आर्थिक मंदी से बेहाल दुनिया
आर्थिक मंदी से दुनिया बेहाल है, शेयर मार्केट धड़ाम हो चुके हैं। लोग आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या करने जैसे दुर्भाग्यपूर्ण कदम भी उठा रहे हैं। मेरा भी कुछ रुपया म्युचुअल फंडों में लगा हुआ था जो आज की तारीख में घटकर तिहाई रह गया है।
मेरे पड़ोस में रहने वाला जयप्रकाश जो मोची का काम करता है, उसने मुझसे एक सवाल किया जोकि उसी के शब्दों में लिख रहा हूँ - "भाई साहब, अखबार में रोज आ रहा है कि दुनिया में मंदी आ रही है, कंपनियों के शेयर रोज गिर रहे हैं, लेकिन महंगाई वहीं के वहीं। न तेल - साबुन के दाम कम हुए, न आटा-चावल के, बसों-टेंपो के किराये जो बढ़ जाते हैं कभी कम नहीं होते। मंदी बहुत है लेकिन मकान सस्ते नहीं हुए, न जमीनों के दाम कम हुए, न लोहे सीमेंट के। सब्जियों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि घर का खर्च कैसे चलता है, हम ही जानते हैं। स्कूल की फीसें कम नहीं हुईं, कापी-किताबों के दाम कम नहीं हुए, जूते-कपड़े भी उतने ही महंगे हैं। और तो और सरकारी नौकरों के लिए पे-कमीशन आने के बाद डाक्टरों ने भी फीस ड्योढी कर दी है। फिर कहाँ मंदी आई है और किसके लिए मंदी आई है।"
प्रश्न बहुत गंभीर था तथा मेरी बुद्धि से परे भी क्योंकि मैं कभी भी अर्थशास्त्र या कामर्स का विद्यार्थी नहीं रहा, मैं भला इसका जवाब क्या देता, मैंने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर कर दी। लेकिन कुछ देर बाद विचारों के इसी आदान-प्रदान में जयप्रकाश ने कहा -"मुझे तो यह लगता है कि जो बड़े लोग दो रुपये की चीज बीस और तीस रुपये में बेचकर हर महीने करोड़ों रुपये का मुनाफा पैदा कर रहे थे, उनके मुनाफे में कमी आ गई है और यही मंदी है, अगर ऐसा न होता तो मंदी का असर घर की दाल-रोटी-सब्जी में दिखाई देता। "
मुझे भी मंदी-तेजी का यह चक्र और अवधारणा समझ में नहीं आती और मैं भी अपने आपको जयप्रकाश की तरह ही यह जानने में लाचार पाता हूँ। बस एक यक्ष प्रश्न सामने आ जाता है कि अड्डे पर बैठे एक सौ बीस रुपये दिहाड़ी पाने वाले एक मजदूर का घर कैसे चलता होगा।
मेरे पड़ोस में रहने वाला जयप्रकाश जो मोची का काम करता है, उसने मुझसे एक सवाल किया जोकि उसी के शब्दों में लिख रहा हूँ - "भाई साहब, अखबार में रोज आ रहा है कि दुनिया में मंदी आ रही है, कंपनियों के शेयर रोज गिर रहे हैं, लेकिन महंगाई वहीं के वहीं। न तेल - साबुन के दाम कम हुए, न आटा-चावल के, बसों-टेंपो के किराये जो बढ़ जाते हैं कभी कम नहीं होते। मंदी बहुत है लेकिन मकान सस्ते नहीं हुए, न जमीनों के दाम कम हुए, न लोहे सीमेंट के। सब्जियों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि घर का खर्च कैसे चलता है, हम ही जानते हैं। स्कूल की फीसें कम नहीं हुईं, कापी-किताबों के दाम कम नहीं हुए, जूते-कपड़े भी उतने ही महंगे हैं। और तो और सरकारी नौकरों के लिए पे-कमीशन आने के बाद डाक्टरों ने भी फीस ड्योढी कर दी है। फिर कहाँ मंदी आई है और किसके लिए मंदी आई है।"
प्रश्न बहुत गंभीर था तथा मेरी बुद्धि से परे भी क्योंकि मैं कभी भी अर्थशास्त्र या कामर्स का विद्यार्थी नहीं रहा, मैं भला इसका जवाब क्या देता, मैंने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर कर दी। लेकिन कुछ देर बाद विचारों के इसी आदान-प्रदान में जयप्रकाश ने कहा -"मुझे तो यह लगता है कि जो बड़े लोग दो रुपये की चीज बीस और तीस रुपये में बेचकर हर महीने करोड़ों रुपये का मुनाफा पैदा कर रहे थे, उनके मुनाफे में कमी आ गई है और यही मंदी है, अगर ऐसा न होता तो मंदी का असर घर की दाल-रोटी-सब्जी में दिखाई देता। "
मुझे भी मंदी-तेजी का यह चक्र और अवधारणा समझ में नहीं आती और मैं भी अपने आपको जयप्रकाश की तरह ही यह जानने में लाचार पाता हूँ। बस एक यक्ष प्रश्न सामने आ जाता है कि अड्डे पर बैठे एक सौ बीस रुपये दिहाड़ी पाने वाले एक मजदूर का घर कैसे चलता होगा।
बस एक यक्ष प्रश्न सामने आ जाता है कि अड्डे पर बैठे एक सौ बीस रुपये दिहाड़ी पाने वाले एक मजदूर का घर कैसे चलता होगा।
ReplyDelete" sach kha, ye jvab kise ke paass nahee hai na aapke pass na maire pass.....fir kaun daiga iska jvab...."
Regards
घनघोर मंदी है साहब, शाहरुख खान के एक विज्ञापन की शूटिंग का रेट 12 करोड़ से घटकर 9 करोड़ रह गया, सीधे-सीधे 3 करोड़ की मंदी… ये अलग बात है कि टीवी आर्टिस्ट बेचारे तनख्वाह बढ़वाने के लिये हड़तालें कर रहे हैं… ये तीन करोड़ उनमें ही बाँट दें तो कैसा रहे… जयप्रकाश जी से कहिये कि अमीर लोग आटा-दाल-चावल नहीं खाते, वे सिर्फ़ खून पीकर जिंदा रहते हैं…
ReplyDeleteBklkul sahi mudda
ReplyDeletesahi baat uthane ke ke liye sadhuwaad
एक सौ बीस रुपये दिहाड़ी पाने वाले एक मजदूर का घर तो फिर भी चल जाए , लेकिन उतना भी उन्हें कहां रोज मिलता है।
ReplyDeleteबहुत खूब आपने अपने विचारों को सुंदर तरीके से व्यक्त किया है जयप्रकाश का जवाव ही वास्तव में यथार्थ है
ReplyDeleteआपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है
सवाल बहुत वज़नी है और इस पर बात होनी चाहिए. मेरी समझ में मंदी वह है जब बाज़ार में ज़रूरत से ज़्यादा सामान हो और इस वजह से सेठ लोग उसकी कीमत को बहुत समय तक ज़बरन ऊंचा न रख सकें. दुःख की बात यह है की जयप्रकाश की पहुँच उन चीज़ों तक नहीं है.
ReplyDeleteबहुत सही सवाल उठाया है।
ReplyDelete