फिर आया चुनाव का मौसम
चुनाव का मौसम सर पर है, फिर नेता बरसाती मेंढकों की तरह टर-टराने लगेंगे. फिर सावन-भादों की वर्षा की तरह चारों तरफ़ से घोषणाओं, वादों और मैनिफेस्टो की बारिश होने लगेगी. कुछ घोषणाएं अमर हो चुकी हैं जिनमें गरीबी हटाओ, बेरोजगारी का उन्मूलन, भ्रष्टाचार का समूल नाश, सांप्रदायिक ताकतों पर लगाम, आर्थिक सम्पन्नता, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने जैसी अनादिकाल से चली आ रही घोषणाएं शामिल होंगी. नेताओं को इंसान अब इंसान नजर नहीं आयेंगे, बल्कि वोट नजर आयेंगे. किसी की शक्ल में पंजा तो कोई कमल का फूल, कोई साइकिल तो किसी नेता की आंखों के सामने इंसान हाथी की सूरत में भी नजर आएगा. कुछ दिनों तक अब बड़े से बड़ा दबंग आदमी भी कलुवा को चाचा कहकर पाँव छूता दिखाई देगा, हर घर में कोई न कोई रिश्तेदार बन जायेगा। चाचा, चाची, ताऊ, ताई, मामा, मामी, भइया, भाभी, बुआ, फूफा, भतीजा, भतीजी, जीजा, जीजी न जाने कितने नए रिश्तेदार पैदा हो जायेंगे (अब यह बात और है कि इस तरह की रिश्तेदारियों में कोई पत्नी जैसा रिश्ता निभाना पसंद नहीं करेगा, अन्यथा नेताजी न जाने कितने रिश्ते बना लें) । हर वह आदमी जिसे उनकी गाड़ी के सामने आ जाने पर उनके ड्राईवर ने उसकी माँ-बहन के साथ रिश्ता जोड़ा होगा, अब उनके लिए ख़ास होगा। अब नेताजी की आंखों में एक विनम्र सा भाव हर समय दिखाई देता रहेगा। हर मर्ज का इलाज मिलेगा नेताजी के पास, उनके झोले में हर दर्द की दवा मिलेगी। सिर्फ़ पाँच साल का सवाल होगा उनकी आखों में, कितनी कातर दृष्टि से निहार रहे होंगे. वे अब हर समय उपलब्ध भी रहेंगे, साथ में यह भी कहेंगे कि क्या बताएं हम तो यह चाहते हैं कि हमेशा आप लोगों के साथ रहें लेकिन लखनऊ-दिल्ली की दौड़ के चक्कर में यह सब नहीं हो पाता, जिसके लिए आप से माफी चाहते हैं। अब उनका घर आप लोगों के लिए सार्वजनिक स्थल की तरह उपलब्ध रहेगा, कभी भी जाइए, चाय-नाश्ता-खाना खाइए और अगर इच्छा करे तो शाम को दो घूँट भी लगा सकते हैं। थोड़े दिनों तक नेता जी की मुद्रा कुछ अजीब सी दिखाई देगी, आखों में एक बेचारगी सी, दोनों हाथ आपस में जुड़े हुए, मुख पर कोल-गेट टाइप सी मुस्कान। इंतजार कीजिए कि कब आप के द्वारे आते हैं, नेता जी।
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