चंद्रमोहन जी का आचरण और टेलिविज़न पर महिमामंडन
चन्द्रमोहन जी (हरियाणा के भूतपूर्व उप-मुख्यमंत्री) ने हरियाणा की भूतपूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता से दूसरा विवाह रचाने के लिए धर्म-परिवर्तन कर लिया। हिन्दू धर्म को त्याग इस्लाम को अपना लिया। अपनी कामना-पूर्ति मात्र के लिए धर्म-परिवर्तन क्या दोनों धर्मों की तौहीन से कम है। दोनों लोग यह कहते दिखाई दिए कि यह सब विधि-सम्मत है और चंद्रमोहन जी पिछले अठारह सालों से प्रताड़ना सहन कर रहे थे। क्या यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति अठारह सालों से अपनी पत्नी से व्यथित हो और इतनी लम्बी अवधि तक प्रताड़ना को सहन करता रहे। यह अवश्य है कि भारतीय समाज (विशेषत: हिन्दू सम्प्रदायों) में तलाक लेने को अच्छा नहीं समझा जाता तथा इस व्यवस्था को एवं तलाक देकर दूसरी शादी करने को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है। यह बात भी भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है कि यदि तलाक को एक सामान्य व्यवस्था मानकर स्वीकार कर लिया जाता तो वह स्थिति स्त्रियों के लिए अत्यन्त कष्टदायक परिस्थिति होती। वैसे भी महिला का शोषण तो पूरे संसार में किया जाता रहा है और भारत में तो विशेष तौर पर महिलाओं की स्थिति तुलनात्मक रूप में अधिक ख़राब है। प्राचीन समय में विवाह को जन्म-जन्मान्तर का बंधन इसलिए बना दिया गया कि कम से कम कुछ हद तक महिलाओं को पति के परिवार से तो सहारा मिलता रहे। हालाँकि ऐसे रिश्तों को बनाये रखने से भी कोई लाभ नहीं जो मृत हो गए हों, लेकिन इसके लिए कानूनी प्रक्रिया न अपनाकर धर्म-परिवर्तन कर दूसरी शादी करना कहाँ तक जायज है? वैधानिक रूप से उनकी शादी ठीक हो सकती है लेकिन नैतिकता के आधार पर इसे उचित नहीं माना जा सकता। यहाँ तक भी चल सकता था लेकिन विभिन्न टेलिविज़न चैनलों ने जिस प्रकार इसे महिमा-मंडित किया वह तो पूरी तरह से निंदनीय है, आख़िर समाचार चैनलों वाले क्या दिखाना चाहते हैं, क्या वह इसे दिखाकर सबको यह बताना चाहते हैं कि जिस किसी हिन्दू/सिख/जैन/बौद्ध को अपनी पत्नी के जीवित रहते तथा उसे बिना तलाक दिए दूसरी शादी करना हो तो वह चन्द्रमोहन जी की तरह धर्म-परिवर्तन कर इस्लाम को अंगीकार कर दूसरी शादी कर सकता है। इस पूरे किस्से को जिस तरह चटखारे लेकर दिखाया और सुनाया गया वह घोर निंदनीय है। ऐसा लग रहा था कि जैसे पता नहीं कितना बड़ा त्याग दोनों लोगों ने किया है और इनका प्रेम लैला-मजनू, शीरी -फरहाद, रोमियो-जूलियट द्वारा किए गए प्रेम की श्रेणी में आता है। पता नहीं इस देश के टेलीविजन चैनल और उन्हें चलाने वालों को जिम्मेदारी का अहसास कब होगा।
भाइ ये नेता देशभक्ती धर्म जाती जैसी टुच्ची मुच्ची चीजो से बहुत उपर उठे होते है , देशभक्ती धर्म जाती का प्रयोग केवल पाच साल मे इक बार वोट लेने के लिये करते है . ये तो इनकी महानता है कि खाली धर्म ही बदल कर काम चला लिया . वर्ना कई बार तो ये अपनी देशभक्ती भी बदल लेते और बताते भी नही :)
ReplyDeleteदेखा नही था कशंमीरी बीबी के लालच मे आतंकवादी मुंबई तक आ पहुचे थे :)
शायद पाक से समय पर आफ़र नही मिला वरना ये चाद उस्मानी पाकिस्तानी बन जाते :)
is sab kae baad bhi agar chandrmohan ji ki patni unko talaak naa dae kar is dusrey vivaah ko swikaar kar laetii haen yaa chandrmohan ji apnei so called galti maan kar vaapas apne parivaar mae jaatey haen aur patni bhi unko swikaar kartee haen to kewal chandrmohan nahin unki patni unsae jyaada doshi haen jo ease vyakti kae saath phir bhi sambandh banaayae gi
ReplyDeleteपता नहीं इस देश के टेलीविजन चैनल और उन्हें चलाने वालों को जिम्मेदारी का अहसास कब होगा।
yae baat sahii hane lekin aap kewal media ko hii dosh naa dae ham sab bhi utney hii doshi haen kyuki agar parosa hua khana pasand naa ho to kitney log bhukae sona pasand karaegae
"whole incident is just disgusting......shameful too.."
ReplyDeleteI too agree with Rachna ji's views.
Regards
बिल्कुल ठीक कहा .जैसे राहुल महाजन हीरो बन गये है ..उनकी wife ने आई .बी एन पर बड़े ही डिगनीफाइड तरीके से अपनी निजी बातो को निजी रहने दिया
ReplyDeleteआज मीडिया कुछ भी कही भी करता रहता है.
ReplyDeleteचंदर मोहन की सबसे बड़ी कमी यह थी कि उसने विवाह करने के लिए एक ग़लत रास्ता चुना . अगर वो सहीं तरीके अपनाता तो शायद उसके लिए अधिक सही रहता .
जहाँ तक इस्लाम बनने की बात है कोर्ट की पिछली रूलिंग ये बताती है कि उनका इस्लाम स्वीकार करना बेकार गया क्योंकि अभी भी वो दो शादियाँ करने के दोषी हैं इस्लाम स्वीकार करने से इस केस पर फर्क नही पड़ा है
सब टुच्चों की तुच्चेबाज़ी है
ReplyDeleteराजनीतिक खून अपने रंग पर आ गया... शेष बचे बाप-बेटे कम हैं क्या....?
ReplyDeleteदूसरी शादी तो तलाक़ लेकर ही होनी चाहिए थी. मगर फ़िर भी शादी या तलाक़ आदि को तो मैं उनका व्यक्तिगत मामला ही समझता हूँ. मगर सिविल कोड में अलग=अलग धर्मों के लिए अलग-अलग प्रावधान होना ही अपने आप में एक ग़लत बात है.
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