देश का भला कैसे होगा जब तक राजनीति में ओछे लोग आते रहेंगे
देश का भला कैसे होगा जब तक राजनीति में ओछे लोग आते रहेंगे. बात बिल्कुल साफ है, योजनाओं का तथा अधिकारों का जितना अधिक विकेन्द्रीयकरण किया गया, उतने ही अधिक मौके अधिक लोगों को अधिक भ्रष्टाचार के मिलने लगे.विकेन्द्रीयकरण से मात्र भ्रष्टाचार के सागर में गोते लगाने वालों की संख्या में ही बढोत्तरी हुई है. पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के बाद ग्राम प्रधान पद तक के लिये मारामारी बढने लगी, खून-खराबा तक होने लगा. इसके पीछे एक मात्र कारण है सार्वजनिक धन की बंदरबांट. आखिर वह कौन सी जादू की छडी है राजनीति में जिसके पाते ही एक निर्धन आदमी मात्र ग्राम-प्रधान बनने के बाद ही लाखों में खेलने लगता है, विधायक और सांसदों की तो बात ही छोडिये. इसके पीछे के भी कारण स्पष्ट हैं, या तो ये घाघ लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं या अनैतिक व अवैध कार्य करने वालों को संरक्षण देते हैं तथा इसके बदले धन प्राप्त करते हैं. पूरे देश में सैकडों की संख्या में निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं जिनके ऊपर लूट, हत्या, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में मुकदमा चल रहे हैं तथा जिनके लिये बाहुबली कहकर महिमामंडित किया जाता रहा है। नैतिकता के पतन की पराकाष्ठा नोट कांड में देखी ही जा चुकी है. जिस समय माननीय भीम राव अम्बेडकर तथा अन्य विद्वान व्यक्तियों ने संविधान की रचना की थी, संभवत: उस समय उनके मस्तिष्क में यह कल्पना भी नहीं रही होगी कि राजनेताओं का पतन इस हद तक हो जायेगा. अब राजनीति सेवा का साधन न रहकर एक व्यवसाय बन गयी है और व्यवसाय अपने नफे के लिये ही किया जाता है न कि समाजसेवा के लिये. चाहे कोई राजनेता इस विषय में कुछ भी कहता रहे लेकिन सत्यता यही है कि एक बार विधायक बनने वाला व्यक्ति कई पीढियों के लिये व्यवस्था कर जाता है. इस देश की न्यायिक प्रक्रिया में पूरा सम्मान रखते हुये मैं यही कहना चाहता हूं कि उन खामियों को दुरस्त किया जाये जिनके रहते राजनेताओं पर चलने वाले मुकदमे इतनी लम्बी अवधि तक चलते रहते हैं कि उनका फैसला आने तक राजनेता स्वर्ग सिधार चुके होते हैं और दोषी होने पर भी ताउम्र ऐश करते रहते हैं. ऊपर से बेशर्मी की हद तो तब होती है जब निचले कोर्ट से दोषी सिद्ध होने पर नेता कहता है कि अभी तो ऊपर भी कोर्ट हैं, उसमें जायेंगे और जब ऊपर के न्यायालय में भी दोषी सिद्ध हो जाता है तो कहता है कि जनता की अदालत सबसे बडी अदालत है. वह जनता जिसका खून पी-पीकर इस तरह के लोग अपना पेट भरते रहे, एक बार फिर उसी को बेवकूफ बनाने की कवायद प्रारम्भ कर देते हैं. यह नेता चुनने के बाद आखिर करते भी क्या हैं, बहुत थोडे से लोग हैं जो विकास कार्यों की ओर ध्यान देते हैं, अधिकतर तो अपने चहेतों के ट्रांसफर-पोस्टिंग में लगे रहते हैं तथा अपना और अपने समर्थकों का उद्धार करने में लगे रहते हैं. क्या हम केवल अपनी गाढी कमाई को लुटाने के लिये इन्हें चुनते हैं। नेताओं को बचाने में भ्रष्ट अधिकारियों का भी बडा अहम किरदार होता है, नेता भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देते हैं, उनके बुरे कामों पर परदा डालते हैं, उन्हें कानून से बचाते हैं तथा इसकी प्रतिपूरना में अधिकारी भ्रष्ट नेताओं को बचाते रहते हैं. जब देश चलाने वाली राजनीतिक पार्टी के युवराज यह जानते हैं कि हर एक रुपये में से मात्र पांच पैसे ही लाभार्थी को मिल पाते हैं, तो इसे क्या समझा जाये, उनकी इनोसेंस या चतुरता. जब वे यह सब गोरखधन्धा जानते हैं तो फिर यह सब करने वालों के विरुद्ध वे कोई प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं करवाते. क्या यह सब एक बडी मिलीभगत की तरफ इशारा नहीं करते. और इसीलिये सरकारें बढती हुई मंहगाई के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करतीं, वे जानती हैं कि जनता को मंहगाई के जाल में फांस दो, जब जनता को दो जून की रोटी आराम से नसीब नहीं होगी तो जनता अपने पेट भरने के उपाय करने में ही व्यस्त रहेगी और उसके पास इतना समय होगा ही नहीं कि इन घाघ नेताओं की कुटिल चालों को समझ सके. लिहाजा घाघ नेता अपनी कुटिल चालों से जनता को त्रस्त करते रहते हैं और खुद मस्त रहते हैं. इसलिये अब वक्त आ गया है कि कम से कम एक अच्छी छवि वाले व्यक्ति को चुना जाये तथा पशु-बली तथा धन से वोट खरीदने वाले और देश को बांटने वाले नेताओं को संसद-विधानसभा तथा अन्य प्रतिनिधि सभाओं से दूर रखा जाये.
चलते चलते फिर वही बात जिसके लिए नीरज जी ने तंज कसा है :- चूँकि मुझे लगता है कि ब्लोगर्स कम पढ़े लिखे नहीं होते, उनके पास काफिर जानकारी होती है, इसलिए मैंने यहाँ जानना चाहा था। दूसरी बात लाइब्रेरी में जाने के लिए इतना समय नहीं. तीसरी बात यह कि मैंने अभी तक केवल भारत और दूसरा अब नेपाल के बारे में ही सुना है कि यह दो देश ही धर्म-निरपेक्ष हैं। लिहाजा यह जानने में मुझे कोई बुराई या शर्म नजर नहीं आती। रही बात इसके बारे में बुराई या भलाई के बारे में, तो जिसका जो विचार है वह रखेगा। जैसे कि नीरज जी को जो अच्छा लगा वह लिखा। बार-बार दोहराने के बारे में क्षमा चाहूंगा, लेकिन न जाने कितनी चीजें ऐसी हैं जो व्यक्ति अनजाने में भी दुहरा लेता है।
सही कहा आपने . सत्ता का विकेन्द्रीयकरण होने की बजाय ताओ भ्रष्टचार का विकेन्द्रीयकरण हो गया है .
ReplyDeleteजरूरत है लोकतंत्र को शसक्त बनाने हेतु पारदर्शी और जवावदेही पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था बनाने की . जिससे राजनीति मैं आने हेतु जवावदेह युवा , योग्य और उर्जावान लोगो को प्रोत्शाहित किया जा सके. धन्यवाद
आपने सही लिखा है. अपनी टिपण्णी के लिए मैं आपके लेख से यह वाक्य चुनता हूँ:
ReplyDelete"अब राजनीति सेवा का साधन न रहकर एक व्यवसाय बन गयी है और व्यवसाय अपने नफे के लिये ही किया जाता है न कि समाजसेवा के लिये."
यह शब्द 'राजनीति' ही सारे फसाद की जड़ है. भारत में प्रजातंत्र है, अब प्रजातंत्र में भला राजनीति का क्या काम? शब्दों में बहुत शक्ति होती है. शब्द अक्षर से बनते हैं और अक्षर ब्रह्म का एक रूप है. हम जो शब्द प्रयोग करते हैं वह हमारे सोच का प्रतिनिधित्व करता है और बाद में हमारे कर्मों को प्रभावित करता है. यह कहना कि 'मैं राजनीति में प्रजा की सेवा के लिए आया हूँ', एक धोखा है. राजनीति का अर्थ है वह नीतियाँ बनाना और पालन करना जो राज करने के लिए जरूरी हैं. प्रजा की सेवा के लिए जो नीतियाँ बनेंगी उनका एकमात्र उद्देश्य प्रजा की सेवा करना होगा.
हमारे देश में प्रजा की सेवा के नाम पर राजतन्त्र चलाया जा रहा है. जनता जिन्हें अपना प्रतिनिधि चुनती है वह चुने जाने के बाद स्वयं को राजनेता घोषित कर देते हैं, और प्रजा पर शासन करने लगते हैं. अगर वह जन-प्रतिनिधि होते तो आज भारत का रूप दूसरा ही होता. कोई जन सेवा के लिए भ्रस्टाचार नहीं करेगा, कोई सेवा करने के लिए हिंसा करके चुनाव नहीं जीतेगा. सेवा एक से ज्यादा व्यक्ति एक साथ कर सकते हैं. राज एक ही व्यक्ति या एक दल या एक कोलिशन करता है. यह लोग अपनी जरूरतों के लिए इकठ्ठा होते हैं. हाँ यह बात अवश्य है कि ऐसा वह, जनता के लिए कर रहे हैं, कह कर करते हैं. यही वह धोखा है जो आज इस देश में राजनीतिबाज जनता को दे रहे हैं.
'राजनीति' की जगह 'प्रजानीति' शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए. 'राजनेता' की जगह 'जन-प्रतिनिधि' का प्रयोग होना चाहिए. यह जन-प्रतिनिधि एक ट्रस्टी के रूप में काम करें, जैसे भरत ने राम का प्रतिनिधि बन कर अयोध्या का प्रबंध किया था.
बिल्कुल महोदय.
ReplyDeleteकिसी कविता की चार पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं.--
सांप जबतक आस्तीनों के न मारे जायेगे,
हौसला जितना भी हो हम जंग हारे जायेंगे,
दुश्मनों के संग तो हम फ़िर करेंगे फ़ैसला,
पहले घर के जाहिलों के सर उतारे जायेंगे.
तख्ते से तख्त पर पहुचने वाला आम आदमी जब नेता मे विलीन हो जाता है तब उसकी गरीबी ऐसे गयब होती है जैसे गधे के सर से सींग .
ReplyDeleteओर भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं चुनाव मे .
जनता भी ओछे को ही चाहती है ऐसा संसद सदस्य ,विधायको को देख कर लगता है
दरसल संसद को एक कानून पास करना चाहिए की चुनाव लड़ने के लिए किसी भी व्यक्ति पर कोई अपराधिक मुक़दमा न हो...उसको कम से कम स्नातक होना चाहिए .ओर हर साल एक अस्सेस्मेंट हो किसी भी तरीके से जहाँ जनता को अधिकार हो की वो ५ सालो में कभी भी उस नेता के ख़िलाफ़ शिकायत कर सके ....इसके अलावा हम सब को भी जात पात की दलगत राजनीति से ऊपर उठना होगा
ReplyDeleteसही कहा आपने . सत्ता का विकेन्द्रीयकरण होने की बजाय ताओ भ्रष्टचार का विकेन्द्रीयकरण हो गया है
ReplyDeleteयही चल रहा है जनता भी ओछे को ही चाहती है
अब राजनीति सेवा करने का नहीं सेवा करवाने का माध्यम बन गया है। वह भी बिना किसी योग्यता या लियाकत के।
ReplyDeleteहां बेशर्मी और चाटुकारिता जैसे गुण शुरुआती दौर में साथ होने चाहिये।
हमेशा की तरह बेहतरीन व चुटीली पर संवेदनशील प्रस्तुति के लिये आभार व बधाई स्वीकारें
ReplyDeleteआपकी भावनाएं और आक्रोश जायज है मगर राजनीती ये एक कड़वा सच है , देश का भला हो ही नही सकता , सालों से देखते आयें हैं ....."
ReplyDeleteregards