एक पुरानी रचना आज फिर दोहरा रहा हूँ.

आओ वीर आतंकियो आओ
तुम्हारा स्वागत है इस धर्मनिरपेक्ष मुल्क में
हम तैयार हैं तुम्हारे स्वागत को हमारे बच्चे भी,
आओ तुम बम लगाओ हमारी जडें बहुत मजबूत हैं
हिलेंगी नहीं तब भी, जब हमारा अस्तित्व खत्म हो जायेगा,
तब भी कौमी तराने गूंजते रहेंगे चाहे उन्हें सुनने वाला कोई न हो
तुम हमारी पीढियों को तबाह कर सकते हो
क्योंकि तुम अल्प हो हम अपने बच्चों को आगे करते रहेंगे
तुम उनके सीने चाक करते रहना
क्योंकि तुम अल्प हो और
जो चीज बढ जाती है उसे खत्म होना ही होता है
इसलिये तुम बम लगाओ
हम तुम्हें सजा नहीं देंगे, खीर देंगे
खीर खाओ और इन्तजार करो
कि कब एक आई सी ८१४ उडे
और कब तुम्हें शाही मेहमान की तरह छोडा जाये
तुम हमारे उन बच्चों के सीने गोलियों से छलनी कर दो
जिन्हें हमने प्यार से पाला था बडे अरमानों से पोसा था
तुम बम लगा सकते हो हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे
क्योंकि हम वास्तविक धर्म निरपेक्ष हैं
हम इतिहास से भी सबक नहीं लेंगे
क्योंकि हम बहुल हैं, हम निरपेक्ष हैं
आओ तुम स्वतन्त्र हो कहीं भी बम लगाओ
ट्रेन में, पार्क में, पूजा स्थलों में, अदालतों में
लेकिन हम फिर भी चुप रहेंगे
तुम हमें सिरे से खत्म कर सकते हो
हमारी पीढियों को फना कर सकते हो
तुम कुछ भी कर सकते हो
लेकिन हम यूं ही रहेंगे
क्योंकि आत्मा अमर है और हमें अमरत्व से प्रेम है
इसलिये हे वीर आतंकियो हमें अमरत्व प्रदान करो
और फिर अगर सौ पचास रोज भी मर जायें तो क्या है
काफी तो फिर भी बाकी रहेंगे ही
और फिर उनके जाने से कुछ तो भला होगा ही,
जिन्दा रहे तो क्या कर पाये
मरकर एक लाख तो पाये
और फिर सौ पचास वोट ही तो कम हुये
पता नहीं उनमें से कितने सत्तों को मिलते
कितने विरोधियों को क्या पता इनमें कुछ साम्प्रदायिक भी होते
और कडी निन्दा कर तो दी है
सद्भाव बनाने की अपील भी कर दी है
फिर मौत को एक दिन तो आना ही था
शायद तुम्हारे बमों पर ही उनका नाम लिखा था
विधाता को भी यही स्वीकार था
इसलिये क्या फायदा मरे हुओं को रोने का
अपना चेहरा आंसुओं से भिगोने का
और उनमें कौन देश की धडकन था
कौन युवा ह्रदय सम्राट था
किस का बाप सांसद या मन्त्री था
एक का बाप तो सेना में सन्त्री था
एक अनाथ था
एक के घर में तीन ही वोट थे
इनके मरने से कौन सा पहाड टूट गया
कौन सा समझौता टूट गया
लोग तो मरते ही हैं, कुछ बीमारी से
कुछ जरूरत से ज्यादा तीमारदारी से
बेकारी से, बेरोजगारी से
सर्दी से, गरमी से, बाढ से, सूखे से
अकाल से, भूखे से
इनको लेकर क्या रोना
क्यों अपने नयन खोना
यह दुनिया है ही एक माया-भ्रम
इसलिये क्यों कुछ करें हम
बेकार ही में साम्प्रदायिक सद्भाव को ठेस पहुंचायें
हम बहुल हैं, उदारमना हैं, इसलिये सबकुछ चलेगा
हम क्यों अपने बी०पी० को बढाएं
बढाने को तो व्यापार है जिसके लिये हम तैयार हैं
हम सब कुछ बेच सकते हैं
अपने आप कोअपने बाप को
आओ हमें खरीदो तुम्हारा स्वागत है
हमने बेच दिया है अपना आत्म सम्मान
अपना स्वाभिमान, अपना ईमान
अपना धर्म, अपनी नीति
हम बेचने से पहले खुद को तौलते हैं
फिर अपनी कीमत बोलते हैं
जिसमें खाते हैं उसी में छेद करते हैं
जिस पर बैठते हैं उसी को काटते हैं
हम गलतियां दोहराते ही नहीं
उन्हें बहुगुणित भी कर डालते हैं
तुम्हें ऐसे लोग और कहां मिलेंगे
इसलिये आओ तुम्हारा स्वागत है।

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