कडुवा सच
बहुत से मुस्लिमों से क्षमा के साथ:-(क्षमा इसलिये क्योंकि मैं जानता हूं कि सभी ऐसे नहीं हैं, लेकिन मजबूरी वश सामुदायिक संज्ञा के रूप में लेना पड़ रहा है)
१- इस देश को पाकिस्तान से कोई खतरा नहीं है, क्योंकि राजनीतिक दलों ने भारत में ही कई कबीलाई इलाके बनवा दिये हैं अर्थात वोटों के सौदागरों ने कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में कानून व्यवस्था को ताक पर रखवा दिया है. किसी पुलिस वाले से मालूम कर देखें कि उनके लिये किसी मुस्लिम बहुल इलाके में से किसी मुस्लिम अभियुक्त की गिरफ्तारी का प्रयास करते समय कैसा प्रतीत होता है.
२-विगत दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, अमरोहा, बदायूं, रामपुर जाने का मौका मिला. ऐसा किस देश में होता होगा जहां गांवों में बहुसंख्यक समुदाय(?) के लोग अपने धार्मिक कार्यक्रमों में लाउडस्पीकर भी न लगा पाते हों और प्रशासन भी उन्हें यह कहकर दुत्कारता हो कि दंगा कराओगे क्या और कोई भी नई परम्परा नहीं डालने दी जायेगी. मुस्लिम बहुल इलाकों में तथाकथित बहुसंख्यक किस प्रकार रहते हैं, जाकर स्वयं देख सकते हैं.
३-२००७ में एक एस०डी०एम० जोकि एक मुस्लिम था, ने बदायूं में दुर्गा जागरण बन्द करा दिया, जिस पर कुछ शोर-शराबा भी हुआ लेकिन दबाव डालकर मामला रफा-दफा कर दिया, क्या ऐसी कल्पना भी की जा सकती है कि कोई अधिकारी किसी अल्पसंख्यक धार्मिक कार्यक्रम को बन्द करा सकेगा.
४-फिजी में भारतीयों के साथ, मलेशिया में हिन्दुओं के साथ, पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ जो कुछ किया गया और किया जाता रहा है, उसके विरोध में किसी धर्म-निरपेक्षी, किसी अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति को तकलीफ नहीं हुई. डेनमार्क में कार्टून छपा, आग भारत में लगी! गाजा पट्टी में जो हो रहा है (सही-गलत का फैसला नहीं) उसके विरोध में सब खड़े हैं.
५-वह भी छोड़िये, कश्मीर में जो कुछ हुआ वह धर्म-निरपेक्षता के दायरे में आता है. मोपला की बात हो, नोआखाली की, केरल की बात हो या हैदराबाद/अलीगढ़ की, नुकसान में हिन्दू ही रहे, उस पर भी यदि अपने धर्म के हित की बात करें तो फासिस्ट और कट्टर कहलाये जाते हैं.
६-अलीगढ़ में पिछले तीन साल पहले हुये दंगों में एक मन्त्री के पौत्र को मार दिया गया, उसके बाद एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी के इशारे पर उसे अज्ञात में दिखाकर दफना दिया गया, लेकिन इतने बड़े कांड पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई न ही उस पुलिस अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्रवाई हुई, अब जरा इसकी उलट स्थिति की कल्पना कर देखिये.
६-गोधरा और मालेगांव दो ऐसे बेन्चमार्क मीडिया की मदद से स्थापित कर दिये गये हैं कि उनके आगे जलायी गयी ट्रेन, नोआखाली, केरल, चौरासी, कश्मीर सब को भुला दिया गया. फिर दोहराऊंगा कि दंगों और आतंकवादियों की पैरवी नहीं कर रहा बल्कि यह बता रहा हूं कि एक ही चीज दो लोगों पर किस तरह अप्लाई की जाती है.
७-जो धर्म-निरपेक्षता की रट लगाते हैं, वे सबसे बड़े साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि धर्म पर राजनीति उन्हीं की देन है. भारतीय राजनीति की बुनियाद ही धर्म, जाति और फूट डालो-राज करो की नीति है.
८-चुनाव में टिकट दिये जाने का एकमात्र आधार धर्म और जाति ही है, कोई माई का लाल बता दे कि एक धर्म के बाहुल्य वाले इलाके में किसी अन्य धर्म वाले को टिकट दिया गया हो (एक-दो पार्टी विशेष की तो मजबूरी होती है, क्योंकि उनके साथ उस विशेष धर्म वाले लोग नहीं जुड़ते).
९-धर्म-निरपेक्षता को भी ठेंगा दिखा दिया गया शाहबानो के मामले में.
१०-क्या यह किसी और देश में सम्भव है कि बाहर से आया हुआ एक अवैध नागरिक सांसद बन जाये और यह सिद्ध होने के बाद भी उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई होना तो दूर और तमाम तरीके खोजे जायें उसे बचाने के?
११-यह भी किसी दूसरे देश में नहीं हो सकता कि आई०एम०टी०डी० जैसा कानून बनाया जाये और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज करने के बाद एक नया एक्ट बनाया जाये जिसमें यह प्रावधान हो कि अवैध रूप से देश में घुस आये विदेशी नागरिकों की शिकायत करने वाले पर ही यह भार डाला जाये कि वह अपने आरोपों को सिद्ध करे. कौन ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति होगा जो अपने आप बेकार की कानूनी दिक्कतों में फंसायेगा.
१२-यह भी भारत में ही सम्भव है कि करोड़ों घुसपैठियों को वोटों के लालच में यहीं के नेता नागरिकता दिलाने की बात करें.
१३-किसी और देश में क्या यह संभव होगा कि देश के दुश्मन को जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा दे दी हो, उसे फांसी न चढा़ उसकी सेवा की जाये और दूसरे देश से उम्मीद की जाये कि वह उस देश में पल रहे आतंकवादियों को सूली पर चढ़ा दे.
१४-दो सौ रुपये में सीमा पार करना और पांच सौ रुपये में नागरिकता के लिये जरूरी कागजात बनवाना भी शायद ही किसी और देश में संभव हो.
१५-यह भी भारत में ही संभव है कि महाराष्ट्र में तो संगठित अपराधों से निपटने के लिये केन्द्र सरकार मकोका बनवा सकती है लेकिन उत्तर प्रदेश तथा गुजरात के लिये कानून लागू करने की अनुमति नहीं देती.
१६-यह भी भारत में ही हो सकता है कि सरस्वती शिशु मन्दिरों को तो उग्रवाद का अड्डा घोषित किया जाता है लेकिन मदरसों की पढ़ाई पर कोई सवालिया निशान नहीं उल्टे उसे सीबीएसई की मान्यता दी जाती है, संस्कृत की क्या दशा कर दी गयी है, सबको पता है.
जिस देश में शक्तिशाली लोग कानून को तोड़ते हैं, मरोड़ते हैं, जिस देश को पहले ही भ्रष्टाचार-मंहगाई-भाई-भतीजावाद की दीमक चाट चुकी हो, जहां समाज को जातियों में विभक्त कर दिया गया हो, उसे पाकिस्तान से क्या डर. उसके नेता तो खुद ही उसकी जड़ों में मठ्ठा डाल रहे हैं और दुर्भाग्य यह कि हम सब आम-जन इनकी कुटिल चालों को भांपने में भी असमर्थ रहते हैं या अगर भांप भी लेते हैं तो अपने स्वार्थों के चलते आंख मूंद लेते हैं.
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