इस सब के लिए कोई भी मुस्लिम दोषी नहीं है, दोषी हैं तो स्वयं हिन्दू समाज के पथभ्रष्ट लोग.
भारत में फिर बम धमाके हुए, लगभग पच्चीस लोग मारे गए और सौ के आसपास घायल हुए, एक बार फिर वही नौटंकी हुई, पूरे देश में सारे रंगों के एलर्ट कर दिए गए, पुलिस को मुस्तैद कर दिया गया, खुफिया को और चौकन्ना कर दिया गया, कुछ जगहों की सुरक्षा और बढ़ा दी गई. मरने वालों और घायलों की कीमत अदा कर दी गई. मीडिया ने फिर हौसला अफजाई करने का राग अलापना शुरू कर दिया कि दिल्ली वालों की हिम्मत नहीं टूटी है आज फिर काम पर निकले हैं, दिन भर मेहनत करने पेट पालने वाला आदमी अगर काम पर नहीं आएगा तो खायेगा क्या, क्या यह टेलिविज़न वाले उनके घर खाना पहुंचाएंगे, आज तक जितने लोग बम धमाकों में मारे गए हैं, उस विस्फोट वाले दिन के बाद कितने नेता और कितने मीडिया वाले दोबारा उनके घर गए? उससे पूछो जिनके घर के चिराग बुझ गए, किसी का बाप, किसी का बेटा, किसी की माँ, किसी की बहन, किसी का पति मारा गया, उनसे पूछो, टेलीविजन पर बोलने में कुछ नहीं जाता. उनसे पूछो जिनके घर तबाह हो गए हैं, क्या ये नेता, ये मीडिया वाले उनके प्रियजनों को वापस ला सकते हैं? एक बार फिर वही दोहराया प्रधानमंत्री महोदय ने कि संयम बनाये रखें, दोषियों को सजा दी जायेगी. पहली बात उन्हें पकड़ ही नहीं पायेंगे, क्योंकि वे अल्पसंख्यक हैं उन्हें पकड़ा जायेगा तो वोट बैंक खिसकेगा, दूसरी बात कि आतंकवादी विरोधी क़ानून है ही नहीं, अलग-अलग धाराओं में मुकदमा चलाया जाता है जिसमें लंबा समय लगता है, और अगर फिर किसी को फांसी हो भी गई तो एक बार फिर उसे खीर खिलाई जाती रहेगी. प्रधानमंत्री जी फिर दोहरा रहे हैं और मुस्लिम नेता, धर्म गुरु और हमारे धर्म-निरपेक्ष नेता फिर दोहराएंगे कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता, जो खून बहा रहे हैं उनका कोई वास्ता इस्लाम से नहीं हैं. लेकिन सच्चाई यह हैं कि विस्फोट किस धर्म के लोग कर रहे हैं, ईमेल किस धर्म के लोग कर रहे हैं, उनका निशाना कौन लोग हैं, क्यों हैं, उनकी मदद किस धर्म के लोग कर रहे हैं, उनकी ईमेल में किस धर्म के पक्ष में और किस का संहार करने के लिए कर रहे हैं. तीस्ता सीतल-वाड़, इमाम बुखारी अबू बशर के यहाँ क्यों जाते हैं. जावेद अख्तर और सीतल-वाड़ सहित अन्य धर्म-निरपेक्ष लोगों को गुजरात दंगे ही क्यों याद आते हैं, इन बम विस्फोटों के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ और उनके मददगारों के खिलाफ क्यों फतवे जारी नहीं होते? अगर किसी को दिखाई न दे रहा हो तो बात अलग हैं लेकिन यह सब हिन्दुओं के प्रति घोर असहनशीलता और यदि कहा जाए तो जीनो-साइड जैसी परिस्थितियों का निर्माण किया जा रहा है. कहना ग़लत न होगा कि जो कार्य मुगलों की तलवारें नहीं कर पायीं उसे वोट-बैंक की राजनीति ने कर दिया. और दोष इसमें मुस्लिमों का कतई नहीं बल्कि हिन्दुओं का है, हिन्दुओं के धर्म-गुरुओं के पास इतनी भी फुरसत नहीं कि वे विस्फोटों की निंदा करें, इसमे मारे गए लोगों के पास जाएँ और आम जनता का आवाहन करें कि जो उनका ख्याल नहीं रख सकते उनको दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकें, जबकि दूसरी और मुस्लिम धर्म-गुरु वोट देने के लिए भी फतवा जारी करते हैं कि कौन सी पार्टी उनके हित की बात कर रही है और किस पार्टी को वोट देना है। जो धर्म-निरपेक्षता की बात करके केवल मुस्लिम हितों की बात कर उनके वोट बटोरने का दुस्साहस इसलिए कर पाते हैं कि वे जानते हैं कि हिन्दू आपस में विभक्त हैं उन्हें और विभाजित कर दो और फिर तब हिन्दू कहीं न कहीं तो इस विभाजन पर वोट करेगा ही, इस अवधारणा को धूल में मिलाने के लिए ख़ुद हिन्दू समाज को आगे आना पड़ेगा, उन्हें दिखाना पड़ेगा कि यदि वोटों के लिए हमें दूसरे दर्जे का नागरिक बनोगे तो हम तुम्हारी सियासत धूल में मिला देंगे, तभी भविष्य सुरक्षित है, अन्यथा ये लीडर ख़ुद मौज करते रहेंगे और जनता मरती रहेगी. बात मैं यह कह रहा था कि मुस्लिम इसके लिए दोषी नहीं हैं, जब हिन्दू समुदाय के लोग ही सत्ता पर काबिज रहे हैं और एक तरह से वे लोग स्वयम ही वोटों के लिए सही ग़लत कुछ नहीं देख रहे तो इसके लिए दूसरे समुदाय के लोग कतई दोषी नहीं हैं. इसके liye दोषी हैं वे लोग जो आज यह मान कर चल रहे हैं कि वे हमेशा दूसरों को बेवकूफ बनाते रहेंगे वे बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं. यदि एक बार सत्ता का केंद्रबिंदु इन तालिबानी रवैये के लोगों के हाथ पंहुच गया तो फिर इन धर्म-निरपेक्षी लोगों को भी भारत में रहने को भी स्थान नहीं मिलेगा, सत्ता की तो बात छोडिये. इसलिए समस्त समाज से आवाहन है कि अपना कर्तव्य समझें और ठीक तरह से निभाएं, अगर भगत सिंह जी ने शीश न चढाया होता तो आज हमारे शीश तने न होते. अगर आज नहीं चेतेंगे तो कोसने के लिए भी पीढियां नहीं बचेंगी. इसलिए अपने बीच के जयचंदों को पहचाने और उन्हें उनकी सही जगह पहुंचाएं. वैसे इसे अगर किसी राजनीतिक दुराग्रह की दृष्टि से न देखा जाए तो यह कहना बिल्कुल उचित होगा कि आज की तारीख में इस देश को नरेन्द्र मोदी जैसे धर्म-निरपेक्ष व्यक्ति की आवश्यकता है न कि तथा-कथित धर्म-निरपेक्षिओं की जो कहते कुछ हैं करते कुछ हैं, होने को धर्म-निरपेक्ष हैं लेकिन प्रो-इस्लामिक हैं। मैं यह बिल्कुल नहीं कहता कि मुस्लिमों के साथ समानता का व्यवहार न किया जाए, लेकिन समानता का न कि किसी वोटों के कारण से विशेष व्यवहार। मैं फिर वही दोहराता हूँ कि हर बच्चे का धर्म उसके माँ-बाप पर निर्भर होता है और किसी भी बच्चे के पास यह विकल्प नहीं होता कि वह किस के घर में पैदा हो। दूसरा यह कि मरने के बाद लोग यह बताने नहीं आते कि उन्हें भगवान मिले या खुदा। तीसरा यह कि धर्म के आधार पर सब लोग बन्दूक लेकर निकल पड़े तो इस दुनिया में जीवन बचेगा ही नहीं, इसलिए ऐसे व्यक्तियों का अविलम्ब सफाया ही एक मात्र उचित कदम है।
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