आह पड़ोसी वाह पड़ोसी

पड़ोसी शब्द से तो परिचित होंगे ही. किसी व्यक्ति के मुंह से अपने पड़ोसी के बारे में आपको धाराप्रवाह प्रशंसा सुनने को मिल सकती है तो किसी दिलजले के मुंह से कटुशब्दों की बौछार भी उसी तीव्रता के साथ सुनने को मिलेगी. मकान खरीदते समय या किराये पर लेते समय अच्छा पड़ोस पाना किसी भी व्यक्ति की सर्वप्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण इच्छा होती है, और ऐसे में उसकी छटी इन्द्री भी पूर्ण तीव्रता के साथ सक्रिय हो जाती है। पड़ोस कैसा है, पड़ोसी (विशेषत: पड़ोसन) कैसे हैं, उनका स्वभाव कैसा है, कितने बच्चे हैं, वगैरह-वगैरह, ऐसे कितने ही प्रश्नों की प्रश्नावली मकान लेने से पूर्व तैयार कर ली जाती है. अगर बेटियां जवान हैं तो पड़ोसी कुंवारा न हो, विवाहित हो तो फिर उसके लड़के न हों और हों तो फिर जवान न हों.

अब अगर पड़ोस मिला है तो पडो़स तो मिलेगा ही और पडो़सी मुफ्त में। अब शर्मा जी के बराबर वाले वर्षों से वीरान पडे़ मकान में किरायेदार आये तो शर्मा जी को बड़ी प्रसन्नता हुई. शर्मा जी ने पड़ोसी महोदय से उनके घर को अपना ही समझने को क्या कह दिया कि बस पड़ोसी महोदय ने उनके इस कथन को ब्रह्मवाक्य मान लिया और इस पर बाकायदा अमल करना प्रारम्भ कर दिया. पड़ोसी महोदय शर्मा जी के फोन को अपना फोन समझने लगे, पूरी तन्मयता से फोन को प्रयोग में लाते हुये सभी सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, कस्बाई से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को हल करने की कोशिश करते. यदा-कदा फिर सर्वदा शर्मा जी के स्कूटर को लेकर चले जाते और लौटकर आते तो कहते "भाई साहब, स्कूटर रिजर्व में आ गया है, तेल डलवा लीजियेगा, मैंने सोचा बता दूं कहीं रास्ते में धोखा न दे जाये." शर्मा जी की इच्छा होती कि वे अपने बाल नोचना शुरु कर दें.

एक दिन पड़ोसी महोदय सुबह-सुबह शर्मा जी के घर आ धमके और श्रीमती शर्मा के हाथों के बनाये व्यंजनों की तारीफ करने लगे। बस फिर क्या था, थोड़ी देर में श्रीमती शर्मा चाय और गरमा-गरम पकौड़ों के साथ हाजिर थीं. पड़ोसी महोदय ने चाय के साथ पकौड़ों को उदरस्थ करते हुए रंगीन दूरदर्शन यंत्र के दूरस्थ नियंत्रक को कब्जा कर दूरदर्शन पर आते हुए समाचारों को दूर भेज दिया और भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच को ड्राइंगरूम में आमन्त्रित कर लिया. समयचक्र अपनी गति से घूम रहा था, थोड़ी देर बाद वे भाभी जी अर्थात श्रीमती शर्मा को अपनी पसन्द और नापसन्द बता रहे थे. भाभी जी आज तो लंच और डिनर आप के ही यहां करेंगे, क्या गजब का खाना बनाती हैं आप, वाह. आज तक मैंने ऐसे पकौड़े नहीं खाये. भाभी जी की तारीफों के पुल बांधते-बांधते दोपहर और रात के भोजन का मीनू भी भाभी जी को बता दिया. शर्मा जी को करेले से चिढ़ थी लेकिन पडो़सी महोदय को भरे हुए करेले खिलाये गए. शर्मा जी ने जिन्दगी में कभी लौकी को मुंह नहीं लगाया था लेकिन आज लौकी के व्यंजन रसोई में शोभायमान थे. शर्मा जी ने कभी उपवास नहीं रखा था लेकिन पड़ोसी महोदय की कृपा से शर्मा जी को उपवास रखने का सौभाग्य प्राप्त हो गया क्योंकि रात का खाना भी पड़ोसी महोदय की इच्छाओं का आदर करते हुए बनाया गया था.

चूंकि शर्मा जी के घर को वे पहले ही अपना घर समझ चुके थे, इसलिये उनमें वहां की चीजों के प्रति अपनत्व जगे बिना कैसे रहता। अत: शर्मा जी के प्रात: संस्करण के समाचार पत्र पर भी उनका अपनत्व जाग्रत होता और जब समाचार पत्र शर्मा जी के हाथों में पहुंचता तब तक सांध्य संस्करण निकल चुका होता. शर्मा जी के कपड़े जब धुलने जाते तो उनमें पड़ोसी महोदय के कपडे़ भी अपना स्थान बना लेते. जब शर्मा जी के बच्चे घरेलू सामान लेने बाजार जाते तो पड़ोसी महोदय भी अपनी सूची पकड़ा देते.

पड़ोसी महोदय अपने में और शर्मा जी में कोई अंतर नहीं मानते थे इसलिए शर्मा जी के नौकर से अपने घर का भी काम करा लेते. इसी तरह पड़ोसी महोदय पूरी ईमानदारी से पड़ोसी धर्म का निर्वाह करते रहे. तीन साल बाद जब पड़ोसी महोदय का स्थानान्तरण हुआ तो बडे़ भारी गले से बोले "भाई साहब, आपके साथ रहते तो एहसास ही नहीं हुआ कि मैं अपने घर से दूर रह रहा हूं, भगवान हर किसी को आपके जैसा पड़ोसी दे". जबकि शर्मा जी मन ही मन में उस घड़ी को कोस रहे थे जिस घड़ी में उन्होंने पड़ोसी महोदय से उनके घर को अपना घर समझने की बात कही थी और प्रार्थना कर रहे थे कि मकान खाली पड़ा रहे, चौरासी लाख योनियों के तमाम प्राणी उसमें अपना डेरा जमा लें लेकिन कोई किरायेदार न आये और अगर कभी कोई आ भी जाये तो उसके अन्दर ऐसा बन्धुत्व जाग्रत न हो.

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