सत्ताधारियों की मानो या जान से हाथ धोने के लिए तैयार रहो.

सत्ता के नशे में चूर होकर औरेया के विधायक शेखर तिवारी ने अपने गुर्गों के साथ मिलकर लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियन्ता मनोज कुमार गुप्ता की पीट-पीट कर हत्या कर दी। हत्या का कारण पैसे की उगाही बताया जा रहा है. यह कोई पहली बार नहीं है जबकि किसी राजनेता ने किसी अधिकारी की हत्या की है, बिहार के सांसद आनंद मोहन को एक आई०ए०एस० अधिकारी की हत्या के आरोप में सजा भी हो चुकी है. न जाने कितने ऐसे उदाहरण सामने आये हैं जब सत्ता के नशे में चूर होकर राजनेताओं तथा उच्च-अधिकारियों ने इस तरह की घटनायें अंजाम दी हैं. और अब तो पुलिस, राजनेता और अपराधियों में विभाजक रेखा इतनी सूक्ष्म हो गयी है कि इनके मध्य कोई अन्तर नजर नहीं आता. इस दुस्साहस का कारण यह है कि राजनेता तथा उच्चाधिकारी सत्ता का दुरुपयोग कर पहले तो अपने विरुद्ध अभियोग ही पंजीक्रत होने नहीं देते, यदि हो भी जाता है तो धीरे से गंभीर धाराओं को हटाकर हल्की धाराओं में बदल देते हैं. उसके बाद मुकदमेबाजी की लम्बी प्रक्रिया में गवाहों को डरा-धमका कर, लालच देकर पूरे मुकदमे का ही मखौल बना दिया जाता है जिसके कारण ऐसे अपराधियों का हौसला बुलंद होता चला जाता है. रही बात नेताओं की तो जिस प्रकार के लोग राजनीति में आ रहे हैं उसे देखते हुये वह दिन दूर नहीं जब विधानसभा-संसद में ऐसा विधेयक पास हो सकता है जिसमें यह व्यवस्था होगी कि हत्या-बलात्कार-चोरी-डकैती-तस्करी की रिपोर्ट नेता और अधिकारियों के विरुद्ध लिखी ही न जाये और यदि लिख भी जाये तो कुछ धनराशि जमाकर इन आरोपों को खत्म कर दिया जाये. इस मामले में विधायक के साथ वह पुलिसवाले भी समान रूप से दोषी हैं जिन्होंने रात में विधायक को गिरफ्तार करने के स्थान पर मनोज कुमार गुप्ता को लावारिस के रूप में जिला अस्पताल में छोड दिया. यह वही पुलिसवाले हैं जो किसी चोर के दो-तीन थप्पड लगाने वालों लोगों को यह कहकर लताडते हैं कि कानून हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है, और ऐसे लोगों को जेल भेजने की धमकी देते हैं. उत्तर प्रदेश की मुख्यमन्त्री पूरे मामले को आपसी रंजिश तथा ठेकेदारी के विवाद को बता रही हैं, पुलिस का रवैया इसी से स्पष्ट हो रहा है कि विधायक को एक दिन को भी पुलिस हिरासत में नहीं लिया जा सका. अदालतों और न्यायाधीशों का पूरा काम साक्ष्यों के आधार तथा अभियोजन द्वारा लगाये गये अभियोगों और सबूतों पर ही निर्भर करता है लेकिन ऐसे जघन्य हत्याकांड पर माननीय अदालतों को भी कडा रवैया अपनाना चाहिये और कम से कम पुलिस से तो जवाब तलब करना ही चाहिये. न्याय मिलने की आशा इस मामले में प्रारम्भ से ही धूमिल होती दिखाई दे रही है, जिन पुलिस वालों को बर्खास्त किया जाना चाहिये था, उनके विरुद्ध मामूली कार्रवाई जैसे-लाइन हाजिर करना अधिक से अधिक निलम्बित कर खानापूरी कर ली जायेगी.

अत: इस से एक ही शिक्षा मिलती है कि भ्रष्ट बनो, नेताओं को (चाहे वह सत्ताधारी दल के हों या विपक्ष के) चंदा देते रहो, मनमाफिक वैध-अवैध काम करते रहो। कानून पर चलोगे, कानून सिखाओगे, कानून की बात करोगे तो घरवाले अनाथ हो जायेंगे और कानून की आंखों पर पट्टी बांध कर यह लोग किसी राजनीतिक पार्टी से टिकट पा फिर से माननीय बन जायेंगे.

उन लोगों के लिये जो यह कहते रहते हैं कि जनता भी ऐसे लोगों को चुनने के लिये उतनी ही दोषी है, जितनी कि पार्टियां-वह विद्वान जन ही बतायें कि जनता बेचारी क्या करे, हर पार्टी अपराधियों को टिकट देती है, जनता को भी विनम्र स्वभाव का सांसद-विधायक नहीं भाता, वह भी अपना स्वार्थ ही देखती है. लेकिन अगर जनता का दोष इसमें दस प्रतिशत है तो पार्टियों का नब्बे प्रतिशत. जनता को सिर्फ वोट बनाकर रख दिया है इन ........ के .......... ने.

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