टेलिविज़न पर हास्य के नाम पर परोसी जा रही है अश्लीलता

कल टेलिविजन देखते समय अकस्मात एक समाचार चैनल पर नजर अटक कर रह गयी, इस चैनल पर एक हास्य कार्यक्रम की झलकियां दिखाई जा रही थीं, जिसका नाम सम्भवत: ’कामेडी सर्कस’ था. इस पर जो दिखाया जा रहा था, उसकी थीम एक वालेट और एक पर्स में हो रही बातों पर आधारित थीं. पहला सीन कुछ ठीक-ठाक था, इसलिये कुछ देर और देखने का मन हुआ. कार्यक्रम में जज के रूप में शेखर सुमन तथा अर्चना पूरन सिंह एवं विशेष अतिथि के तौर पर अदाकारा सेलीना जेतली मंचासीन थीं. अगले कुछ सेकंडों के अन्दर जो कुछ उस कार्यक्रम में कहा गया, वह मुझे हू-बहू तो याद नहीं लेकिन जितना याद रहा वह बता रहा हूं, पर्स बने हुये पात्र से वालेट बना हुआ पात्र पूछ्ता है कि तुम्हारी मालकिन क्या-क्या रखती हैं तुम्हारे अन्दर. पर्स बना हुआ कलाकार कहता है कि महीने के उन दिनों के लिये बहुत कुछ ठूंस-ठूंस कर रखती है. बाद में इसका स्पष्टीकरण देते हुये कहता है कि तुमने गलत समझ लिया न, महीने के अन्त में नोट तो रहते नहीं, इसलिये रेजगारी ठूंस-ठूंस कर रखती है. इसी प्रकार जब पर्स बना हुआ कलाकार वालेट से पूछ्ता है कि तुम्हारा मालिक तुम्हारे अन्दर क्या रखता है तो वह जबाव देता है कि वही, बिन्दास बोल. और फिर पर्स बना हुआ कलाकार कहता है कि मेरी मालकिन भी रखती है, बाद में इसका भी स्पष्टीकरण आ जाता है कि अपने बाय-फ्रेंड की फोटो. मेरी समझ में नहीं आता कि क्या इन टीवी चैनलों के मालिकों तथा कार्यक्रम बनाने वाले निर्माता-निर्देशकों की अक्ल को क्या लकवा मार गया है जो हास्य के नाम पर अश्लीलता तथा फूहड़ भाव-भंगिमा युक्त द्विअर्थी डायलाग प्रस्तुत कर रहे हैं. कुछ कुतर्क करने वाले यह भी कह सकते हैं कि जो देखना चाहे देखें, न देखना चाहें न देखें. मैं उनसे सहमत हो सकता हूं लेकिन एक सीमा तक, यह बात कुछ व्यस्कों के लिये तो लागू हो सकती है लेकिन किशोरावस्था में प्रवेश करने वाले देश के भविष्य पर इस तरह के कार्यक्रमों का जो दुष्परिणाम पडता है, वह अत्यन्त गंभीर है. कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि समाज में खुलापन आवश्यक है, लेकिन किस सीमा तक, खुलेपन तथा अश्लीलता के मध्य कुछ तो सीमारेखा होना चाहिये. यह कुछ इस तरह नहीं है कि हर व्यक्ति जो अपनी बेटी का विवाह करता है, वह उसके वापस आने पर उसके विवाह उपरान्त पति के साथ सम्बन्धों के बारे में तो नहीं पूछता, जबकि सभी जानते हैं कि विवाह के बाद एक स्त्री और पुरुष में किस तरह के रिश्ते बनते हैं. अभी तक सेक्स और हिंसा फिल्मों तक ही सीमित थी, लेकिन सैटेलाइट टीवी आने के बाद तथा सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के परिणामस्वरूप यह सांस्कृतिक प्रदूषण हर घर में घुस गया है. बालमन के भटकाव के लिये यह काफी है. पहले बच्चे अच्छी पुस्तकें पढते थे, बाबा-दादी, नाना-नानी से प्रेरणादायक किस्से-कहानियां सुनते थे, लेकिन आज इनका स्थान फिल्मों, टेलिविजन और इन्टरनेट ने ले लिया है, जहां पर अश्लीलता प्रचुर मात्रा में बिना किसी रोक-टोक उपलब्ध है. अब उनके प्रेरणास्रोत टीवी-फिल्मों के पात्र बनते जा रहे हैं, जिनके पा करोड़ों-अरबों रुपये हैं, बड़ी -बड़ी गाड़ियां हैं, लम्बे चौड़े मकान हैं, अवैध सम्बन्ध हैं. जो बाहुबली हैं, जो नाइट क्लबों में जाते हैं, मंहगी शराब पीते हैं और ईजी मनी प्राप्त करते हैं. बडे शहरों में झपटमारों में कई ऐसे घरों के रोशन चिराग शामिल मिले जिन्होंने अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ऐश करने के लिये झपटमारी प्रारम्भ कर दी. सांस्कृतिक प्रदूषण तो अन्य सभी प्रदूषणों से अधिक खतरनाक है, क्योंकि अन्य प्रदूषणों से शारीरिक क्षति पहुंचती है, लेकिन यह तो मानसिक रूप से ही अपंग बना देता है. सम्भवत: सूचना तथा प्रसारण मन्त्रालय टेलिविजन चैनलों पर नियन्त्रण तथा नियमन का कार्य करता है, मेरी यह अपील है कि इस तरह के कार्यक्रमों पर अविलम्ब रोक लगाई जाये, तथा यदि इस प्रकार के कार्यक्रमों का प्रसारण नहीं रोका जा सकता तो कम से कम इन के लिये अलग से चैनल प्रारम्भ किये जायें जिससे कि यदि अभिभावक चाहें तो कम से कम इस प्रकार के कार्यक्रमों को अनचाहे अपने घर में घुसने से रोक पायें।

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