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/01/bharat-ratna-civil-awards-of-india.html "क्या? वीर सावरकर को “भारत-रत्न”?? तू साम्प्रदायिक संघी है…… Bharat Ratna, Civil Awards of India प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी पद्म पुरस्कारों की घोषणा की रस्म निभाई गई। जिस प्रकार पुराने जमाने में राजा-बादशाह खुश होकर अपनी रियासत के कलाकारों, राजा की तारीफ़ में कसीदे काढ़ने वाले भाण्डों और चारण-भाट को पुरस्कार, सोने के सिक्के, हार आदि बाँटा करते थे, वही परम्परा लोकतन्त्र के साठ साल (यानी परिपक्व ? लोकतन्त्र हो जाने) के बावजूद जारी है। जैसा कि सभी जानते हैं “भारत रत्न” भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, फ़िर आता है पद्म विभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री आदि। अब तक कुल 41 लोगों को भारत रत्न का सम्मान दिया जा चुका है (यह संख्या 42 भी हो सकती थी, यदि “तकनीकी आधार”(??) पर खारिज किया गया सुभाषचन्द्र बोस का सम्मान भी गिन लिया जाता)। भारत रत्न प्रदान करने के लिये बाकायदा एक विशेषज्ञ समिति होती है जो यह तय करती है कि किसे यह सम्मान दिया जाना चाहिये और यह अनुशंसा राष्ट्रप...

महाराष्ट्र में इन्टरनेट के जरिये दर्ज होगी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज

आज एक खबर पढ़ी कि महाराष्ट्र में ई-कम्प्लेंट दर्ज होगी. अब व्यक्ति के लिए थाने जाने की आवश्यकता नहीं होगी, इन्टरनेट के जरिये ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो जायेगी तथा उसकी एक प्रतिलिपि मोबाइल पर उपलब्ध होगी. डीसीपी स्तर का अधिकारी शिकायत की जांच करेगा और तदनुसार कार्रवाई होगी. निश्चित रूप से अच्छा फैसला है महाराष्ट्र सरकार का जिसकी प्रशंसा होना चाहिए. देखना यह होगा कि भारत की अंग्रेजी परम्पराओं में विश्वास रखने वाली पुलिस इस फैसले को किस हद तक फलीभूत कर सकती है. भावना निस्संदेह अच्छी है और सुविधाजनक भी, लेकिन इसके आफ्टर-इफेक्ट्स क्या होंगे यह देखने लायक होगा. दर-असल दिक्कत पुलिस की मानसिकता में है, पुलिस वाले अपने लिए क़ानून से ऊपर समझते हैं और कई दफा तो अपने निजी हितों हेतु क़ानून की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकते.  यदि कोई ऐसी व्यवस्था भी बनाई जा सके जिससे कि इन पुलिस वालों की मानसिकता बदल जाए तो निश्चित रूप से सोने पर सुहागा होगा. बहरहाल अभी तो चव्हाण जी बधाई के पात्र हैं ही इस आधुनिक व्यवस्था को लागू करने के लिए. 

राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलते वाहन और शहर के अन्दर दौड़ते आटो जो किसी को दिखाई नहीं देते

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इस जीप में तीन व्यक्ति पीछे लटके थे और एक व्यक्ति ड्राइवर के दाहिनी तरफ बैठा हुआ था. ड्राइवर की सीट के पास एक लोहे का टुकड़ा लगा दिया गया है जिस पर यह व्यक्ति पीछे की तरफ मुंह करके बैठा नजर आ रहा होगा. जीप काफी तेज गति से आ रही थी इसलिये फोटो धुंधला हो गया है. राष्ट्रीय राजमार्ग पर दौड़ रहे टैम्पो में पीछे लटके दो व्यक्ति और बांयी ओर लटका एक व्यक्ति देख सकते हैं. शहर के अन्दर भी इससे अधिक बेहतर हालात नहीं हैं. इस आटो के पीछे भी दो व्यक्ति खड़े होकर सफर पूरा कर रहे हैं. इस तांगे को देखिए. दर्जन भर से अधिक व्यक्ति बैठे हुये हैं इस पर. स्वयं तो जोखिम में हैं ही साथ में घोड़े की हालत भी खराब हो रही है.जान हथेली पर लेकर यात्रा करना इन लोगों की मजबूरी हो गयी है, लेकिन सरकार की क्या मजबूरियां हैं, समझ नहीं आता. एक अन्य फोटो में आपको रोशनी और शटर स्पीड का जादू दिखाई देगा. इस फोटो को रात में लिया था जिसके कारण एक्सपोजर समय बढ़ गया और इसी दौरान हाथ के हिलने से कैमरा घूम गया. परिणाम यह कि घूमती हुई रोशनी फोटो में आ गयीं.

चित्र पहेली का उत्तर कुछ अन्य चित्रों के साथ

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पिछले फोटो में आप लोगों ने सही पहचाना. वसूली ही हो रही थी. राष्ट्रीय राजमार्गों पर हर जगह यही आलम है. अब वसूली के लिये कुछ लोग पाल लिये जाते हैं ताकि पकड़े जाने पर सारा दोष उन किराये के टट्टुओं पर मढ़ दिया जाये. रोजाना हजारों ट्रक-टैम्पो निकलते हैं चौथ देते हुये. कहीं पुलिस वाले, कहीं सचल दल-परिवहन विभाग वाले खड़े रहते हैं. कई बार लम्बे जाम लग जाते हैं. बड़े-बड़े नेताओं, अधिकारियों और प्रेस का बिल्ला लगी न जाने कितनी गाड़ियां निकलती गयीं आंख मूंदकर. शायद अब यही हमारी संस्कृति और शिष्टाचार बन गयी है. हजारों ओवरलोडेड ट्रक काल बनकर सड़कों पर रोज दौड़ते हैं. जब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है तो राज्य के सचिव, मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और परिवहन विभाग वालों के बयान आने लगते हैं और दो-चार दिन थोड़ा बहुत दिखावा कर लिया जाता है और फिर एक बड़ी दुर्घटना की प्रतीक्षा होने लगती है. फिर मरने वालों को इतना और घायलों को इतना मुआवजा दे दिया जाता है और लोकतन्त्र इन्हीं ओवरलोडेड ट्रकों पर फर्राटा भरने लगता है. कल कुछ चित्र और प्रस्तुत करूंगा.

एक चित्र पहेली मेरी तरफ से भी.

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आप लोगों के लिये एक बड़ी आसान चित्र पहेली दे रहा हूं, देखिये और बताइये. आपको अपने शब्दों में इस चित्र को देखकर बताना है कि इस पहेली का  क्या अर्थ है. एक मिनट में उत्तर लिखने वाला  जीनियस. दो मिनट में उत्तर लिखने वाला जीनियस और पांच मिनट में लिखने वाला भी जीनियस तथा उत्तर जानकर  भी न लिखने वाला  सुपर जीनियस :)

एक ही काम के लिये किसी को सम्मानित किया जाता है तो किसी के विरुद्ध एफआईआर

एक ही काम के लिये किसी को सम्मानित किया जाता है तो किसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई जाती है. रुखसाना और विनय कटियार कुछ समानता या असमानता का अहसास हुआ या नहीं. मैं आपकी याद ताजा कराता हूं. जम्मू-कश्मीर की रुखसाना को एक आतंकवादी को मारने पर नकद इनाम दिया जा रहा है, सरकारी नौकरी देने की घोषणा भी की गयी है. विभिन्न सरकारी-गैर सरकारी संगठन अपने पास बुलाकर सम्मानित कर रहे हैं और अन्य लोगों से भी इसी प्रकार के वीरता पूर्ण कार्य करने का आवाहन कर रहे हैं, जो कि होना भी चाहिये. अब याद दिलाता हूं कि अब से कुछ वर्ष पहले विनय कटियार ने आतंकवादियों को मारने पर कुछ इनाम देने की घोषणा की थी और उस पर जम्मू-कश्मीर में बवाल हो गया. तत्कालीन मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद ने यह कहते हुये कि इससे पूरे जम्मू कश्मीर की कानून व्यवस्था पर खतरनाक प्रभाव पड़ेगा, विनय कटियार के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दे दिये. क्या फर्क है उस समय और आज में. मात्र इतना कि आज गुलाम नबी आजाद मुख्यमन्त्री नहीं हैं, लेकिन केन्द्र में तो मन्त्री हैं, फिर आज ऐसा कहने वालों के विरुद्ध किसी प्रकार का न तो बयान दे रहे हैं और न ही कि...

एलर्जी से उत्पन्न खांसी के लिये एक स्व-अनुभूत प्रयोग

मुझे एलर्जी है प्रोटीन से. अब प्रोटीन से बच पाना तो बहुत मुश्किल है. कोशिश करता हूं कि इससे बचा रह सकूं. कभी-कभी पन्द्रह-बीस दिन में सेट्रीजीन लेता हूं. इसके साथ ही मुझे सुबह को काफी देर तक लगातार छींकें आती हैं और खांसी भी परेशान करती है. शाम को यह दिक्कत बहुत बढ़ जाती थी विशेषत: सोने से पहले ऐसा लगता था कि गले में कोई चीज अटक सी रही हो और खंखारने लगता था. एक दिन मेरी पत्नी ने किसी पुरानी पत्रिका में पढ़ा कि खांसी के लिये तेजपात की दो-तीन पत्तियां दूध में खौलाकर उस दूध को पीने से लाभ मिलता है. चूंकि मैं कई नामचीन चिकित्सकों से सलाह ले चुका था और दवाई भी, तथा कई इसी प्रकार के नुस्खे भी आजमा चुका था लेकिन मुझे कोई लाभ नहीं हुआ अत: मैंने इस बात को भी टाल दिया. खैर, मेरी पत्नी ने उस दिन जिद कर मुझे वह नुस्खा आजमाने को कहा. मैंने उसमें थोड़ा संशोधन किया वह यह कि तेजपात को चाय में डलवा दिया. इसलिये क्योंकि दूध मुझे अब अच्छा नहीं लगता, मुझे बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं जब नानी के यहां हंडिया में खौलता हुआ दूध जिसका रंग हल्का गुलाबी हो जाता था, उसे जब गुड़ के साथ पीता था, तो बड़ा ही आनन्द आता था ...