भिवानी पुलिस ने कुलदीप की हत्या कर दी

भिवानी पुलिस ने कुलदीप की हत्या कर दी। सोच समझ कर, बेरहमी के साथ, शराब और वर्दी के नशे में धुत होकर। मामले को रफा-दफा करने के अंदाज में पुलिस ने पहले बयान दिया कि सड़क ख़राब थी, गोली इसलिए चल गई, ताज्जुब है कि किसी पुलिस वाले को न लग कुलदीप के सर में लगी। फिर कहा कि Mistaken Identity के कारण ऐसा हो गया। बाद में एक पुलिसवाले को गिरफ्तार करना दिखा दिया। लगभग रोज ही पुलिसवालों की बेरहमी के किस्से मीडिया में दिखाई देते हैं। चौराहे के सिपाही से लेकर बड़े अधिकारियों सबका हाल मालूम ही है। लगभग हजारों की संख्या में लोग रोजाना पुलिस द्वारा प्रताड़ित किए जाते हैं जिनमें से अधिकाँश मामलों की ख़बर ही नहीं लग पाती। उत्तर प्रदेश की एक घटना २००७ में सभी चैनलों पर दिखाई गई थी जिसमें एक अभियुक्त को भागकर पीछे से गोली मार दी गई थी। अगर पुलिस ही न्यायपालिका का काम करने में समर्थ है तो न्यायपालिका की आवश्यकता है ही नहीं। पुलिस भी उन्हीं को मार गिरा पाती है जिनमें से अधिकतर निरीह होते हैं। समर्थ गुंडे और बदमाशों के ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं कर पाते यह वीर पुलिस वाले। उनके माननीय बन जाने के बाद सैल्यूट अवश्य मारते दिखाई दे जाते हैं। और अगर वास्तव में गुंडे-बदमाशों की फर्जी मुठभेड़ भी करे तब भी कोई दिक्कत की बात नहीं, लेकिन एक निहत्थे लड़के को शराब के नशे में धुत होकर गोली मारना कहाँ की बहादुरी है। उसके बाद ऐसे हत्यारों को एक आम अपराधी की तरह सलूक करने के स्थान पर आव-भगत करना कहाँ तक जायज है। पुलिसिया बहादुरी लगभग रोज ही दिखाई देती है, बस बिल्ला बदल जाता है, बाकी निर्दोषों पर चलती हुई लाठी-गोली वही रहती हैं। एक आम आदमी किसी को मार दे, सजा फांसी, अगर पुलिस को साध ले, थोडी बहुत सजा या कुछ नहीं, लेकिन पुलिस वाला point blank range से मार दे, तो कुछ नहीं, साथ में अगर उसे चोर-डाकू सिद्ध कर दे तो मैडल पक्का। सिर्फ़ निजाम बदला है, पुलिस की कैफियत नहीं। लोकतंत्र की परिभाषा घोटते रहिये - प्रजा का, प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए शासन, लेकिन आज भी पुलिस वही है, पुलिस वालों की रगों में वही अंग्रेजी निजाम का खून दौड़ रहा है। बस, इनसे बचकर निकलना सीख लीजिये, वरना आज कुलदीप कल कहीं आप का बच्चा इन की खूनी प्यास का शिकार न हो जाए।

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