दरोगा ने किया अपराध
पिछले दिनों मुझे एक बार फिर बरेली जाने का सौभाग्य मिला, जिसे अब कुछ लोग बरेली शरीफ लिखने और बदलने में लगे हैं।
पहली घटना - श्यामगंज चौराहे पर वन-वे ट्रैफिक है चार पहिया वाहनों के लिए, लेकिन पुलिस-प्रशासन की सरकारी गाडियाँ निर्बाध रूप से वन-वे में घुस रही हैं। हाथी का झंडा लगी गाडियाँ, पुलिस का निशान लगी गाडियाँ और पुलिस की वर्दी और टोपी से युक्त गाडियाँ भी धड़-धडाती हुई घुसती जा रही हैं। एक गाड़ी के पीछे मैंने अपनी गाड़ी बढ़ा दी, ट्रैफिक सिपाही ने रोका और कहा कि वन-वे है, मैंने कहा आगे जो ऐडीएम साहब जा रहे हैं मैं उनके साथ हूँ, नतीजा मैं भी वन-वे में से निकल आया।
दूसरी घटना - एस०पी० साहब को कहीं जाना था, जाम में फँस गए, कैसे सहन होता कि ख़ास को आम वाली दिक्कतें सहनी पड़ें, नतीजा कई व्यापारियों के विरुद्ध एफ०आई०आर० दर्ज और काफी हद तक अतिक्रमण हट गया। प्रश्न यह कि इससे पहले जिन अधिकारियों ने अतिक्रमण नहीं हटवाया तो नि-संदेह उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया क्योंकि जिन नियमों-कानूनों के अंतर्गत जो कार्रवाई अभी की गई है वह पहले किया जाना चाहिए थी, तो जिन लोगों ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया, उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? कर्तव्य का निर्वहन न करना unbecoming of government servant का सीधा-सीधा मामला है, लेकिन ऐसा क्यों होता है कि नियमों के अनुसार कार्रवाई नहीं की जाती.
तीसरी घटना - एक ग्यारह वर्ष की बच्ची का अपहरण उसके चाचा ने कर लिया, जो पुलिस में दरोगा था और फर्रखाबाद में तैनात था, इसकी पत्नी भी एल०आई०यू० में दरोगा है. कारण था कि बच्ची के पिता का निधन कई वर्ष पहले हो गया था जो रेलवे में कार्यरत थे, उनकी पत्नी को नौकरी मिल गयी, साथ में भविष्यनिधि ग्रेच्युटी इत्यादि का रुपया भी बच्ची को मिलना था. बच्ची की मां ने दूसरा विवाह कर लिया. बच्ची के हिस्से में पैतृक जायदाद भी मिलनी थी. दरोगा साहब को कैसे सहन होता कि एक गैर को सम्पत्ति मिल जाये, लिहाजा अपने थाने की जी०डी० में रवानगी दर्ज कर छ:-सात सिपाहियों को लेकर आये और बच्ची को अगवा कर लिया. अपहरण की सूचना पर बरेली-शाहजहांपुर जिले की सीमा पर पकड़े गये. पकड़े जाने पर बताया कि मुझे तो भतीजी की मौत की सूचना मिली थी और मैं इसे देखने आया था, यहां झूठा फंसा दिया. मामला पुलिस विभाग का था, परिणाम यह कि समझौता कराया गया और बच्ची के सौतेले पिता ने शपथपत्र दिया कि कुछ गलतफहमी हो गयी थी, अब मामला वापस ले रहा हूं, फिर वही प्रश्न कि अगर अपहरणकर्ता दरोगा न होता तो पुलिस इतनी आसानी से शपथपत्र कुबूल कर लेती. जनाब, एस०ओ० के लिये लाखों का मामला हो जाता और अगर मामला उस ढ़ंग से न निपट पाता तो इतने मामले उस पर लगा दिये जाते कि वह ताउम्र जेल में सड़ता.
पहली घटना - श्यामगंज चौराहे पर वन-वे ट्रैफिक है चार पहिया वाहनों के लिए, लेकिन पुलिस-प्रशासन की सरकारी गाडियाँ निर्बाध रूप से वन-वे में घुस रही हैं। हाथी का झंडा लगी गाडियाँ, पुलिस का निशान लगी गाडियाँ और पुलिस की वर्दी और टोपी से युक्त गाडियाँ भी धड़-धडाती हुई घुसती जा रही हैं। एक गाड़ी के पीछे मैंने अपनी गाड़ी बढ़ा दी, ट्रैफिक सिपाही ने रोका और कहा कि वन-वे है, मैंने कहा आगे जो ऐडीएम साहब जा रहे हैं मैं उनके साथ हूँ, नतीजा मैं भी वन-वे में से निकल आया।
दूसरी घटना - एस०पी० साहब को कहीं जाना था, जाम में फँस गए, कैसे सहन होता कि ख़ास को आम वाली दिक्कतें सहनी पड़ें, नतीजा कई व्यापारियों के विरुद्ध एफ०आई०आर० दर्ज और काफी हद तक अतिक्रमण हट गया। प्रश्न यह कि इससे पहले जिन अधिकारियों ने अतिक्रमण नहीं हटवाया तो नि-संदेह उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया क्योंकि जिन नियमों-कानूनों के अंतर्गत जो कार्रवाई अभी की गई है वह पहले किया जाना चाहिए थी, तो जिन लोगों ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया, उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? कर्तव्य का निर्वहन न करना unbecoming of government servant का सीधा-सीधा मामला है, लेकिन ऐसा क्यों होता है कि नियमों के अनुसार कार्रवाई नहीं की जाती.
तीसरी घटना - एक ग्यारह वर्ष की बच्ची का अपहरण उसके चाचा ने कर लिया, जो पुलिस में दरोगा था और फर्रखाबाद में तैनात था, इसकी पत्नी भी एल०आई०यू० में दरोगा है. कारण था कि बच्ची के पिता का निधन कई वर्ष पहले हो गया था जो रेलवे में कार्यरत थे, उनकी पत्नी को नौकरी मिल गयी, साथ में भविष्यनिधि ग्रेच्युटी इत्यादि का रुपया भी बच्ची को मिलना था. बच्ची की मां ने दूसरा विवाह कर लिया. बच्ची के हिस्से में पैतृक जायदाद भी मिलनी थी. दरोगा साहब को कैसे सहन होता कि एक गैर को सम्पत्ति मिल जाये, लिहाजा अपने थाने की जी०डी० में रवानगी दर्ज कर छ:-सात सिपाहियों को लेकर आये और बच्ची को अगवा कर लिया. अपहरण की सूचना पर बरेली-शाहजहांपुर जिले की सीमा पर पकड़े गये. पकड़े जाने पर बताया कि मुझे तो भतीजी की मौत की सूचना मिली थी और मैं इसे देखने आया था, यहां झूठा फंसा दिया. मामला पुलिस विभाग का था, परिणाम यह कि समझौता कराया गया और बच्ची के सौतेले पिता ने शपथपत्र दिया कि कुछ गलतफहमी हो गयी थी, अब मामला वापस ले रहा हूं, फिर वही प्रश्न कि अगर अपहरणकर्ता दरोगा न होता तो पुलिस इतनी आसानी से शपथपत्र कुबूल कर लेती. जनाब, एस०ओ० के लिये लाखों का मामला हो जाता और अगर मामला उस ढ़ंग से न निपट पाता तो इतने मामले उस पर लगा दिये जाते कि वह ताउम्र जेल में सड़ता.
Comments
Post a Comment