दंगे का आंखों देखा हाल

परसों एक दूसरे शहर जाना पड़ा. शाम को वापस आते समय रास्ते में देखा कि एक जगह काफी भीड़ इकट्ठी थी, जाम लग गया था. जानने पर पता चला कि वारावफात के रास्ते को लेकर कुछ विवाद हो रहा है. देखते ही देखते मुस्लिम सम्प्रदाय के काफी लोग एकत्र हो गये. मैं गाड़ी को न इधर ले जा सकता था और न उधर. गाड़ी से जैसे तैसे उतरा और एक गली की तरफ बढ़ गया. मेरे पास छुपकर खड़े रहने के अतिरिक्त और कोई चारा भी नहीं था. मिनटों में ही हजारों लोग जमा हो गये, और देखते ही देखते पहले पत्थर और फिर गोलिय़ां चलने लगीं. उनकी तरफ से ऐसी तैयारी लग रही थी जैसे वे किसी युद्ध में हिस्सा लेने जा रहे हों. जाहिर है कि उनमें से अधिकतर नाजायज असलहों से लैस थे. पुलिस की संख्या और तैयारी कम थी, लगता था कि उन्हें इस बात का भान ही नहीं था कि ऐसी घटना हो सकती है और इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पास हथियार होंगे. जो नारे लग रहे थे उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि यहां इस्लाम खतरे में आ गया है और उसके लिये यह लड़ाई लड़ी जा रही थी. उस समय वहां के हमलावर एकराय थे, किसी पार्टी और खेमे में नहीं बंटे थे और न ही पार्टी विशेष से सम्बन्धित व्यक्ति को निशाना बनाया रहे थे बल्कि हिन्दू ही उनके निशाने पर थे. इस हमलावर भीड़ में किसी ने इस हिंसा को रोकने का प्रयत्न नहीं किया बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कि उन्हें उकसाया जा रहा हो. लोगों को और उनके मकान-दुकानों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया. करीब एक घण्टे तक गोलाबारी होती रही, उसके बाद जिला मुख्यालय से फोर्स आई जिसके बाद उपद्रवियों को पकड़ा जा सका. मैं जहां जाकर खड़ा हुआ था, उसके पास ही एक विद्यालय था जहां काफी संख्या में मुसाफिर शरण ले रहे थे, मैं भी वहां चला गया. विद्यालय की छत से देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे कि लोगों पर पागलपन सवार हो गया है. जब मार्ग खुला तो मैं भी वहां से निकल गया.

उक्त आंखो-देखा हाल मेरे एक मित्र का है जिन्होंने कल मुझे इस घटना के बारे में बताया. जबकि अखबार से यह पता चला कि बेचारे अल्पसंख्यकों पर जुल्म ढ़ा रहे बहुसंख्यकों में एक-दो जान से हाथ धो बैठे और इस उत्तेजना में कुछ बहुसंख्यकों के मकान-दुकान दंगों की भेंट चढ़ गये और उनका प्रतिरोध करते समय कुछ अल्पसंख्यक भी जख्मी हो गये. जब कल का अखबार पढ़ा तो अन्दर जहां प्रदेश की खबरें होती हैं, वहां तीन-चार एक जैसी ही खबरें थीं, उनमें से एक इस घटना की भी थी - "वारावफात के जलूस के मार्ग को लेकर दो गुटों में झड़प, विवाद में एक गुट के एक व्यक्ति की मृत्यु, दर्जन भर घायल." बाकी खबर की एक पंक्ति-"मैजिस्ट्रेट से घटना की जांच की मांग, दोनों तरफ के दर्जन भर व्यक्ति घायल और दस-दस लोग गिरफ्तार. पुलिस अधीक्षक ने अभियुक्तों को शीघ्र गिरफ्तार करने का दावा किया."

छोटी से छोटी बात पर फतवा जारी करने वाले इस हिंसा को खत्म करने के लिये फतवा क्यों नहीं जारी करते. मीडिया जो पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करता है इस तरह की घटनाओं की सही परिप्रेक्ष्य में कवरेज क्यों नहीं करता और इन घटनाओं को प्रकाश में क्यों नहीं लाता. प्रश्न का उत्तर सब जानते हैं लेकिन सही काम कोई नहीं करना चाहता. पता नहीं क्या बदा है इस देश की नियति में.

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