मंगल ग्रह के प्राणी के कुछ संस्मरण

एक बार मंगल ग्रह का एक प्राणी भूल से रास्ता भटक कर पृथ्वी पर आ गया. कुछ समय बाद वह वापस अपने ग्रह मंगल पर लौटा. मंगल वासियों ने उसे घेर लिया और पृथ्वी नाम के ग्रह का कोई रोचक वृतान्त्र सुनाने की मांग करने लगे. मंगल ग्रह के उस वाशिन्दे ने सुनाना प्रारम्भ किया :-"पृथ्वी नाम के इस ग्रह पर विभिन्न जातियों के जीव-जन्तु पाये जाते हैं, इनमें दो-पाये, चौपाये, बिना-पाये और सबकुछ पाये शामिल हैं. लेकिन इन सबमें सबसे खतरनाक दो-पाया जानवर है जिसे आदमी कहा जाता है, लेकिन कहीं कहीं तो यह हैवानियत की हदें भी पार कर देता है. इन दो-पायों में एक नेता नाम की ब्रीड भारत नाम के देश में पायी जाती है. नेता बनने के लिये सिर्फ दो-पाया होना आवश्यक है. नेता कोई भी बन सकता है. इसके लिये कोई भी शैक्षिक योग्यता का होना आवश्यक नहीं है, यद्यपि सबसे छोटी सरकारी नौकरी के लिये भी कम से कम आठवां पास होना आवश्यक होता है. कामी (मतलब काम करने वाला)-निठल्ला, चोर-साहूकार, अमीर-गरीब, पढ़ालिखा-अंगूठाटेक, पाकेटमार-डकैत, महिला-पुरुष. लेकिन अगर मार-पीट-चोरी-डकैती-हत्या-बलात्कार-गबन-घोटालों का तजुर्बा रखता हो यह उसके लिये अधिमानी अहर्ताओं की श्रेणी में रखवा देती हैं. वैसे तो इस फील्ड में लोगों की उमर बीत जाती है, कार्यकर्ता से आगे ही नहीं बढ़ पाते, लेकिन यदि किसी के पास बहुत धन हो अथवा किसी महापुरुष को गाली देने का हौसला रखता हो, किसी बड़े नेता के मुंह पर कालिख पोतने की हिम्मत रखता हो या किसी बड़ी पोस्ट से रिटायर हुआ हो या किसी पार्टी के अध्यक्ष/सांसद/विधायक का बेटी-बेटा, साली-साला हो तो आसानी से नेता बन सकता है. अगर किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के निकट संबंधी का मामला हो ऐसा व्यक्ति तो स्वत: ही प्रधानमन्त्रित्व/मन्त्रित्व का हकदार हो जाता है. इन पार्टियों के मुखिया लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पूरा विश्वास रखते हुये अपने पुत्र-पुत्रियों इत्यादि से भी जनता की सेवा करवाते रहते हैं और चूंकि सेवा के लिये सांसद/विधायक/मन्त्री बनना आवश्यक होता है इसलिये लोकतान्त्रिक व्यवस्था में यकीन रखते हुये तुरन्त टिकट दे दिया जाता है और फिर उसके बाद ऐसे सुपुत्र/सुपुत्री को उनके दादा-दादी के जमाने से पार्टी में लगे हुये लोकतान्त्रिक सहयोगी तुरन्त देश का मुखिया कैसा हो.... फलां भैया जैसा हो का राग अलापने लग जाते हैं. कुछ तुच्छ बुद्धि लोग जो खुद सेवा नहीं कर पाते इन से ईर्ष्या रखते हैं और इस गौरवशाली परम्परा को वंशवाद-भाईभतीजावाद का नाम देने लगते हैं. ये लोग नहीं जानते कि हर कोई ऐरा-गैरा नत्थू खैरा देश नहीं चला सकता, देश को सिर्फ तजुर्बाकार लोग ही चला सकते हैं और इन लोगों के खून में ही तजुर्बा आर०बी०सी० बनकर दौड़ता है. पड़दादा फिर पड़दादी, दादा फिर दादी, पिता जी फिर माता जी और अब भैया फिर बहिन जी ही देश को चला सकते हैं, लेकिन बुद्धिहीनों को यह बात समझ में ही नहीं आती. जिन व्यक्तियों के बारे में मैंने पहले कहा है कि यदि इन पर कुछ हत्या-लूट-बलात्कार के मुकदमे दर्ज हों तो ऐसे नेताओं के विरुद्ध भी ये प्लास्टिक पीटर दागी -दागी कहकर चिल्लाने लगते हैं. लेकिन इसका भी तोड़ निकाला जा चुका है, कहीं मुकदमा दर्ज होने से कोई अपराधी तो सिद्ध नहीं हो जाता है और फिर मुकदमा जब तक फाइनल होता है, नेता चैम्पियन्स लीग जीत चुका होता है. और कहीं दोष सिद्ध भी हो जाता है तो कह देता है कि सबसे बड़ी अदालत तो जनता की है, अगर जनता ने माफ कर दिया तो जनता के सेवक कैसे अपराधी कह सकते हैं. और एक और भी अकाट्य तर्क होता है कि जब एक आदमी गन्दी कमीज पहन सकता है तो मैं क्यों नहीं पहन सकता, मैं तो कीचड़ में गोता मारकर आऊंगा कैसे रोकोगे. जब पहले वाले को नहीं रोका तो मैं कैसे रुकूंगा. इन मामलों में नेता बहुत भाग्यशाली होता है, उसके जिन्दा रहते उसके खिलाफ चल रहे मुकदमे कभी फाइनल नहीं हो पाते. इस प्राणी का दिल बहुत कमजोर होता है, और इसका दिल मिलता भी बहुत जल्दी है, आज इससे दिल मिल गया तो इस दल में, कल दूसरे से मिल गया तो दूसरे दल में, दलों की दल-दल तो बहुतायत में है ही. और जहां भी टिकट मिलता है वहीं इसका दिल मिलता है. यह अधिकतर धर्म-निरपेक्ष होता है लेकिन यह हर उस दर पर जाकर माथा टेकने को तैयार रहता है जहां जाने पर इसे वोट मिलने की तनिक भी सम्भावना हो. टिकट देने का आधार जाति और धर्म होता है, लेकिन यह कहता है कि हम समता मूलक समाज की स्थापना करेंगे. हो सकता है इसके कहने का यह अर्थ हो कि हर धर्म और जाति के अन्दर समता की स्थापना करना. एक खास बात और है कि इसके पास कोई सम्पत्ति नहीं होती जो कुछ अरबों-खरबों में होता है वह इसके पत्नी, भाई-भाभी, बच्चों और तमाम रिश्तेदारों के नाम होता है. जब कोई सड़कछाप दोपाया नेतागिरी करना शुरू करता है तो उसके पास और उसके नजदीकी रिश्तेदारों के पास ज्यादा कुछ नहीं होता लेकिन एक बार जीत जाने के बाद उसके नजदीकी रिश्तेदार कुछ करोड़-अरब के ही मालिक बन पाते हैं. घोटाला करने में यह जीव एक्सपर्ट होता है, ये कुछ काम करें न करें लेकिन वेतन-भत्ते खूब पाते हैं, इनके ऊपर नो वर्क नो पे सिद्धान्त लागू नहीं होता. ये कुछ भी कर सकते हैं, सत्ता की गंगा में डुबकी लगाते ही इनके सारे पाप धुल जाते हैं, चाहे तो आप लोग इनके विरुद्ध दर्ज मुकदमों को देख सकते हैं जो सत्ता में आते ही खुद-ब-खुद खत्म हो जाते हैं. यह कुछ ही सालों में कई स्कूल-कालेजों, शापिंग मालों, बाजारों का मालिक बन जाता है. जब तक जिन्दा रहता है तब तक तो लोगों की सम्पत्तियों पर कब्जा करता ही है और कई बार तो मरने के बाद भी घेर लेता है. नेता हर समय मुस्कुराता रहता है, चुनाव के समय यह लोगों के हाथ भी जोड़ता है और पांव भी छूता है और उस समय न जाने कितने ही वायदे कर लेता है, हर हाथ को काम, हर चेहरे पर मुस्कान हर पेट को रोटी, तन को कपड़ा देने का वायदा करता है हालांकि यह जानता है कि इनमें से एक भी वायदा पूरा नहीं किया जा सकता. वह तमाम समितियों में शामिल होता है, वह देश-विदेश में खूब यात्रायें करता है जिसके लिये सरकार आम आदमी से कर वसूलती है और उसे विदेश में मौज कराती है. यह अभिनन्दन करता है और कराता है. यह बोलता कुछ है, छपता कुछ है और उसका मतलब कुछ और होता है, यह जो कहता है उसका खंडन भी कर देता है. यह काले को सफेद और सफेद को काला सिद्ध कर सकता है. इसकी महिमा अपरम्पार है, इसके बारे में बताते-बताते मुझे पृथ्वी के ३००६५ दिन लग सकते हैं और तब भी शायद इसके गुणों का बखान नहीं कर पाऊंगा."

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