अपनी ऐयाशी की कहानी.
अपनी ऐयाशी की कहानी बयान कर रहा हूँ। जी हाँ, एक ऐयाशी मैंने भी की, पिछले साल अगस्त में। मेरे पिताजी एक अध्यापक हैं, इस वर्ष वह सेवानिवृत्त हो गए हैं। पिछले दो-तीन वर्षों से मैं एक कार लेने की सोच रहा था, कई दफा भीड़ - भाड़ से तंग आकर मैंने बाहर जाने के कई प्रोग्राम रद्द कर दिए। इनमें से दो-तीन मेरी ससुराल जाने के भी थे, हालाँकि मेरी ससुराल मेरे शहर से लगभग तीन घंटे की दूरी पर है, लेकिन कई बार जब मैंने ससुराल जाने के लिए मना कर दिया तो मेरी धर्मपत्नी काफी कुंठित हो गयीं। एक-दो बार झगड़े की भी नौबत आ गई, अत: पिताजी ने कार लेने के लिए कुछ पैसा अपने पास से दे दिया और बाकी का बैंक से फाइनेंस करा दिया। अंततोगत्वा घर पर कार आ गई, नई कार थी, शौकिया खूब चलाई गई। कुछ दिनों बड़ा उत्साह रहा, कार पर बैठ कर कुछ और दिखाई ही नहीं देता था। थोड़े दिनों बाद जब कार का नशा उतरा और आंखों ने इधर-उधर भी देखना शुरू किया तब जो दृश्य दिखाई दिए उन्हें देखकर मुझे ऐसा लगने लगा कि कार खरीद कर मैंने ऐयाशी की है। टैम्पो में जिसमें ६ सवारियां ही बैठनी चाहिए, उसमें चौदह सवारी भरी हैं, जीप जिसकी क्षमता आठ या दस सवारियों की है उसमें अठारह से बीस सवारियां बैठी हैं, लोग पायेदान पर खड़े हैं, गड्ढे भरी सड़कों पर अपनी जान हथेली पर लेकर इसलिए लटक कर जा रहे हैं कि दिनभर हाड़तोड़ मेहनत कर जो सौ रुपये उन्होंने कमाए हैं उसमें से उन्हें अपने परिवार को पालना है, अपना और अपने परिवार का पेट भरना है, उसी में कपड़े सिलवाने हैं, उसी सौ रुपये में से दवाई का खर्चा निकलना है, उसी में बच्चों के खिलौने, उनकी आशाएं पूरी करनी हैं, उसी सौ रुपये से मेहमानों को निभाना है, उसी सौ रुपये में से शादी-ब्याह के खर्चे भी पूरे करने हैं। बस या ट्रेन से जायेगा तो उसके खून से कमाए हुए रुपयों का एक-तिहाई हिस्सा तो उस किराये में निकल जायेगा, इसलिए वह व्यक्ति अपनी जान की परवाह न कर जीप पर लटकते हुए जाता है कि जीप पर जाने में पाँच रुपये खर्चा आएगा और बस से पन्द्रह रुपये। अक्सर जीपों के दुर्घटना ग्रस्त होने की खबरें अखबार में एक कालम की ख़बर के रूप में छपती रहती हैं, पुलिस, प्रशासन और परिवहन विभाग के अधिकारियों के बयान छप जाते हैं कि अब कडाई बरती जायेगी, कुछ दिनों तक कुछ जीपों और टैम्पो के चालान कर दिए जाते हैं, फिर जेबें भरनी शुरू हो जाती हैं, फिर थानों के आगे से भरी जीपें गुजरने लगती हैं, फिर दुर्घटनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाते हैं, फिर जीपें, टैम्पो, ओवरलोडेड ट्रक वैसे ही दौड़ने लगते हैं, फिर लोग अपनी जान हथेली पर लिए जीप के पायेदान पर लटक कर मजदूरी की तलाश में निकल पड़ते हैं, क्योंकि सस्ता यातायात मुहैया करना सरकार के बस की बात है ही नहीं, जिनके वोटों से सरकार बनती है, उनके लिए सरकारें नहीं बना करतीं। इस देश में जहाँ दस रुपये बचाने के लिए जान हथेली पर रखना मजबूरी है वहां मुझे कार में बैठ कर घूमना ऐयाशी लगता है, मुझे अपराधबोध सा महसूस होने लगता है।
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