लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला कहीं कोई सुनियोजित षड़यन्त्र तो नहीं ??

लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला कहीं कोई सुनियोजित षड़यन्त्र तो नहीं है? तीन मार्च को जो हमला श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हुआ, वह बिल्कुल उसी तरह से स्टेज किया गया जैसा कि मुम्बई में हुआ था. इसके बाद ऐसे भी बयान आये कि यह लोग बाहर से आये थे, भारत का नाम भी लपेटने की कोशिश की गयी. यह भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में भारत के विरुद्ध कुछ सबूत गढ़े जायें. यद्यपि भारत के सत्ताधारी नेता अपनी पीठ स्वयं थपथपा रहे हैं कि भारत ने इस बार पाकिस्तान को बिना किसी शक्ति प्रदर्शन के और रुपये की बर्बादी किये बिना घुटने टिकवा दिये, लेकिन सत्य यह है कि तो एनडीए सरकार ही कुछ कर पायी और वर्तमान. यदि मुम्बई हमले में विदेशी और इतनी बड़ी संख्या में लोग नहीं मारे जाते तो इतना हो-हल्ला नहीं मचता और एक बार फिर निन्दा प्रस्ताव पारित हो जाता. इस बार भी क्या हुआ कुछ नहीं, हमारे यहां के कुछ नेता अमेरिका और ब्रिटेन का मुंह जोहते रहे. उन्हें इस बात का या तो अंदाजा नहीं है या समझ नहीं है या फिर जानबूझ कर इन तथ्यों से मुंह मोड़ते रहे कि अमेरिका और ब्रिटेन अपने हितों की रक्षा करते रहे हैं और करते रहेंगे कि भारत के हितों के लिये पाकिस्तान से लड़ बैठेंगे. नतीजा फिर वही ढ़ाक के तीन पात. क्या हुआ है अब तक? तो आईएसआई के पर कतरे गये, ट्रेनिंग कैम्प बन्द हुये और ही कोई ठोस कदम पाकिस्तान की ओर से उठाया गया. ऊपर से तालिबानियों की सभी जायज-नाजायज मांगे पाकिस्तान ने पूरी कर दीं. यदि सत्ताधारी नेता लफ्फाजी करने को ही सफलता मानते हैं तो इसे सफलता माना जा सकता है. जो देश अपनी रक्षा के लिये स्वयं निर्णय नहीं ले सकता उसकी रक्षा भला दूसरा देश कैसे करेगा. बात हो रही थी लाहौर कांड की, सभी यह जानते हैं कि सेना औरआईएसआई अपना समानान्तर राज चलाती रही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि यह कांड या तो यह दिखाने के लिये स्टेज कराया गया हो कि पाकिस्तान भी अछूता नहीं है और हमलावर भारत से आये थे या फिर पाकिस्तान में सेना के कुछ अधिकारी फिर से सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रहे हों. मेरी नजर में पहली सम्भावना अधिक प्रबल है क्योंकि जिओ टीवी पर आतंकवादी जिस आसानी से भागते हुये दिखाई देते हैं उससे कहीं कहीं इस पहली आशंका को बल मिलता है.

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