कोई न कोई तो सांठ-गाँठ है इन मुस्लिम नेताओं, धार्मिक गुरुओं तथा धर्मनिरपेक्षियों (सूडो) के बीच

कोई न कोई तो सांठ-गाँठ है इन मुस्लिम नेताओं, धार्मिक गुरुओं तथा धर्मनिरपेक्षियों (सूडो) के बीच - जरा गौर करें कि बाठला हाउस एनकाउंटर के बाद मुस्लिम बुद्धिजीवियों, नेताओं तथा महान धर्म निरपेक्ष नेता अमर सिंह तथा अर्जुन सिंह ने क्या कहा था. अमर सिंह का कहना था कि मोहनलाल शर्मा का स्थानान्तरण हो चुका था और पता नहीं वह वहां क्यों गया था, फिर कहा कि यह भी हो सकता है कि क्या जरूरी है कि शर्मा को आतंकियों की ही गोली लगी हो. लगभग ऐसी ही जुबान कुछ मुस्लिम धर्मगुरू तथा बुद्धिजीवी बोल रहे थे. कोई मुस्लिम छात्र आतंकी हो ही नहीं सकता, लगभग यही कहना था प्रो०मुशीरुल हसन , जामिया के कुलपति का. अर्जुन सिंह भी इन बेकसूर छात्रों के प्रति हमदर्दी जताते और कानूनी सहायता का राग अलापते नहीं थक रहे थे. मुम्बई कांड के बाद कुछ मुस्लिम विद्वानों का यह भी कहना था (श्रीमान मौलाना वहीदुद्दीन साहब को इनमें न गिनें, वह गंभीर,सार्थक बात करते हैं) कि कोई मुस्लिम भला करकरे को क्यों मारेगा (ऐसा लग रहा था जैसे कि हिन्दू विरोध के लिये ही करकरे को जांच सौंपी गयी थी न कि सही जांच करने के लिये, जैसा कि इन लोगों के बयानों से लगता है) जबकि करकरे साध्वी प्रग्या के मामले की जांच कर रहे थे. इसी तरीके के बयान पाकिस्तानी और भारत के कुछ उर्दू अखबारों में छापे गये, संपादकीय लिखे गये, जिनमें यह सिद्ध करने की कोशिश की गयी कि करकरे को कोई मुस्लिम मार ही नहीं सकता चाहे वह आतंकवादी ही क्यों न हो. फिर इस तरह हाईलाईट किया गया कि हो सकता है यह आतंकवादी हिन्दू हो सकते हैं, इसकी भी जांच कराई जाये. इस बीच अबू आजमी के बारे में एक शब्द लिखने की हिम्मत नहीं हुई कि आजमी किस क्षमता में होटल ताज पहुंच गये और कैसे आतंकियों से सऊदी सरकार के अफसर को छुडा लाये, आखिर जो जगह चारों ओर से घिरी हुई थी वहां आजमी कैसे दाखिल हुए, और कैसे आतंकियों ने उनके लोगों को छोड दिया. आतंकियों के हाथ पर बंधे लाल धागे को छाप कर पता नहीं क्या सिद्ध किये जाने की कोशिश की गयी. तीनों अधिकारियों के मारे जाने पर सवालिया निशान उठाये गये. समाजवादी पार्टी के महासचिव मोहम्मद आजम खां ने भी यही बयान दिया है कि मुम्बई में शहीद हुये इन तीन अधिकारियों के मारे जाने की जांच कराई जाये और यही काम केन्द्रीय मन्त्री ए०आर०अन्तुले ने संसद में किया. रा के पूर्व प्रमुख डोभाल साहब भी देश को मुस्लिम राष्ट्र में बदलने की कोशिशों के बारे में कई जगह और कई मंचों पर अपनी चिन्ता जाहिर कर चुके है. सुरेश चिपलूनकर महोदय के एक लेख में काफी विस्तार में यह बताया जा चुका है कि किस तरह इस देश को इस्लामी राष्ट्र में बदलने की साजिश की जा चुकी है तथा किन-किन माध्यमों के जरिये और कहां कहां से यह कार्य करने की शुरुआत की जा चुकी है. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह लोग इन बातों से अनजान हैं, उत्तर है कतई नहीं. यह सब लोग सांसद, विधायक, मन्त्री हैं या रह चुके हैं, जिनके पास तमाम की तमाम गोपनीय जानकारी उपलब्ध रहती है या आवश्यकता होने पर पा सकते हैं. फिर आखिर क्या कारण है कि तमाम खुफिया जानकारी पास होने के बाद भी यह नेता इस तरह की बयानबाजी करते हैं. क्या ऐसा तो नहीं कि यह लोग यह जानते हैं कि हिन्दू तो अपना वोट अपनी-अपनी पसन्द के प्रत्याशियों को बांटता ही है लेकिन मुसलमान उसी को वोट देता है जो मुस्लिम हितों की चिन्ता करता है न कि वह मुद्दों या राष्ट्र या समाज की उन्नति के मुद्दों पर, इसीलिये यह हर वह बयान जारी करते हैं जिससे कि मुसलमान वोट इनकी झोली में आ गिरें या फिर इसके पीछे कोई सांठ-गाँठ है जो अभी परदे के पीछे है .
नोट - मुस्लिम शब्द का प्रयोग तमाम के तमाम लोगों के सन्दर्भ में न लें, इसे उपरी तरह के लोगों के सन्दर्भ में प्रयुक्त किया गया है.

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