आख़िर इसमें मुस्लिमों का क्या दोष है?

भारतीय जनता पार्टी पिछले कई वर्षों से यह आरोप लगाती चली आ रही है कि मुस्लिमों के लिए तुष्टिकरण की नीतियाँ अपनाई जा रही हैं। उसके अतिरिक्त सभी पार्टियाँ मुसलमानों को खुश करने के लिए तुष्टिकरण का सहारा ले रही हैं। यह सवाल मेरे मन में भी कई बार उठा कि इस आरोप को गहराई में जाकर देखा जाए और इस बात की पुष्टि की जाए कि क्या वास्तव में ही तुष्टिकरण की नीतियाँ अपनाई जा रही हैं और यदि सभी दल तुष्टिकरण की बात कर रहे हैं तो इसके पीछे क्या कारण हैं? मैंने अभी पिछले दिनों जारी सच्चर आयोग की रिपोर्ट में दिए गए आंकडे देखे, जम्मू कश्मीर पर सभी पार्टियों का रवैया देखा। इसके साथ आन्ध्र प्रदेश में आरक्षण के बारे में भी पढ़ा। पिछले कई निर्णयों जिनमें एक शाहबानो से सम्बंधित फैसला भी था, उसे भी देखा। इस बारे में तो कोई दो-राय हो ही नहीं सकती कि मुस्लिमों के लिए तुष्टिकरण की नीतियाँ लागू की जा रही हैं। इसे बार-बार कहने सुनने की आवश्यकता नहीं है, यह तो प्रत्यक्ष है और प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन आख़िर क्या कारण है जो सभी पार्टियाँ मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए भाग रही हैं, क्यों उन्हें ही केंद्रबिंदु मानकर तमाम योजनाओं की आधारशिला रखी जा रही है, यदि न भी रखी जा रही है तो कम से कम ऐसा दिखावा किया जा रहा है। मैंने ज्यों ज्यों सोचना प्रारभ किया त्यों त्यों केवल एक मात्र निष्कर्ष ही सामने आया और वह था मुस्लिमों द्वारा किया जा रहा अपने सबसे बड़े अधिकार का सम्पूर्ण प्रयोग। मुस्लिमों में मतदान को लेकर काफी जागरूकता आयी है, कारण चाहे वह धार्मिक हो या राजनैतिक, यह देखा गया है कि चुनाव दर चुनाव मुस्लिम वोटों की भागीदारी बढ़ती चली जा रही है। इसके विपरीत हिन्दू मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने के प्रति उदासीन रहते हैं। अधिकाँश पढ़े-लिखे तबके के मतदाता मतदान करने हेतु जाना पसंद नहीं करते और इसके लिए वे कई प्रकार के बहाने गढ़ लेते हैं। उन चुनाव क्षेत्रों में जहाँ मुस्लिम मतदाता २० प्रतिशत भी हैं, अपने वोटों से निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। शीशे की तरह साफ है कि किन लोगों के वोट सरकार बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। और जो लोग सरकार बनाने में या बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, जाहिर है कि कोई भी सरकार हो या व्यक्ति हो उन्हीं के बारे में अधिक ध्यान से सोचेगा। इसमें इतना आक्रोशित होने की कोई आवश्यकता है ही नहीं। यदि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपनी ताकत को पहचाना है, अपने मत की ताकत को पहचान कर उसका अपने लिए प्रयोग किया है तो इसमें आश्चर्य क्या है। हर व्यक्ति अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अपने पास उपलब्ध सभी संसाधनों को प्रयोग में लाता है, एक की बुद्धिमानी के लिए उसे कोसना उचित नही है। यदि आम का पेड़ लगाया है तो आम मिलेगा, बबूल लगाया है तो कांटे मिलेंगे, यदि कुछ नहीं किया है तो खाली बैठ कर देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं हो सकता। यदि मतदाता ही अपने लिए मिले इतने बड़े हथियार को आजमाना ही नहीं चाहता, उसे प्रयोग में लाने की ही इच्छा नहीं रखता तो फिर क्या किया जा सकता है।

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