केवल राज ठाकरे के ही दुष्कर्मों को लेकर इतना हो-हल्ला क्यों, बाकियों को क्यों बख्शा जा रहा है?

जो राज ठाकरे आज महाराष्ट्र में कर रहे हैं, वह कभी पहाड़ पर भी हो चुका है, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में मैदानी इलाकों से जाने वाले लोगों को वहां के लोग खूब सताया करते थे। कई लोग अपनी नौकरियां छोड़कर वापस मैदानी इलाकों में अपने घर पर आ गए। दक्षिण भारत में भी हिन्दी विरोध पर खूब हल्ला-गुल्ला किया गया, सत्तर के दशक के अंत में हिन्दी विरोधी आन्दोलन जब चरम पर था, वहां भी हिन्दी भाषियों को खूब परेशान किया गया। बहुत से राज्यों में उस राज्य के बाहर के लोग न तो राज्य की सेवाओं के लिए चयनित किए जा सकते हैं न ही संपत्तियां खरीद सकते हैं। जम्मू-कश्मीर का उदाहरण प्रत्यक्ष है। केंद्रीय सेवाओं के लिए यह नियम लागू नहीं होता। वैसे यहाँ पर एक सुझाव देना चाहूँगा कि सभी नियुक्तियां चाहे वह केन्द्र की हों या राज्य सरकारों की, केवल संघ लोक सेवा आयोग तथा कर्मचारी चयन आयोग के ही माध्यम से होना चाहिए, इससे लाभ यह है कि अच्छे अभ्यर्थी मिलेंगे, साफ़ - सुथरी भर्ती प्रक्रिया होगी, तथा कई ऐसे योग्य अभ्यर्थी जो अन्य राज्यों की सेवाओं में नहीं बैठ पाते हैं उन्हें अन्य राज्यों की सेवाओं में भर्ती होने का मौका मिलेगा। बात चल रही थी राज ठाकरे की, मार-पिटाई और गुंडागर्दी किसी की भी हो, सहन नहीं की जानी चाहिए, लेकिन इसके साथ यह भी देखना पड़ेगा कि वोट बैंक की राजनीति केवल राज ठाकरे ही नहीं, अन्य नेता भी कर रहे हैं, इनकी राजनीति भी इतनी ही ओछी है जितनी कि राज ठाकरे की केवल रूप बदल गया है, एक तरफ सिमी का नाम आतंकवादी घटनाओं में लिप्त होने के कारण इसे एक्वेट करने के लिए एक तरफ मोहन लाल शर्मा की शहादत पर सवाल उठाये जा रहे हैं तथा बजरंग दल या विहिप इत्यादि संस्थाओं को फंसाने की कोशिश की जा रही है. मुस्लिम वोट बैंक के लिए संविधान तक में संशोधन किया जा चुका है (देखें शाहबानो केस) . रही बात हिंसा की तो मोहम्मद साहब के कार्टून छापने की घटना डेनमार्क में हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भारत में खूब तोड़-फोड़ की. लेकिन इसका अर्थ यह कतई न लगाया जाए कि राज ठाकरे की मनसे द्वारा की जा रही हिंसा का समर्थन किया जा रहा है, बल्कि मेरे कहने का उद्देश्य यह है कि यह घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि यहाँ की पुलिस व प्रशासन सही-ग़लत का निर्णय क़ानून के आधार पर न कर बल्कि राजनीतिक आकाओं के इशारे पर करता है. । मुस्लिम वोट बैंक और नोट काण्ड को पूरे देश ने देखा है, यह भी इस मार-पिटाई की राजनीति का ही एक दूसरा रूप है, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वोटों के लिए लोग कितना नीचे गिर सकते हैं, यह मुंबई और दिल्ली की घटनाओं से स्पष्ट हो जाता है।

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