एक था मोहन लाल शर्मा और एक था विक्रम बत्रा

दोनों की याद मुझे इसलिए आ गई क्योंकि जब मोहन लाल जी शहीद हुए थे तो एक-दो दिन मीडिया ने थोड़ा-बहुत दिखाया फिर भूल गई, यही हाल विक्रम बत्रा का किया था, कारगिल वार के दौरान आपने इस युवा सेनानी को देखा होगा, कभी क्लीन शेव तो कुछ दिन बाद दाढ़ी में, संभवत: आपने तोप के साथ खड़े हुए भी देखा होगा इस जांबाज सेनानी को, जिसे मालूम था कि पता नहीं सामने से आती कौन सी गोली उसके सीने में धंस जाए, कौन सा मोर्टार आकर उसके जिस्म के चीथड़े कर दे। उसके घर पर उसके माता-पिता भी इंतजार कर रहे होंगे कि कब युद्ध ख़त्म हो और कब उनके जिगर का टुकड़ा घर आए, उसकी पत्नी अपने सुहाग की वापसी का इंतजार कर रही होगी, कितना बड़ा कलेजा था उन लोगों का, जिन्होंने अपने प्रियजन को मौत के आगे भेज दिया। यही बात मोहन लाल जी के बारे में भी कही जा सकती है जो यह जानते हुए भी कि अन्दर आतंकवादी हैं जो गोली चलाने से पहले सांप्रदायिक सद्भाव और धर्म-निरपेक्षता नहीं निभाएंगे, उनका सामना करने पहुंचे और सीने पर तीन गोलियां खाकर गिर गए। यही बात कही जा सकती है उन जवानों के बारे में जिन्होंने संसद पर हमले के समय अपने जिस्म को नेताओं की ढ़ाल बनाकर पेश कर दिया। टी आर पी के लिए कुछ दिनों तक तो मीडिया ने इनके बारे में कुछ बाईट दी उसके बाद भुला दिया। हमारे देश का आम आदमी तो वैसे ही चीजों को याद रखना नहीं चाहता न ही कुछ विचार करना चाहता है, क्योंकि याद करेगा तो विचार करेगा और विचार करेगा तो कुछ करने की इच्छा प्रकट होगी और कुछ करने के लिए आराम त्यागना पड़ेगा, इसलिए कुछ याद ही मत करो जो जैसे चल रहा है उसे वैसे ही चलने दो यही सबसे अच्छा फार्मूला है। बात मैं कर रहा था इन शहीदों की जिन्होंने अपनी जान विभिन्न युद्धों और आतंकवादियों से लड़ने में न्योछावर कर दी । चीन और पाकिस्तान के गले में बाँहें डालना, आतंकवादियों के प्रति नरमी बरतना, जामिया के कुलपति का बयान और ऊपर से अर्जुन सिंह का समर्थन क्या शहीदों का अपमान नहीं है? सेना/अर्द्धसैनिक बलों में लोग मात्र तनख्वाह के लिए नौकरी नहीं करते हैं, वे देश के गौरव को बनाये रखने के लिए अपने शीश दांव पर लगा देते हैं और उनके शीशों की यह बेकदरी , संभवत: मोहन लाल शर्मा को यह अहसास भी नहीं होगा कि जिन आतंकवादियों ने उनके सीने को छलनी कर दिया हैं उनके साथियों की पैरोकारी के लिए जामिया के कुलपति और उनके समर्थन में अर्जुन सिंह जैसे लोग खड़े हो जायेंगे, ऐसा न हो कि आगे चलकर लोगों को यह लगने लगे कि आतंकवादी बनने में अधिक लाभ है और देश के लिए शीश कटाना घाटे का सौदा। एक मजाक और - आतंकवादियों के एक सहयोगी पर किस जुर्म के लिए अभियोग पंजीकृत होगा- फर्जी दस्तावेज बनाने का और ग़लत जानकारी देने का। वोटों के पीछे दीवाने हुए इन मतिमंदों को यह भी दिखायी नहीं देता कि इंग्लॅण्ड में भी आतंकवादियों से निपटने के लिए नए क़ानून बनाये गए तथा अनेक यूरोपीय देशों में आतंकवाद विरोधी नए प्रावधान जोड़े गए. मुझे हँसी आती है इनके कुतर्क पर कि पोटा होते हुए संसद पर हमला हुआ, अरे मतिमंदों ३०२ होते हुए खून हो जाते हैं, पुलिस होते हुए चोरी हो जाती है, नेताओं के होते हुए गरीब और गरीबी दोनों बचे हुए हैं, फौज होते हुए ५ बार आक्रमण हुआ, अस्पतालों के होते हुए लोग मरते हैं, कालेज होते हुए लोग निरक्षर हैं, तथा और भी ऐसे ही तमाम उदाहरण हैं तो फिर इन सभी संस्थाओं को ख़त्म क्यों नहीं कर दिया गया. बात सिर्फ़ इतनी सी है कि जनता भूखी है, जिस दिन उसके पेट को भरपेट रोटी मिल गई और उसे अपने पेट से हटकर कुछ सोचने का समय मिल गया उसी दिन सत्ता-लोलुप नेताओं को धूल में मिला देगी, मेरी यही कामना है कि वह दिन जल्दी आए और भेड़ की खाल ओढे इन मतिमंदों को इनके उचित स्थान पहुँचा दे.

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