जब मुझे धार्मिक आयोजनों से वितृष्णा हुई

नवम्बर में मुझे एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला, यह एक धार्मिक कार्यक्रम था देवी भगवती की चौकी का. मैं निर्धारित समय पर पहुंच गया. कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ. कुछ देर बाद मुझे खीज होने लगी, खीज का असली कारण था तेज आवाज में बजते हुए लाउड स्पीकर्स. इन तेज बजने वाले साउंड सिस्टम मुझे हमेशा खीज पहुंचाते हैं, चाहे देवी-जागरण हो, रामायण हो, कोई सार्वजनिक सभा, विवाह समारोह हो या फिर मंदिरों की आरती, मस्जिदों में दी जाने वाली अजान या अन्य कोई कार्यक्रम. संभवत: कबीर दास जी ने इसी दिन के कहा था कांकर-पाथर जोड़ कर मसजिद दयी बनाय, ता चढ़ मुल्ला बांग दे का बहिरो भयो खुदाय. खैर जैसे तैसे मैंने इस शोर को प्रारब्ध समझ कर झेला. लेकिन इसके बाद जो हुआ उसे देखकर मेरे अन्दर अजीब सी वितृष्णा पैदा हो गयी. यह एक छोटी सी नृत्य नाटिका थी जिसमें एक व्यक्ति शिव का रूप रख आया और तांडव करने लगा, उसके साथ दो गण भी आये जो अजीब सी भाव-भंगिमायें बना रहे थे, कुछ देर बाद ही एक अन्य व्यक्ति आया जो काली का रूप बनाये हुये था उसने भी एक प्रसंग प्रस्तुत किया. यहां तक ठीक माना जा सकता है लेकिन इस दरमयान उस व्यक्ति ने जादूगरों की तरह एक प्लेट में रखे हुये फूल दिखाये और फिर उसमें पानी डालकर आग पैदा कर दी. जहां तक मेरा खयाल है उसने यह कारनामा सोडियम पर पानी डालकर किया था, इसी प्रकार काली का रूप रखे व्यक्ति ने मुंह से खून निकालकर दिखाया. कुछ महिलायें इन चरित्रों के पांव छू रही थीं, मुझे यह देखकर बडी विचित्र अनुभूति हुई कि स्टेज मैजिक की यह ट्रिक्स दिखाने का क्या औचित्य था. न तो वहां किसी फिल्म/सीरियल की शूटिंग थी और न ही कोई जादूगरी का शो, फिर यह सब किस लिये. यह सब दिखाकर उस चौकी को करने वाले लोग क्या सिद्ध करना चाहते थे, क्या यह अंधविश्वास को बढावा देने जैसा नहीं या फिर ईश्वर को इमीटेट कर धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुंचाने तथा ऐसे आयोजनों की गरिमा को तरली-कृत करने जैसा नहीं है.


अभी पिछले दिनों तीन-चार धार्मिक और राजनीतिक जुलूस देखने का मौका मिला, जिनमें कुछ हिन्दुओं के थे, एक मुसलमानों का और एक सिखों का. सभी में एक बात कामन थी, वह था सडक का भरपूर दुरुपयोग, अब चूंकि जुलूस धार्मिक है अत: जिस सडक पर यह जुलूस निकलते हैं, उस पर ट्रैफिक घन्टों के लिये बन्द हो जाता है, दुनिया जहान की परेशानी से कोई सरोकार नहीं होता इन्हें. उसके बाद इन जुलूसों को साधन बनाया जाता है अपनी शक्ति प्रदर्शन करने का, जिसमें लाठी-डन्डे, छुरी, तलवार और न जाने क्या-क्या असलहे शामिल रहते हैं. ऐसा लगता है जैसे ये लोग कहीं युद्ध करने जा रहे हों. कई बार इन जुलूसों में शामिल लोगों से आम राह चलते लोगों की झडप भी हो जाती है, जिसमें इनसे उलझने वालों की खैर नहीं होती. इसके अतिरिक्त निजी आयोजनों में भी सडकों पर शामियाना लगाना आम बात हो चुकी है, जिसमें बिजली सीधे खम्भों से लाकर प्रयोग की जाती है और शामियाना लगाने के लिये सडकों को खोद कर गड्ढे बना दिये जाते हैं. लाउड स्पीकर इतना तेज बजाये जाते हैं कि उनसे निकली आवाज बिना भटके सीधे स्वर्ग या जन्नत जहां कहीं भी ईश्वर हो, वहां तक पहुंच जाये. इसका खयाल भी नहीं रखा जाता कि पडोस में कोई बूढा बीमार या नवजात हो सकता है और ऐसे बच्चे भी हो सकते हैं जिनकी पढाई में इन सिस्टम की तेज आवाजों से हर्जा हो सकता है. यही बात राजनीतिक दलों की रैलियों, आयोजनों और जुलूसों तथा वीआईपी मूवमेन्ट के बारे में कही जा सकती है, लेकिन हमें दूसरों का खयाल कहां, हम खुश तो जग खुश, हम दुखी तो जग दुखी. और भारत की दुर्दशा का यही एकमात्र कारण है कि हर व्यक्ति चिंतित है देश को लेकर, लेकिन जब काम करने की नौबत आती है तो दूसरे पर टाल देता है, जब स्वार्थ पूर्ति की नौबत आती है तो लाइन तोडकर, अपने सम्बन्धों को भुनाकर और रिश्वत देकर अपनी स्वार्थ-सिद्धि से नहीं चूकता.

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