अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी - महिलाओं के शोषण पर
एक अफगानी महिला साबरा ने भारतीय सेना के डाक्टर चन्द्रशेखर पंत (आजकल पिथौरागढ में तैनात) पर यह आरोप लगाया है कि इस डाक्टर ने उससे झूठ बोलकर साबरा से शादी कर ली. इस महिला ने अपनी शादी के सबूतों के बतौर शादी के फोटो भी प्रस्तुत किये. महिला का कहना था कि वह भारत आकर पिथौरागढ के जिलाधिकारी से मिली, गृह मन्त्रालय के अधिकारियों से मिली लेकिन अभी तक कोई लाभ नहीं हुआ. इस महिला ने चन्द्रशेखर पंत की यूनिट में जाकर उसके कमांडिंग आफीसर से मिलने की कोशिश की लेकिन कमांडिंग आफीसर से उसकी मुलाकात नहीं हो सकी. यद्यपि महिला आयोग ने इस महिला की शिकायत पर कुछ कार्रवाई करने का प्रयास किया है. साबरा का यह भी कहना था कि उसे यह प्रलोभन भी दिया गया कि वह कुछ रुपये लेकर मामले को खत्म करे. लेकिन साबरा का कहना है कि वह अपने साथ किये गये इस धोखे की सजा चन्द्रशेखर पन्त को दिलाकर ही दम लेगी. यदि साबरा द्वारा लगाये गये आरोप सत्य हैं तो निश्चित रूप से ही यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. इस मामले में अधिकारियों द्वारा दिखाई जा रही संवेदन-हीनता तो घोर निन्दनीय है. इस मामले में निष्पक्ष जांच कर यदि चन्द्रशेखर पंत दोषी पाये जाते हैं तो उनके विरुद्ध अविलम्ब उदाहरणीय कार्रवाई करनी चाहिये.
इसी तरह शोषण और धोखाधडी का एक और मामला मुजफ्फरनगर में प्रकाश में आया जहां अर्चना नाम की एक महिला को उसके पति ने दहेज की रकम हडपने के बाद उसके स्थान पर किसी अन्य युवती को न्यायालय में अर्चना बताकर प्रस्तुत किया और तलाक ले लिया। प्रति वर्ष न जाने कितने ही तलाक अदालत की आंखों में धूल झोंककर ले लिये जाते हैं, जो वकीलों की मिलीभगत के बिना होना संभव ही नहीं है। इस मामले में भी वकीलों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है.
महिलाओं का शोषण तो आदिकाल से पुरुष करता चला आया है, यह भली-भांति जानने के बाद भी कि उसको जन्म देने वाली मां भी एक महिला है, उसका साथ जीवन भर निभाने वाली पत्नी भी एक महिला है और उसकी रक्षा के लिये प्रार्थना करने वाली उसकी बहन भी एक महिला है. नैना साहनी, कविता चौधरी, शशि, प्रियदर्शिनी मट्टू, जेसिका लाल के मामले अपने आप में भारतीय कानून व्यवस्था और भारतीय समाज की कहानी खुद-ब-खुद बयान करते हैं. दरअसल पुरुष के पास जब अनाप-शनाप पैसा आ जाता है या उसे सत्ता और अधिकार मिल जाते हैं तो अपनी पाशविक प्रवृत्ति को संतुष्ट करना चाहता है और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है जिसके लिये महिलाओं का यौन शोषण करना उसे सबसे आसान लगता है और इसीलिये इस तरह के लोगों का शिकार वे महिलायें बन जाती हैं जो इनके कार्यक्षेत्र में होती हैं या फिर किसी भी कारण से इनके संपर्क में आ जाती हैं. इस तरह के व्यक्ति महिलाओं को उनको ऊंचे-ऊंचे सपने दिखाते हैं और उनकी आकांक्षाओं को पूरी करने का आश्वासन देकर या उन्हें डरा-धमका कर उनका शारीरिक शोषण करते रहते हैं. अधिकतर मामलों में अभियुक्त उच्च वर्ग से संबंधित रहे और उन्होंने यह प्रयास किया कि ये मामले दबे रहें, अनेकानेक मामलों में ऐसा होता भी है. यदि किन्हीं मामलों में सजा मिल भी सकी तो सिर्फ इसलिये कि वहां मामला इतना अधिक तूल पकड़ गया था कि उसमें किसी भी तरह की हेराफेरी की जाती तो काफी दिक्कत हो जाती, लिहाजा इस प्रकार के कुछ मामलों में सजा का मिलना कोई उत्साहजनक लक्षण नहीं हैं. इज्जतहत्तक के डर से न जाने कितनी महिलायें अपने साथ हो रही ज्यादती को छुपाये रखती हैं. पुलिस के पास जाने का मतलब अपनी इज्जत को नीलाम करना है. भारत में पुलिस के पास तो शरीफ पुरुष भी जाने से डरता है, फिर महिलाओं की क्या बिसात. रही-सही कसर अदालत में विपक्षी के वकील पूरी कर देते हैं. उसके बाद भारतीय समाज की मानसिकता महिला को ही दोष देना है, महिला को दोष देकर भारतीय समाज अपनी जिम्मेदारी से साफ बच जाता है. न जाने कितने अधिकारियों और नेताओं पर महिलाओं के शोषण के आरोप लग चुके हैं, लेकिन ऐसे मामलों में कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाती, यह भी सत्य है कि सभी आरोप सत्य नहीं होते, लेकिन यह भी अकाट्य सत्य है कि सभी आरोप झूठे भी नहीं होते. दुर्भाग्य-वश हमारे यहां व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि उसमें यदि किसी को सीधे कार्रवाई करने के अधिकार दे दिये जाते है तो वह उन अधिकारों का उपयोग अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिये करने लगता है. केन्द्रीय तथा राज्य महिला आयोग तो शोभा की वस्तु बन चुके हैं, इन आयोगों में भी नियुक्तियां राजनीतिक दल अपने ही लोगों को फिट करने के लिये करते हैं. और कोई ऐसे अधिकार भी इन आयोगों को नहीं दिये गये हैं कि वह उत्तरदायी व्यक्तियों के विरुद्ध सीधे कार्रवाई कर सकें. सुना तो यह भी है कि इन आयोगों के द्वारा भेजे गये सम्मनों को भी गंभीरता से नहीं लिया जाता. महिला दिवस मनाकर, महिला थाने खोलकर सरकारें औपचारिकतायें पूरी करती रहती हैं, समाज अपनी चाल चलता रहता है, शोषण जारी रहता है. पता नहीं भारतीय समाज की मानसिकता में कब बदलाव आयेगा, कब व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन होगा और कब महिला के लिये भोग्या और शोषण की वस्तु होने से छुटकारा मिल पायेगा.
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