किस लिए चुनते हैं हम इन्हें.

पिता जी कहते थे कि एक रुपये में से सिर्फ पन्द्रह पैसे नीचे तक पहुंच पाते हैं, उनके सुपुत्र का कहना है कि यह राशि अब पांच पैसे तक पहुंच गयी है। कितना महान काम किया है, यह ज्ञान बाँट कर। पिछले साठ सालों में अधिकतर उन्हीं के दल का शासन रहा है। इस महान कृत्य के लिए देश उनका ऋण कैसे चुका पायेगा। दिल्ली वाली मैडम कहती हैं कि लड़कियां adventurous न बनें। लखनऊ वाली मैडम कहती हैं कि मुझे पता है थाने बिकते हैं, अब यह सब बंद करना होगा। ललुआ मोची वहीं का वहीं खड़ा है, जहाँ उसके बाप-दादा खड़े थे। घरेलू मोर्चे वाले छोटे मंत्री जी असम में होने वाले धमाकों पर कहत हैं कि असम में यह सब होता रहता है। बड़े मंत्री जी कहते हैं कि विस्फोट होना है यह तो मालूम था लेकिन कब और कहाँ होगा यह मालूम नहीं था।
आख़िर किस लिए चुनते हैं हम इन जन-प्रतिनिधियों को। प्रतिनिधि हैं, इसलिए प्रति व्यक्ति से इकट्ठी हुई निधि पर ऐश करने के लिए। जरा सोचिये। क्या आवश्यकता है हमें ऐसे जन प्रतिनिधियों की, केवल इसलिए कि हम इन्हें चुने, ये ऐयाशी करें हमारे पैसे पर, हमारे ऊपर लाठी-गोली चलवायें और हमारे ऊपर हमले होते रहें ये व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करने की जगह वोटों के लिए आखें मूँद कर बैठे रहें। इंडोनेशिया में तीन आतंकवादियों को कल मौत की सजा दे दी गई, वहां मात्र छ साल के अन्दर सब कुछ निपटा दिया गया, यहाँ १९९३ के बम-विस्फोटों के दोषियों को अभी तक सजा नहीं हो पायी है, जिसे जैसे तैसे फांसी की सजा हो पायी तो उसे सरकार दामाद बनाये बैठी है।
देखिये कुल मतदाताओं में से लगभग ५५ प्रतिशत मतदान करते हैं। इन ५५ प्रतिशत का बंटवारा लगभग चार बड़े प्रत्याशियों में होता है, जिसमें से जीतने वाले को २० बाकी तीनों को कुल मिलकर ३५ वोट मिलते हैं, ऐसे में कुल सौ वोटों में से बीस पाने वाला हमारा प्रतिनिधि बन जाता है। जनता की दिक्कत यह है कि वह इन धूर्त नेताओं की धूर्तता नहीं समझ पाती, अधिकाँश लोग वोट न करने के लिए कोई न कोई बहाना बना लेते हैं। जब कांटे बोयेंगे तो कांटे ही मिलेंगे न कि आम के स्वादिष्ट फल। जनता के सामने विकल्प कम हैं। पहले पार्टियाँ गुंडों-बदमाशों को टिकट देने में हिचकिचाती थीं, लेकिन अब तो डाकुओं को भी खुले-आम लोकसभा में पंहुचाया जा रहा है, ऐसे में देश की जनता को सौ प्रतिशत मतदान करना होगा। कमीजें तो सभी गन्दी हैं, लेकिन कौन सी कमीज कम गन्दी है, उस कमीज को धारण करना ही उचित होगा।
क्योंकि यदि ऐसे लोग ही चुनकर आते रहे तो वह दिन दूर नहीं जिस दिन संसद में ऐसा विधेयक पास हो जायेगा जिसमें यह प्रावधान होगा कि यदि एक बार कोई व्यक्ति ग्राम-पंचायत, जिला परिषद्, विधान सभा या संसद का सदस्य बन गया तो उस पर दायर सभी मुकदमें वापस ले लिए जायेंगे। चोरी-डकैती-हत्या-बलात्कार इत्यादि के अभियुक्तों की सजा एक निर्धारित राशि जमाकर माफ कर दी जायेगी। तस्करी के माल को छुडाने के लिए कुल माल का बीस-पच्चीस प्रतिशत सरकारी खजाने में जमा करना पड़ेगा।
हो सकता है आपको यह एक कल्पना लग रही हो अथवा हँसी आ रही हो इसे पढ़कर, लेकिन यदि ऐसे ही लोगों को चुनते रहे तो आने वाले दस-पन्द्रह सालों में यह कल्पना भी साकार हो जायेगी।

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