आज की कुछ खबरें और मेरा नजरिया

कल शहीदों के बारे में रौशन की एक पोस्ट पढ़ी, अच्छी लगी। एक पोस्ट और भी थी जो यह कह रही थी कि अगर यह धमाके ताज की जगह कहीं और हुए होते तो शायद इन पर इतना बवाल भी न होता। कल मुझे यह तथ्य या यह बातें उतनी अच्छी नहीं लग रही थीं। श्रीमान सुरेश चिपलूनकर जी ने भी एक अच्छी पोस्ट मीडिया के बारे में लिखी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी, लेकिन उस समय मुझे यह लग रहा था कि मीडिया ने इस घटना का लाइव टेलेकास्ट कर कम से कम लोगों के अन्दर एक आक्रोश तो पैदा करने का काम किया है।
लेकिन आज मुझे पूरी तरह सहमत होना पड़ा, इसलिए क्योंकि असम में एक गाड़ी में विस्फोट हुआ, दो-तीन लोग भी मारे गए, लेकिन हमारे वही तेज चैनल, जान हथेली पर खेलने वाले वही रिपोर्टर आज नदारद थे, क्योंकि इस विस्फोट को दिखाने से टी-आर-पी नहीं बढ़ती। मीडिया के पास बाकी पुलिसवालों के लिए बिल्कुल समय नहीं था, काश कि किसी शहीद सिपाही का भी हाल बयान किया होता । लेकिन मीडिया के इस रोल से कम से कम इतना लाभ तो हुआ ही है कि कल तक जो बेशर्म नेता अपने कहे बयानों से साफ मुकर जाते थे, उनके वह बयान तो पूरी दुनिया तक पहुँचते ही हैं। सहारा वालों का एक काम अच्छा लगा, वह था शहीद सुरक्षा कर्मियों के लिए की गई व्यवस्था, और भी अच्छा हो यदि सहारा वाले इस लोम-हर्षक काण्ड में शहीद सामान्य नागरिकों के लिए भी कुछ करें।
एक ख़बर और आ रही है कि केरल के मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर शहीद मेजर संदीप का घर न होता तो कुत्ता भी वहां न जाता, इस पर मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि कोई जरूरत नहीं हैं एक शहीद के यहाँ कुत्तों के जाने की।
एक ख़बर जिसके बारे में मैंने भाई श्री अनिल पुसदकर जी के ब्लॉग पर पढ़ा था कि अबू आजमी ताज के अन्दर गए और सउदी अधिकारियों को निकल लाये। आख़िर सउदी सरकार ने भारत सरकार को फोन करने की जगह अबू आजमी को क्यों फोन किया। फिर अबू को अन्दर किसने जाने दिया और किसकी अनुमति से। आख़िर आतंकियों ने किसकी बात मानकर उन्हें छोड़ा। और भारत / महाराष्ट्र सरकार का इस ख़बर/घटना के प्रति क्या रवैया है। मीडिया इस बात को क्यों हाई-लाईट नहीं कर रहा।
एक अन्य ख़बर है कि इजराइल सरकार ने इस घटना को उनके देश के विरुद्ध युद्ध जैसी घटना के रूप में लिया है, मेरा प्रश्न है कि भारत सरकार इस तरह के सख्त कदम क्यों नहीं उठा सकती। इसी प्रकार जब अमेरिकी खुफिया विभाग के अधिकारी जब यह कह रहे हैं कि उन्होंने ताज तक का नाम बताया था तो भारतीय खुफिया एजेंसियां क्या करती रहीं। क्षमा कीजियेगा, यह लगभग उसी तरह की लापरवाही है जैसे कि श्रीमान करकरे ने कंधार काण्ड के समय की थी (विस्फोट.काम पर उपलब्ध)। इस प्रकार की घोर आपराधिक लापरवाही किन लोगों ने की और उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई की जा रही है, सरकार को बताना चाहिए।
नैतिकता के नाम पर विलासराव देशमुख नौटंकी कर रहे हैं। जो मुख्यमंत्री वास्तव में त्यागपत्र देना चाहेगा वह राज्यपाल को त्यागपत्र भेजेगा अथवा पार्टी अध्यक्ष को। वैसे अगर नैतिकता की बात की जाए तो कठिनता से पाँच प्रतिशत सांसद-विधायक ही सदन में नजर आयेंगे।
निवेदन :-पिछली पोस्ट में मैंने धर्म-निरपेक्षता के बारे में जानकारी चाही थी वह मुझे अभी तक नहीं मिल सकी है, बाकी विश्व में धर्म-निरपेक्षता के बारे में जानना चाहा था यदि आप लोगों के पास जानकारी हो तो बताने की कृपा करें।


Comments

  1. politician are only getting publicity like heros in this episode
    narendra & kerala chief ministers are not really understanding the reality of this truth they are just belonging their own.
    the shahids thosoe were the real waarier are not supposed to be the games.......

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  2. केरल के मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर शहीद मेजर संदीप का घर न होता तो कुत्ता भी वहां न जाता, इस पर मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि कोई जरूरत नहीं हैं एक शहीद के यहाँ कुत्तों के जाने की।
    " well said, last line ..... perfactly suits to them"

    Regards

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  3. .....कोई जरूरत नहीं हैं एक शहीद के यहाँ कुत्तों के जाने की।

    गज़ब है दोस्त! ऐसा ही....

    पहली बार आया आपपे यहाँ और अब रोज़ आना पड़ेगा...लिखते रहिये..

    सप्रेम
    महेन्द्र

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  4. बिलकुल सही और सटीक प्रश्न किये है आपने...

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  5. क्यों कुत्तों को गरिया रहे हो, मित्र ? कुत्ता वफ़ादारी, नमकहलाली , व स्वामीभक्ति का प्रतीक है.. माननीय जी अपने में यह गुण न होने की स्वीकारोक्ति ही तो कर रहे हैं, " कुत्ता भी नहीं.. जायेगा ! उनका जोर ’ भी नहीं ' पर ही तो है, बेचारे कुत्ते के रास्ते क्यों बंद करें, वह ?

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