आ गए लोक सभा चुनाव 2009
एक बार फिर देश तैयार है सैकडों करोड़ रुपए चुनाव में व्यय करने के लिए। फिर वही दल, वही मुखौटे, वही आयाराम-गयाराम। फिर वही दल-बदल दिल-बदल की आड़ में। फिर वही गुंडे-मवाली, जब तक सामने वाले के यहाँ थे अपराधी थे, अब तौबा कर ली। फिर अपराध जब किया था जब सामने वाले के यहाँ थे, अब तो नहीं किया। फिर देश को आगे ले जाने के सपने, साठ सालों में नहीं कर पाये तो अब क्या कर पायेंगे। जब आबादी तिहाई थी तब कुछ नहीं उखाड़ सके तो अब क्या उखाडेंगे। जनता तो पहले भी शोषित थी अब भी रहेगी। फर्क इतना है कि शोषण करने वाले चेहरे बदल जाते हैं। पहले भी बेवकूफ बनाया जाता था अब भी बनाया जाएगा। स्विस सरकार कहती है कि आप चाहे तो अपने देश के भ्रष्टाचारियों का पैसा ले आयें लेकिन यहाँ कौन करेगा और क्यों करेगा। नशा सीमापार से आता है, बॉर्डर पर पोस्टिंग के लिए क्या कुछ नहीं किया जाता। पुलिस जब अपराधियों से मिल जाए या ख़ुद उनके लोग अपराध में लिप्त हों तो देश कैसे चलेगा। सी बी आई राशन घोटाले की जांच को मना कर देती है, बहुत खूब। क्योंकि अपराध बड़ा है, इसलिए बहुत बड़ा अपराध करो और जांच भी नहीं होगी। इस के खिलाफ कुछ हो भी नहीं सकता क्योंकि शायद याचिका खारिज हो गई।
दाऊद को वापस लाने के लिए सरकार पाकिस्तान से मांग कर रही है। मांग कर करेगी क्या, फांसी दी नहीं जा सकती, हो सकता है कि राजनीतिक दल टिकट जरूर दे दें। घर ने निकलने के बाद जिन्दा वापस लौटने की कोई गारंटी नहीं। किस तरफ से कौन सा वाहन टक्कर मारकर स्वर्ग-वासी बना दे, कहा नहीं जा सकता। पुलिस और यातायात अधिकारियों की मेहरबानी डग्गा-मार वाहनों पर खूब रहती है। अच्छा हो कि पुलिस को राजस्व वसूली का दर्जा दे दिया जाए। हर चीज मिलावटी बिक रही है, कुछ नहीं कर सकते, जिन्हें रोकने के लिए नियुक्त किया गया है वे ही इसे चलवा रहे हैं। किसान वहीं का वहीं, फिर वादे, फिर दावे, फिर आत्महत्याएं। टैक्स इसलिए नहीं लगाया जाता क्योंकि किसानों की आड़ में काला धन सफेद किया जा रहा है। हवा में जहर घोलते वाहन सरपट दौड़ रहे हैं, जनरेटर निरंतर हवा को दूषित कर रहे हैं, नदियों का पानी जहरीला हो रहा है। आबादी तेजी से बढ़ रही है, पता नहीं आगे चल कर लोग कहाँ रहेंगे और क्या खायेंगे, सड़क पर कैसे चल पायेंगे। आधी आबादी को खाना भी मुकम्मल नसीब नहीं है।
शिक्षा की हालत भी सबको पता है, इतनी मंहगी हो गई है कि पढाया भी नहीं जा सकता। बीमारी पर इलाज कराना और दूभर है। बीमार पड़ने से अच्छा है मर जाना। सब अपने में मस्त हैं, गरीब और गरीब हो रहा है, अमीर और अधिक अमीर। मंदी छाई हुई है, लेकिन जिन्दा रहना महंगा हो रहा है। दाल मंहगी, चावल मंहगा, सब्जी मंहगी, दूध मंहगा, तेल मंहगा। हर चीज मंहगी, आदमी सस्ता, जिंदगी सस्ती। हर जगह भ्रष्टाचार, प्रधानमंत्री आर-टी-ओ के यहाँ जाकर आम आदमी की मजाक बनवा देते हैं। एक मुस्लिम डॉक्टर आस्ट्रेलिया में पकड़ लिया जाता है तो उन्हें नींद नहीं आती लेकिन यहाँ रोज सैकडों किसान मारे जाते हैं तो पता नहीं नीद कैसे आती होगी । मंत्री और उनके रिश्तेदारों की संपत्ति कैबिनेट की हो गई है इसलिए सूचना से बाहर है। मतदान अनिवार्य नहीं, न ही निगेटिव वोटिंग और न ही वापस बुलाने का अधिकार। कुल का दस प्रतिशत पाने वाला प्रतिनिधि बन जाता है और राज करता है। काम तो वैसे भी ज्यादा नहीं होता, लेकिन संसद में जाने की भी फुरसत नहीं। फिर वही मोल-भाव, फिर वही जोड़ -तोड़। चुनावी चालीसा फिर पूरा, घसीटा वहीं का वहीं।
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