एक कुछ अभद्र सा किस्सा जिसे लिखना मैं आवश्यक समझता हूँ.

जब मैं B.SC. कर रहा था तब एक किस्सा मुझे मेरे गुरु श्री मुकेश अग्रवाल जी ने बताया था, कुछ अभद्र सा लग सकता है लेकिन इस तरह है। एक बार एक व्यक्ति कहीं से गुजर रहा था जहाँ कुत्ते एक पंक्ति में बैठे हुए थे और सबसे आगे बैठे हुए कुत्ते के सामने रबड़ी पड़ी हुयी थी। उस व्यक्ति को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि रबड़ी पड़े होने के बावजूद कुत्ते चारों तरफ से उसमें मुंह नहीं मार रहे थे और सीधी पंक्ति में बैठे थे। उस व्यक्ति ने सबसे पीछे बैठे कुत्ते से पूछा कि क्या बात है तुम लोग रबड़ी के लिए छीना-झपटी क्यों नहीं कर रहे हो जोकि तुम्हारा प्रकृतिगत स्वभाव है। इस पर उस कुत्ते ने उत्तर दिया कि आगे वाला खायेगा तो निकालेगा तो है ही। मेरे देश को ऐसी ही रबड़ी में बदल दिया है अपने स्वार्थ को पालने वाले दुष्ट लोगों ने।
कुत्तों से क्षमायाचना के निवेदन के साथ।

Comments

Popular posts from this blog

एक सलाह मजबूरी पर...

कुछ पुरानी यादें