आठ वर्षीय बालिका कोमल की निरंकुश पिटाई

शायद अब कार्तिकेय को भी मुझसे सहमत होना पड़ेगा, इटावा के एक थाने में आठ साल की बच्ची कोमल की पिटाई करते हुये दरोगा को लगभग सभी खबरिया चैनलों पर दिखाया गया. साथ में तीन सितारा थाना प्रभारी भी खड़ा था और बाकी के पुलिस वाले भी तमाशबीन बने हुये थे. थाना प्रभारी की मर्जी के बिना थाने में पत्ता भी नहीं हिल सकता, इसलिये जितना कुसूर बच्ची को पीटने वाले दरोगा का था, उससे अधिक तीन सितारे वाले थाना प्रभारी का था. पहले-पहल तो मामले पर यह कहकर धूल डालने की कोशिश की गई कि बच्ची ने गलती की थी और सबक सिखाने की नीयत से यह कार्रवाई की गयी. मैं फिर से कहना चाहता हूं कि पुलिस का काम ही सही-गलत का फैसला कर न्याय देने का हो गया है तो फिर अदालतों की क्या आवश्यकता है, अदालतों को बन्द कर देना चाहिये. यदि इस मामले में पुलिस ने किसी जवान युवक की पिटाई की होती तो इन्हीं कुतर्कों को देकर पल्ला झाड़ लिया गया होता, जैसे कि पिछले दिनों लखनऊ में एक चिकित्सक को क्षेत्राधिकारी ने पीटा और इससे पहले मुरादाबाद के एस०एस०पी० ने आई०टी०बी०पी० के एक सब-इन्स्पेक्टर को लठियाया था और उन सभी के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी, लेकिन मामला एक मासूम बच्ची से जुड़ा था इसलिये थाना प्रभारी को निलम्बित किया गया, जबकि उसे सेवामुक्त किया जाना चाहिये था, क्योंकि उसकी शह पर उसकी आंखों के सामने मासूम बच्ची को पीटा जा रहा था. जिसने पीटा उस दरोगा को सेवामुक्त कर दिया गया .लेकिन मुझे यह लगता है कि यादव होने के कारण यह कार्रवाई की गयी (हो सकता है कि मेरी सोच सही न हो), अन्यथा उसे भी मात्र निलम्बित कर खानापूरी कर दी गयी होती. लेकिन इसके बाद भी उस बच्ची के घरवालों को धमकाया गया और अभी किसी चैनल पर स्क्रोल हो रहा था कि बच्ची के विरुद्ध मामला भी दर्ज कर लिया गया जोकि क्रास रिपोर्ट दर्ज कर दबाव बनाने की नीयत स किया गया लगता है. और इन पंक्तियों को लिखते लिखते कोमल के बदलते हुये बयान भी देख रहा हूं, जो यह दिखा रहा है किकिस कदर दबाव डाला जा रहा होगा इस बच्ची के मां-बाप पर. वह दरोगा और प्रभारी निरीक्षक भी देख रहा हूं जो यह कह रहे हैं कि बिल्कुल बच्चों की तरह उस लड़की से पूछताछ कर रहे थे, थोड़ा सा जोर से डपट दिया था. बेशर्मी से तस्वीरों को भी झूठा ठहराने की कोशिश की जा रही है. निसंदेह यह दर्शाता है कि पुलिस पूरी तरह निरंकुश हो चुकी है और उसके ऊपर कोई नियम-कानून लागू नहीं होता. यह भी सम्भव है कि थोड़े दिनों बाद सेवामुक्त किया गया दरोगा बहाल हो जाये क्योंकि जिस अधिकारी ने उसे सेवामुक्त करने के आदेश जारी किये होंगे, उससे ऊपर के अधिकारी के पास अपील की जा सकती है और ऊपर का अधिकारी निचले अधिकारी के आदेश को रद्द कर सकता है. जो लोग इनकी हिमायत करते हुये यह कहते हैं कि नीचे स्तर के पुलिस वालों पर काम का बहुत दबाव है वह भी गुमराह करते हैं, काम का बोझ, किस के काम का? आम जन के साथ हुई गंभीर से गंभीर घटना की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करते ये पुलिसवाले. इस चौकी से उस चौकी, यह एफिडेविट, वह एफिडेविट. सिर्फ अपना काम साधते हैं और काम के बोझ को यूं बयान करते हैं कि इनसे अधिक काम करने वाला आजतक पैदा ही नहीं हुआ. किसी भी एस०ओ०/चौकी-इन्चार्ज को देख लीजिये, अपने इलाके का राजा होता है राजा. मैं यह मानने को हर्गिज तैयार नहीं कि उच्च अधिकारियों को इस बात की जानकारी नहीं होती कि थानों और चौकियों में क्या होता है, क्योंकि एक आई०पी०एस० अधिकारी को ट्रेनिंग के दौरान थाने का प्रभार दिया जाता है. ट्रेनिंग में विभिन्न प्रभारों के बाद जिला स्तरीय पोस्टिंग में उनके संज्ञान में सब कुछ आ जाता है, और उसके बाद भी यदि थानों में वही क्रूर चेहरा काबिज है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी इन्हीं आई०पी०एस० अधिकारियों की है, क्योंकि ट्रांसफर होने पर इन्क्रीमेन्ट नहीं रुक जाते और जिले में मुखिया के तौर पर पोस्ट होने पर अलग से चार इन्क्रीमेंट नहीं मिल जाते. फिर जिले की पोस्टिंग की तुलना में अन्यत्र पोस्टिंग को सजा क्यों माना जाता है?? ऊपर से सही काम करने पर यदि सत्ता में काबिज लोग नाराज हो भी जायेंगे तो क्या करा देंगे, स्थानान्तरण, जो कोई सजा नहीं है, तथा स्थानान्तरण होने के बाद यह लोग किसी आई०पी०एस०अधिकारी की जगह आई०पी०एस० अधिकारी को ही पोस्ट करायेंगे न कि अपने किसी निजी गार्ड या सिपाही को पोस्ट करा देंगे. बात घूम-फिर कर फिर वहीं आ जाती है कि हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा लेकिन न हम सुधरते हैं, न जग सुधरता है. एक अकाट्य तथ्य यह भी कि चूंकि इस मुद्दे से पब काण्ड की तरह पालिटिकल माइलेज मिलने की सम्भावना नहीं है इसलिये बाकी सारे दल औपचारिकता निभाकर पल्ला झाड़ रहे हैं, रेणुका जी भी इन्हीं नक्शे-कदम पर चल रही हैं. इस समय मानवाधिकार आयोग तक शायद यह खबर पहुंची ही नहीं और समाजसेवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता भी विशेष कारणों से ही कुछ घटनाओं का संज्ञान लेते हैं.


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