हमें फिर भी शर्म नहीं आती.

एक स्वर्ण, दो कांस्य मिल गए, मीडिया ने ऐसा गुणगान किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे भारत ने पदक तालिका में टॉप किया हो. उन तीनों खिलाड़ियों का गुणगान अवश्य करना चाहिए जिन्होनें अपने बल-बूते पर यह पदक हासिल किए लेकिन यह उनके अपने प्रयास थे, बाकी ५३ खिलाड़ी और ४६ अधिकारियों का बड़ा दल जो बीजिंग गया था, उनके बारे में भी बताया जाना चाहिए, ४६ अधिकारियों के दल का क्या औचित्य था, सानिया मिर्जा की माँ उनके कोच के रूप में कैसे चली गयीं. हमारी महिला खिलाड़ी अपनी पारंपरिक पोशाक तक नहीं पहन सकीं. हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को न्यौता तक नहीं मिला. पिछले ओलम्पिक के, उससे पिछले ओलम्पिक के और इसी प्रकार पिछले कई ओलंपिकों के समय के अखबारों की कतरनें उठाकर देखिये, सब में अधिकारियों के वही बयान छपे होंगे कि अगले ओलम्पिक में अच्छा करेंगे, खिलाड़ियों का वही दुखड़ा और वही बहाने. शर्म यह देखकर आना चाहिए कि जमैका जैसा छोटा देश भी छ; स्वर्ण पदक जीतता है. हमारे देश में सबसे पहले पॉलिटिक्स उसके बाद नौकरशाही फिर भाई-भतीजा वाद और तदुपरांत कैरियर की चिंता, यह सब ऐसे नासूर हैं जो खिलाड़ियों को आगे बढ़ने नहीं देते. बेहतर यही है कि अपने आत्म-सम्मान को हर बार नीलाम करने के स्थान पर ओलम्पिक में भाग ही न लिया जाए.

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