भारत की जीडीपी में 50 प्रतिशत की वृद्धि

शीर्षक अपने आप में सब-कुछ बयान कर रहा है। भारत के आम आदमी की कमाई भी बढ़कर डेढ़ गुना हो गई है। आपको विश्वास नहीं होता, लेकिन यह सत्य है। कम से कम इस देश के प्रोफेशनल तो ऐसा ही मानते हैं। सितम्बर २००९ में छठे केन्द्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुईं, कुछ राज्य सरकारों ने भी चुनावों को देखते हुए वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया। और इसके साथ ही साथ हमारे देश के प्रोफेशनल तबके ने भी यह मान लिया कि पूरा देश मात्र सरकारी कर्मचारियों में बसता है, इसीलिए चिकित्सकों की फीस डेढ़ गुनी हो गई, विद्यालयों ने भी फीस बढ़ा दी, वकीलों ने, अध्यापकों, आर्किटेक्ट और बाकी तमाम प्रोफेशनल व्यक्तियों ने अपनी फीस में आनुपातिक वृद्धि कर दी। उपभोक्ता वस्तुओं के दाम नहीं बढाये जाते तो मात्रा घटा दी जाती है, बिल्डर अभी भी लोगों को लूटने में जुटे हैं, और सरकार कहती है कि महंगाई नीचे जा रही है। पता नहीं किस पैमाने से यह लोग नापते हैं देश के आम नागरिक को। क्यों नहीं कोई नियमन बनाया जाता है, इस सब को नियमित करने के लिए। क्यों नहीं यह मनमानी रोकी जाती। क्या यह भी प्रायोजित भ्रष्टाचार नहीं है?

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