सड़क पर चलते समय मुझे बड़ी कोफ्त होती है,

सड़क पर चलते समय मुझे बड़ी कोफ्त होती है, अधिकतर लोग इस काबिल होते ही नहीं कि उन्हें सड़क पर चलने देना चाहिए। ऐसे लोग चाहे वह पैदल हों या सवारी पर, हमेशा दूसरों के लिए परेशानी का सबब बनते हैं। शायद यही कारण है कि हर वर्ष हजारों लोग सड़क दुर्घटनाओं में मर जाते हैं। दुपहिये पर दो की जगह तीन सवारी, ऑटो में चार की जगह आठ, सड़कों पर चलने वाली जीपों में आठ की जगह अठारह सवारियां आम देखी जा सकती हैं। इन वाहनों की हालत देखकर ही यह कहा जा सकता है कि यह वाहन सड़क पर दौड़ने लायक नहीं हैं, लेकिन लाइसेंस देने वाले अधिकारियों को यह दिखाई नहीं देता। जहरीला काला धुआं उगलते यह वाहन दूर से ही अलग दिखाई देते हैं, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण वालों को भी यह नहीं दीखते। अधिकांश वाहनों के चालक इस काबिल होते ही नहीं कि उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस दिया जाए, लेकिन यहाँ की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि अंधे का भी लाइसेंस बन सकता है और इसीलिए जब भारत का कोई व्यक्ति विदेश जाकर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना चाहता है तो उसे बड़ी परेशानी महसूस होती है। हमारे यहाँ ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया बड़ी सरल है, परिवहन कार्यालय जायें, बाहर बैठे दलाल से मिलें, उसे फीस दें, अन्दर जाएँ, अपना नंबर आने पर आपको अधिकारी एक बार देखेगा और एक - दो स्थान पर हस्ताक्षर कराएगा, बस लाइसेंस बनने की प्रक्रिया पूरी हो गई, दो-तीन दिन बाद लाइसेंस ले लीजिये। सड़क पर चलने वाले कितने लोग हैं जिन्हें सड़क पर चलने के मामूली नियमों की जानकारी होती है, जिन्हें होती भी है वे भी औरों को देखकर सुधर जाते हैं। हर आदमी जल्दी में है, किसी को भी सबर है ही नहीं, पाँच मिनट की जल्दी के लिए अपनी जान दांव पर लगा देता है, राजमार्गों पर देखिये किस बेतरतीबी से लोग ओवर-टेक करते हैं, ट्रक वाले सड़क से हटना बिल्कुल पसंद नहीं करते तो सरकारी बस वाले रांग साइड पर ले जाकर ओवर-टेक करते हैं। जीपों वाले ड्राइविंग सीट के चौथाई हिस्से पर बैठ कर क्या खूबसूरती से स्टेयरिंग व्हील को मोड़ते हैं, देखते ही बनता है। कम-उम्र के लड़के और महँगी गाड़ियों में बैठे नव-धनाड्य व्यक्ति कम रफ्तार पर चलना अपना अपमान समझते हैं और दूसरी गाड़ियों को हेय लेकिन से देखते हुए ओवर-टेक करने में अपनी शान। लाल, नीली बत्ती लगी हुई गाड़ियों वाले और झंडा लगी हुई गाड़ियों के चालक तो पूरी सड़क को अपना समझते हैं। पुलिस वाले, चाहे वह वर्दी में हों या बिना वर्दी के, वे भी नियमों की धज्जियाँ उड़ाने में पीछे नहीं रहते। यह तमाम के तमाम लोग यह चाहते हैं कि जब वे गुजरें तो सड़कें खाली हो जाया करें। सडकों पर चलते समय कई प्रकार का दुर्व्यवहार होता है, कई बार आप अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का प्रतिकार तथा प्रतिरोध चाहकर भी नहीं कर पाते। जिन लोगों को इस व्यवस्था को ठीक रखने की जिम्मेदारी दी गई है, वे लोग अपनी शक्तिओं का प्रयोग अपने निजी हित में करते हैं। एक तो वैसे ही पुलिस की संख्या कम है, ऊपर से कोई भी इन सब चीजों को मामूली बताकर इनसे निपटाना ही नही चाहता। हमारे यहाँ की न्यायिक प्रक्रिया धीमी है तथा इस प्रक्रिया में इतनी बाधाएं हैं या खड़ी कर दी जाती हैं कि आम आदमी इन सब पचडों से दूर ही रहना चाहता है. अदालत, गवाही के चक्कर में कोई पड़ना ही नहीं चाहता, गवाहों के साथ क्या क्या हो सकता है, अजय कटारा के प्रकरण से स्पष्ट है. चूँकि दिल्ली राजधानी है, इसलिए ब्लू-लाइन बसों के कहर की कहानी न्यूज़-चैनलों पर दिखाई देती है, लेकिन ऐसी न जाने कितनी ब्लू-लाइन देश के कोने-कोने में हजारों जिंदगियां लील जाती हैं जिनकी ख़बर तक नहीं लगती। जब किसी बड़े आदमी से दुर्घटना हो जाती है तो वह अपने ड्राईवर को सरेंडर करा देता है. कुछ केस पहले ही कमजोर कर दिया जाते हैं, गवाह मिलते नहीं. मामले ऐसे ही छोट जाते हैं. क़ानून की किसी को परवाह है ही नहीं, बल्कि लोग अब अपनी दुश्मनी निकालने के लिए क़ानून का सहारा लेने लगे हैं और धमकी देने के अंदाज में कहते हैं कि कचहरी में देख लेंगे. लेकिन दूसरी तरफ़ जब यही लोग विदेश जाते हैं तो पूरी तरह से क़ानून का पालन करने लगते हैं। इससे मैंने यह निष्कर्ष निकले हैं कि १-यहाँ का व्यक्ति (अपवाद छोड़ दें तो) प्रार्थना की जगह ताड़ना में अधिक विश्वास रखता है. २- स्व-अनुशासित नहीं है. ३-विदेशों के कर्मचारी अपने कानूनों का पालन पूर्ण-रूपेण करते हैं. ४- उनपर किसी तरह का दवाब काम नहीं करता. ५-विदेशों में कानूनी पेचीदगियां इतनी ज्यादा नहीं हैं तथा गतिशीलता है. (विदेशों का तात्पर्य कुछ एशियाई व अफ्रीकी देशों को छोड़कर है) . अभी बस इतना ही, बाकी फिर कभी.

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