आज भी राष्ट्रीय शर्म का दिन है.

आज भी राष्ट्रीय शर्म का दिन है, कल एक छोटी सी ख़बर टेलीविजन पर थी कि जिस जर्मन शोधार्थी महिला ने अपनी नाबालिग पुत्री के गोवा के एक मंत्री महोदय के पुत्र द्वारा यौन शोषण की शिकायत दर्ज कराई थी, उस महिला ने अपना शिकायत यह कहते हुए वापस लेने की प्रार्थना की है कि वह अपने परिवार के शोषण के डर से अपना मामला वापस लेना चाहती है। छोटा सा स्क्रोलर दिखाकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने अपना औपचारिकता निभा ली, प्रिंट मीडिया ने भी ऐसे ही अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। पहले तो मंत्री पुत्र की गिरफ्तारी ही नहीं हो सकी, माननीय मंत्री जी अपने साथ बेटे को थाने में ले गए आत्म समर्पण कराने हेतु। पता नहीं कहाँ है महिला आयोग, बाल आयोग, मानवाधिकार आयोग, हमारे धर्म-निरपेक्ष नेता, हमारे स्वनाम धन्य समाज सेवी, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हमारे महान पत्रकार।
एक छोटी सी लड़की का यौन शोषण, उसके बाद उसकी पैरवी करने वाली उसकी माँ के लिए पैदा की जा रही दिक्कतें हमारे सभ्य समाज के मुहं पर तमाचा हैं। सनद रहे कि ऐसे ही लोग जब वोट मांगने आते हैं तो समाज को उसकी गरिमा, उसकी सुरक्षा का आश्वासन देते हैं और मौका पाते ही क़ानून की धज्जियाँ उडाने से नहीं चूकते। कम से कम अब उनकी पार्टी को तो शर्म आनी ही चाहिए, ये भेड़ की खाल में छुपे हुए वे भेड़िये हैं जो मौका मिलते ही किसी को भी नहीं बख्शेंगे।
मैं माननीय प्रधानमंत्री महोदय से पूछना चाहता हूँ कि क्या यह राष्ट्रीय शर्म है अथवा नहीं।

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