पुलिसिया न्याय और कानून

बड़े भाई (अमर सिंह नहीं) अनिल पुसदकर जी के लेखों में नक्सली समस्या के बारे में लगातार गहन विश्लेषण किया जाता रहा है और नक्सली समस्या तथा पुलिस के आचरण के बारे में भी जमीनी हकीकत उजागर की जा रही है. मैंने भी उनके लेख पर टिप्पणी की थी कि सारा देश पता नहीं नक्सली क्यों नहीं बन जाता. इसका जिक्र मैं यहां इसलिये कर रहा हूं क्योंकि इस व्यवस्था को देखकर जो चुभन अन्दर उठती है उससे कभी कभी तो ऐसा लगता है कि मैं भी इस दमन के आगे बेबस होकर क्यों जी रहा हूं मैं भी क्यों उनमें शामिल नहीं होजाता. अभी कल ही की बात थी जब एक जगह भीड़ लगी थी, आगे बढ़कर देखने पर पता चला कि दो पुलिसिये चाय की दुकान पर काम करने वाले एक गरीब आदमी को पीट रहे थे. पूछताछ करने पर मालूम चला कि उस आम आदमी ने उन नामालूम पुलिसियों के किसी काम को करने को मना कर दिया जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा था. आगे बढ़ता तो शायद मेरी पीठ पर भी उनकी लाठी पड़ने से न चूकती. लिहाजा अन्य पुंसत्वहीन लोगों की भांति मैं भी तमाशबीन खड़ा रहा. फिर भी जब मन नहीं माना तो १०० नम्बर डायल किया और पूरी बात बतायी तो उत्तर मिला कि पुलिस के बीच में क्यों पड़ रहे हो. अगर वो पुलिस वाले उसे मार रहे हैं तो मेरे दर्द क्यों हो रहा है और मार रहे हैं तो बेवजह तो नहीं मार रहे होंगे. कुछ ही देर में ऐसे ही बहादुर पुलिस वालों की एक और वीरता दिखाई दी, एक पुलिस वाले की मोटरसाइकिल से एक व्यक्ति का स्कूटर टकरा गया, नतीजा हुआ उस शख्स की पिटाई और उसके बाद स्कूटर समेत कोतवाली की यात्रा. दूसरा नजारा दिखाई दिया एक न्यूज चैनल पर एक क्षेत्राधिकारी ने एक चिकित्सक को चांटा मारने का. बाद में जब खबर सुनी तो पता चला कि मेडिकल कालेज, लखनऊ में किसी मामले को लेकर कुलपति से कुछ वाद-विवाद हो गया था जिसके बाद पुलिस बुला ली गयी और फिर जब पुलिस से बहस होने लगी तो फिर क्षेत्राधिकारी महोदय को यह कैसे सहन होता कि उनकी बात न मानी जाये लिहाजा एक चांटा उन्होंने अपने सामने खड़े चिकित्सक को जड़ दिया. उसके बाद जब उस चैनल के संवाददाता ने लखनऊ के पुलिस अधीक्षक से बात की तो उन्होंने कहा कि क्षेत्राधिकारी महोदय ने बिल्कुल ठीक किया क्योंकि चिकित्सक सरकारी कार्य में बाधा डाल रहे थे इसलिये उनके साथ जो भी हुआ ठीक हुआ. जो पुलिस अधीक्षक उस अधिकारी के कुकृत्य को उचित ठहरा रहा था, मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि अगर जनता ने किसी चोर-उचक्के को एक-दो हाथ जड़ दिये होते तो यही पुलिस अधीक्षक यह कह रहा होता कि जनता को कोई अधिकार नहीं है कानून हाथ में लेने का और जिन्होने ऐसा किया है वे भी जेल भेजे जायेंगे. मुझे नहीं पता कि उस समय क्या चल रहा था, हो सकता है कि गलती चिकित्सक की हो, लेकिन उस चिकित्सक के चांटा मारने का अधिकार उस क्षेत्राधिकारी को किस कानून ने दे दिया. कानून की किस किताब में लिखा है कि अगर कोई आपकी बात न माने तो उठा के चांटा जड़ दो. जो एस०पी० यह कह रहे थे कि सी०ओ० ने ठीक किया है, क्या वह एस०पी० अपने साथ यह व्यवहार सहन कर लेंगे या अपने आला अधिकारी के साथ यह करने की हिम्मत रखते हैं, जाहिर है कि नहीं. अगर यह किस्सा किसी यूरोपीय या अमेरिकी देश में हुआ होता तो ये पुलिस अधिकारी सलाखों के पीछे दिखाई देता, लेकिन अफसोस यह भारत है जहां पुलिस सबसे ऊपर है, वो जो करती है ठीक करती है, वो जो कर देती है, वही कानून होता है. लेकिन ये वो पुलिस है जो आम और निरीह शहरियों पर पुलिसिया जलाल कायम करने के लिये सड़क के बीचों-बीच अपनी गाड़ी खड़ी कर देती है, गाड़ी में ब्रेक न लगाना पड़े इसलिये भीड़ को हटाने के लिये जब इच्छा हो तब हूटर बजाने लगती है, जब पुलिस का अधिकारी कहीं जाम में फंस जाता है तब इस पुलिस की सक्रियता देखने काबिल होती है. ये वही पुलिस है जो शहाबुद्दीन और मुख्तार जैसों के आगे सलाम बजाती है, नक्सलियों के डर से इनकी सरकारी गाड़ियों तक पर लगे हुये हूटर और नीली बत्तियां उतर जाती हैं और बहादुरी दिखाई जाती है आम शहरियों पर. पता नहीं स्वतन्त्रता क्यों मिल गयी इस देश को? क्या सिर्फ इसलिये कि आम आदमी की जेब पर पलने वाले ये पुलिसिये उसी आम आदमी की पीठ पर लाठी तोड़ें. जब भी किसी पुलिस वाले का थप्पड़ किसी गरीब पर पड़ता है, जब भी किसी की पीठ पर पुलिसिये की लाठी पड़ती है, जब भी किसी निर्दोष को पुलिस की गोली छलनी करती है, मुझे लगता है कि वह थप्पड़ मुझे लगा, वह लाठी मेरी पीठ पर पड़ी, वह गाली मुझे दी गयी, वह गोली मेरा सीना छलनी कर गयी.जब पुलिसिया किसी को निर्दोष को भी मारे तो वह न्याय है, कानून की परिधि में आता है, जब आम आदमी किसी चोर के दो-चार हाथ मार दे तो वह कानून हाथ में लेता है, उसे भी चोर के साथ सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है. धन्य है हमारी वीर पुलिस.

कल जो दूसरा फोटो था, वह चन्द्रमा का ही है, नार्मल एस०एल०आर० से खींचा गया. दर-असल फोटो लेने के लिये जब शटर खुला और उसके बाद जब कुछ देर बाद शटर बन्द हुआ तो इतनी देर में चन्द्रमा अपने स्थान से खिसक गया था.

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